बैंकिंग सिस्टम पर टूटा ‘कैश’ का संकट: 15 दिन में जनता ने निकाले 61,000 करोड़

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चौंकाने वाली और डराने वाली खबर सामने आ रही है। देश के बैंकिंग सेक्टर में अचानक नकदी (Cash) की भारी कमी देखी जा रही है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले महज 15 दिनों के भीतर लोगों ने बैंकों से करीब 61,000 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि निकाल ली है। बैंकों से पैसा निकालने की इस अंधी दौड़ ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘टाइम बम’ की तरह देखा जा रहा है, जो अगर समय रहते नियंत्रित नहीं हुआ, तो बैंकिंग ढांचे को हिलाकर रख सकता है।

आखिर क्यों पैसे निकालने के लिए ‘पागल’ हो रहे हैं लोग?

अचानक बैंकिंग सिस्टम से इतनी बड़ी मात्रा में नकदी का बाहर जाना सामान्य घटना नहीं है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे कई बड़े कारण हो सकते हैं। पहला कारण चुनावों के दौरान बढ़ी नकदी की मांग और दूसरा संभावित रूप से बढ़ती महंगाई के बीच लोगों का सुरक्षित निवेश के बजाय तरल नकदी (Liquid Cash) अपने पास रखने का मोह है। इसके अलावा, शादी-ब्याह के सीजन में भी बड़ी निकासी देखी जाती है, लेकिन 61,000 करोड़ का आंकड़ा उम्मीद से कहीं ज्यादा है। इस स्थिति ने बैंकों के सामने ‘लिक्विडिटी’ यानी नकदी के प्रवाह का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

अर्थव्यवस्था के लिए क्यों है यह ‘टाइम बम’ का संकेत?

जब लोग बैंकों से बड़ी मात्रा में पैसा निकालते हैं और उसे वापस जमा नहीं करते, तो बैंकों की कर्ज देने की क्षमता कम हो जाती है। इसे बैंकिंग की भाषा में ‘लिक्विडिटी डेफिसिट’ कहा जाता है। यदि बैंकों के पास पैसा नहीं होगा, तो ब्याज दरें बढ़ेंगी, जिससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन महंगे हो जाएंगे। यह स्थिति निवेश को रोक देती है और अंततः जीडीपी ग्रोथ को धीमा कर देती है। यही कारण है कि जानकार इसे अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा मान रहे हैं।

RBI की बढ़ी चुनौती, क्या उठाने होंगे सख्त कदम?

नकदी की इस भारी निकासी ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रातों की नींद उड़ा दी है। बाजार में पैसे के संतुलन को बनाए रखने के लिए अब आरबीआई को दखल देना पड़ सकता है। यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो बाजार में मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ने का खतरा भी पैदा हो जाएगा। वर्तमान में स्थिति यह है कि बैंकों को अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। अब देखना यह है कि केंद्रीय बैंक इस ‘कैश संकट’ से निपटने के लिए रेपो रेट या अन्य वित्तीय साधनों का उपयोग किस तरह करता है।