पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक ऐसा अध्याय लिखा गया है जिसने दशकों पुराने समीकरणों को मिट्टी में मिला दिया। ‘मां, माटी और मानुष’ का नारा देने वाली ममता बनर्जी के अपराजेय माने जाने वाले दुर्ग को ढहाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने 200 से ज्यादा सीटों (206 सीटें) पर जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया है। बंगाल के चुनावी समर में पहली बार कमल पूरी शान के साथ खिला है। शुरुआती रुझानों में भले ही कांटे की टक्कर दिखी, लेकिन जैसे-जैसे ईवीएम के पन्ने खुले, भगवा लहर ने पूरे बंगाल को अपने रंग में रंग लिया। यह जीत न केवल सत्ता परिवर्तन है, बल्कि बंगाल की राजनीतिक तासीर में आए एक गहरे बदलाव का संकेत है।
भवानीपुर में ममता की हार और सुवेंदु का उदय
इस चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर में हार रही। कभी उनके सिपहसालार रहे और अब बीजेपी के कद्दावर नेता सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,000 से अधिक मतों के अंतर से पटखनी दी। ममता बनर्जी की यह हार टीएमसी के लिए एक ऐसा घाव है जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। सुवेंदु अधिकारी ने इस जीत को ‘सनातनी स्वाभिमान’ और ‘सोनार बांग्ला’ के सपने की जीत बताया है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘डर से मुक्ति और प्रगति की शुरुआत’ करार दिया है।
‘डबल इंजन’ सरकार के सामने बंगाल को संवारने की चुनौती
अब जब दिल्ली और कोलकाता, दोनों जगह एक ही दल की सरकार है, तो सबकी नजरें ‘डबल इंजन’ मॉडल पर टिकी हैं। बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल की सुस्त अर्थव्यवस्था और उद्योगों के पलायन को बड़ा मुद्दा बनाया था। नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बंद पड़े कल-कारखानों को दोबारा शुरू करना और निवेशकों का भरोसा जीतना होगा। आयुष्मान भारत और किसान सम्मान निधि जैसी केंद्रीय योजनाओं को तुरंत लागू करना सरकार की पहली प्राथमिकता हो सकती है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इस राजनीतिक स्थिरता से बंगाल अब देश का नया इन्वेस्टमेंट हब बन सकता है।
विपक्षी एकता (INDIA गठबंधन) के लिए बड़ा झटका
बंगाल के नतीजों ने न केवल टीएमसी बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बने ‘INDIA’ गठबंधन की उम्मीदों को भी करारा झटका दिया है। बंगाल को मोदी लहर के सामने एक अभेद्य दीवार माना जाता था, लेकिन इस दीवार के गिरने से विपक्षी खेमे में मायूसी छा गई है। राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि क्षेत्रीय पहचान की राजनीति अब राष्ट्रीय नैरेटिव के सामने कमजोर पड़ती दिख रही है। 2029 के आम चुनाव की राह अब एनडीए के लिए और भी आसान नजर आने लगी है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सीएए पर जनता की मुहर
दशकों तक वामपंथी और फिर टीएमसी की राजनीति का केंद्र रहे बंगाल के ‘DNA’ में बीजेपी ने सेंध लगा दी है। पार्टी ने रवींद्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद के विचारों को अपने राष्ट्रवाद के साथ जोड़कर एक नया नैरेटिव तैयार किया, जिसे जनता ने स्वीकार कर लिया। इसके अलावा, घुसपैठ और सीएए (CAA) जैसे मुद्दों पर पार्टी के कड़े रुख को भी इस जीत का एक मुख्य आधार माना जा रहा है। अब देखना यह होगा कि नई सरकार बंगाल के गौरवशाली इतिहास और विकास के बीच कैसे तालमेल बिठाती है।
girls globe
