
Tamil Nadu Political Crisis: दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु की राजनीति इस समय एक बड़े संवैधानिक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। चेन्नई के गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, सुपरस्टार से नेता बने विजय (Thalapathy Vijay) की पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) और कांग्रेस के गठबंधन ने सरकार बनाने का दावा तो ठोक दिया है, लेकिन राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर फिलहाल उनके द्वारा पेश किए गए आंकड़ों से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। इस सियासी खींचतान ने राज्य में एक तरह का ‘संवैधानिक संकट’ पैदा कर दिया है, जहां सबकी निगाहें अब राजभवन के अगले कदम पर टिकी हैं।
जादुई आंकड़े से 6 सीटें पीछे ‘विजय’ की सेना
तमिलनाडु विधानसभा की कुल 234 सीटों का गणित इस समय काफी दिलचस्प हो गया है। सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को कम से कम 118 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। वर्तमान में विजय की पार्टी टीवीके (TVK) के पास 107 सीटें हैं और उनके सहयोगी दल कांग्रेस के पास 5 सीटें हैं। दोनों को मिलाकर यह आंकड़ा 112 तक पहुंचता है, जो बहुमत के जादुई आंकड़े से ठीक 6 कदम दूर है। इसी 6 सीटों की कमी ने विजय के मुख्यमंत्री बनने के सपने और राजभवन की मुहर के बीच एक बड़ी दीवार खड़ी कर दी है।
राजभवन बना ‘पावर सेंटर’, राज्यपाल की संतुष्टि जरूरी
जब चुनाव में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो उसे ‘त्रिशंकु विधानसभा’ (Hung Assembly) कहा जाता है। ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका महज एक औपचारिक पद से बढ़कर एक ‘निर्णायक’ की हो जाती है। राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर इस समय बारीकी से उन आंकड़ों की जांच कर रहे हैं जो टीवीके-कांग्रेस गठबंधन ने पेश किए हैं। राजभवन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि क्या विजय के पास उन 6 अतिरिक्त विधायकों का ठोस समर्थन है, जो एक स्थिर सरकार चलाने के लिए अनिवार्य हैं। बिना ठोस दस्तावेजी सबूतों के राज्यपाल कोई भी जल्दबाजी भरा फैसला लेने के मूड में नहीं दिख रहे हैं।
क्या कहता है संविधान? राज्यपाल के पास हैं ये विशेषाधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को विशेष विवेकाधिकार (Discretionary Powers) देता है। राज्यपाल सिर्फ सीटों की गिनती नहीं देखते, बल्कि वे यह भी परखते हैं कि क्या प्रस्तावित सरकार राजनीतिक स्थिरता दे पाएगी। वे चाहें तो सबसे बड़ी पार्टी को न्योता दे सकते हैं या फिर चुनाव के बाद बने गठबंधन की मजबूती को परख सकते हैं। चेन्नई की मौजूदा स्थिति में राज्यपाल यह देख रहे हैं कि क्या विजय का दावा किसी मजबूत राजनीतिक आधार पर टिका है या फिर यह महज एक अस्थाई जोड़तोड़ है। राज्यपाल को यह पूरा हक है कि वे मुख्यमंत्री की नियुक्ति से पहले समर्थन के दावों की गहन पड़ताल करें।
S.R. बोम्मई केस और फ्लोर टेस्ट की तलवार
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ’ मामले में यह साफ कर दिया था कि किसी भी सरकार का असली बहुमत राजभवन के ड्राइंग रूम में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर ‘फ्लोर टेस्ट’ के जरिए साबित होना चाहिए। हालांकि, राज्यपाल एक ‘द्वारपाल’ की तरह यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी को भी मौका देने से पहले उसके पास प्राथमिक संख्या बल हो। अगर विजय का गठबंधन 6 और विधायकों (निर्दलीय या छोटी पार्टियां) के समर्थन पत्र पेश कर देता है, तो राज्यपाल उन्हें शपथ दिलाने के साथ ही एक निश्चित समय के भीतर बहुमत साबित करने का आदेश दे सकते हैं।
आखिरी विकल्प: क्या तमिलनाडु में लगेगा राष्ट्रपति शासन?
अगर यह गतिरोध लंबा खिंचता है और कोई भी दल 118 का आंकड़ा छूने में नाकाम रहता है, तो राज्यपाल के पास अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजने का विकल्प बचता है। ऐसी स्थिति में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है और विधानसभा को ‘निलंबित अवस्था’ (Suspended Animation) में रखा जा सकता है। हालांकि, इसे हमेशा अंतिम हथियार माना जाता है। फिलहाल राज्यपाल की प्राथमिकता यही है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार बने, बशर्ते वह टिकाऊ हो और पहले ही सत्र में गिर न जाए।
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