
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले जातीय समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी जहां अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को मजबूत करने में जुटी है, वहीं पार्टी के एक बयान ने ब्राह्मण समाज में नाराजगी पैदा कर दी है। सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी द्वारा ब्राह्मण समाज को लेकर कही गई आपत्तिजनक कहावत अब राजनीतिक विवाद का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। बीजेपी, कांग्रेस और बसपा ने इसे लेकर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तीखे हमले शुरू कर दिए हैं।
भाटी के बयान से बढ़ा राजनीतिक तापमान
दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राजकुमार भाटी ने एक ऐसी कहावत का जिक्र किया, जिसे ब्राह्मण समाज ने अपमानजनक बताया। बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी विवाद तेज हो गया और विरोधी दलों ने इसे ब्राह्मण विरोधी मानसिकता से जोड़कर प्रचारित करना शुरू कर दिया। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी चुनावी राजनीति के लिए समाज को जातियों में बांटने का काम कर रही है।
कई दिन की चुप्पी के बाद हरकत में आए अखिलेश
विवाद बढ़ने के बावजूद समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव कई दिनों तक सार्वजनिक रूप से चुप रहे। इसके बाद रविवार को जब राजकुमार भाटी उनसे मिलने पहुंचे तो उन्होंने संयमित भाषा और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की नसीहत दी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक अखिलेश ने साफ कहा कि किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली भाषा से बचना चाहिए।
हालांकि राजनीतिक गलियारों में अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर बयान इतना ही अनुचित था तो पार्टी ने तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की। विपक्ष इसी मुद्दे को लेकर सपा की मंशा पर सवाल उठा रहा है।
माफी नहीं, सिर्फ नसीहत… विपक्ष को मिला नया मुद्दा
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि समाजवादी पार्टी की ओर से अब तक ब्राह्मण समाज से औपचारिक माफी नहीं मांगी गई है। पार्टी ने केवल प्रवक्ता को संयम बरतने की सलाह दिए जाने की जानकारी सार्वजनिक की। ऐसे में विपक्ष इसे ‘डैमेज कंट्रोल’ की रणनीति बता रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोट बैंक हमेशा से अहम भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में इस तरह के बयान चुनावी माहौल में बड़ा असर डाल सकते हैं। बीजेपी पहले से ही खुद को ब्राह्मण हितैषी बताकर इस मुद्दे को हवा देने में जुटी है।
PDA फॉर्मूले में सवर्णों की दूरी पर भी चर्चा
समाजवादी पार्टी पिछले कुछ समय से PDA राजनीति को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रही है। लेकिन इस फॉर्मूले में सवर्ण समुदाय की कम होती भागीदारी को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाटी विवाद ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या सपा अब पूरी तरह नए सामाजिक समीकरण पर दांव खेल रही है।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में और गर्मा सकता है, क्योंकि विपक्ष इसे चुनावी नैरेटिव बनाने की कोशिश में जुट गया है। वहीं सपा के सामने चुनौती यह है कि वह नाराज ब्राह्मण समाज को कैसे साधे और अपने PDA समीकरण को भी कमजोर न होने दे।
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