
भारतीय संगीत जगत में कई ऐसे सितारे आए जिन्होंने अपनी चमक से पूरी दुनिया को रोशन किया, लेकिन एक शख्स ऐसा भी था जिसने कभी दुनिया को अपनी आंखों से नहीं देखा, फिर भी करोड़ों लोगों के दिलों में संगीत के ऐसे रंग भरे जो आज भी फीके नहीं पड़े हैं। हम बात कर रहे हैं दिग्गज संगीतकार और गीतकार रवींद्र जैन की, जिन्हें पूरी फिल्म इंडस्ट्री प्यार से ‘दादू’ कहकर बुलाती थी। अपनी शारीरिक अक्षमता को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाने वाले दादू की जीवन यात्रा किसी प्रेरणा से कम नहीं है।
4 साल की उम्र से शुरू हुआ सुरों का सफर
रवींद्र जैन का जन्म 1944 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। उनके पिता एक जाने-माने संस्कृत विद्वान और आयुर्वेदाचार्य थे। जन्म से ही दृष्टिहीन होने के कारण रवींद्र के सामने चुनौतियों का पहाड़ था, लेकिन उनके पिता ने तय किया था कि वह अपने बेटे को कभी इस कमी का अहसास नहीं होने देंगे। मात्र 4 साल की छोटी सी उम्र से ही रवींद्र के लिए घर पर संगीत की शिक्षा का इंतजाम कर दिया गया। अलीगढ़ के ब्लाइंड स्कूल से शुरुआती शिक्षा लेने के बाद वह मंदिरों में भजन गाने लगे। संगीत के प्रति उनकी दीवानगी उन्हें कोलकाता ले गई, जहां उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं।
जब रिजेक्शन के बाद मुंबई ने थामी बाहें
कहा जाता है कि सफलता का रास्ता कांटों भरा होता है। रवींद्र जैन के साथ भी ऐसा ही हुआ। शुरुआती दिनों में उन्होंने रेडियो स्टेशंस पर कई ऑडिशन दिए, लेकिन उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। साल 1969 में उनके कोलकाता वाले गुरु एक फिल्म बनाने के सिलसिले में उन्हें मुंबई ले आए। हालांकि, उनकी असली पहचान 1972 में आई फिल्म ‘सौदागर’ से बनी। इसके बाद 1975 में ‘गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा’ जैसे गीतों ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। 1978 में जब ‘अंखियों के झरोखों से’ रिलीज हुआ, तो उन्होंने साबित कर दिया कि एक लेखक और संगीतकार के तौर पर उनकी कल्पना शक्ति की कोई सीमा नहीं है।
‘रामायण’ के भजनों से अमर हो गए रवींद्र जैन
रवींद्र जैन का योगदान सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे प्रतिष्ठित धारावाहिक ‘रामायण’ (रामानंद सागर कृत) को जो संगीत दादू ने दिया, वह आज भी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। “हम कथा सुनाते राम सकल गुण धाम की…” जैसी चौपाइयां और भावपूर्ण भजन सुनकर आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। उन्होंने अपनी लेखनी और धुनों के जरिए रामायण के हर पात्र को जीवंत कर दिया।
दादू के यादगार नगमे जो आज भी गुनगुनाता है जमाना
रवींद्र जैन ने अपने करियर में एक से बढ़कर एक हिट गाने दिए। उनके कुछ सबसे लोकप्रिय गीतों की सूची इस प्रकार है:
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अंखियों के झरोखों से (टाइटल ट्रैक)
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गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा (चितचोर)
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जब दीप जले आना (चितचोर)
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श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम
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गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल
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सुन साहिबा सुन (राम तेरी गंगा मैली)
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एक राधा एक मीरा (राम तेरी गंगा मैली)
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सजना है मुझे सजना के लिए (सौदागर)
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कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया (नदिया के पार)
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जोगी जी धीरे-धीरे (नदिया के पार)
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मुझे हक है (विवाह)
रवींद्र जैन आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे गीत और बनाई गई धुनें हमेशा यह याद दिलाती रहेंगी कि अगर इंसान के पास अडिग संकल्प हो, तो शारीरिक कमियां कभी सफलता के आड़े नहीं आ सकतीं।
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