Lipulekh Dispute: कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियों के बीच नेपाल का कड़ा रुख, लिपुलेख और कालापानी पर फिर जताया अपना हक

भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा को दोबारा शुरू करने की सुगबुगाहट के बीच हिमालयी राजनीति में हलचल तेज हो गई है। नेपाल सरकार ने इस प्रस्तावित मार्ग पर कड़ा विरोध जताते हुए स्पष्ट किया है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का क्षेत्र उसकी संप्रभुता का हिस्सा है। काठमांडू की इस आपत्ति ने एक बार फिर भारत, चीन और नेपाल के बीच के सीमा विवाद को अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है।

सुगौली संधि और नेपाल के दावे

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर भारत और बीजिंग (चीन) दोनों को अपनी नाराजगी से अवगत कराया है। नेपाल के दावों का आधार 1816 की सुगौली संधि है। नेपाल का तर्क है कि इस संधि के अनुसार महाकाली नदी के पूर्व के सभी भूभाग, जिनमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख शामिल हैं, नेपाल के अंतर्गत आते हैं। काठमांडू ने कूटनीतिक चैनलों के जरिए संदेश भेजा है कि उसकी अनुमति के बिना इस विवादित क्षेत्र में किसी भी प्रकार की बुनियादी ढांचे के निर्माण, व्यापार या पर्यटन गतिविधि को वह अपने कानून का उल्लंघन मानता है।

रणनीतिक और धार्मिक रूप से क्यों अहम है लिपुलेख?

लिपुलेख दर्रा उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है और इसकी ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 5,334 मीटर है।

  • धार्मिक महत्व: यह कैलाश मानसरोवर जाने वाले भारतीय श्रद्धालुओं के लिए सबसे पुराना और सुगम मार्ग है।

  • रणनीतिक महत्व: यह भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के बीच एक महत्वपूर्ण ‘ट्राई-जंक्शन’ है।

  • व्यापारिक महत्व: 1992 में यह भारत का पहला आधिकारिक सीमा व्यापारिक पोस्ट बना था, जो चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों की धुरी रहा है।

विवाद की असल जड़: काली नदी का उद्गम

भारत और नेपाल के बीच इस विवाद का मुख्य कारण काली नदी के स्रोत की व्याख्या है।

  1. नेपाल का पक्ष: नेपाल का मानना है कि काली नदी लिम्पियाधुरा से निकलती है, जिसके कारण लिपुलेख उसका क्षेत्र बन जाता है।

  2. भारत का पक्ष: भारत का रुख स्पष्ट है कि नदी कालापानी गांव के पास से निकलती है, और ऐतिहासिक व प्रशासनिक तौर पर यह क्षेत्र हमेशा से भारत के नियंत्रण में रहा है।

    उल्लेखनीय है कि 2020 में नेपाल ने अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को आधिकारिक तौर पर शामिल कर लिया था, जिसे भारत ने ‘एकतरफा और ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत’ बताकर खारिज कर दिया था।

क्या है वर्तमान स्थिति और भविष्य की योजना?

भारत ने साल 2020 में धारचूला से लिपुलेख तक 80 किलोमीटर की सड़क का निर्माण कर कनेक्टिविटी को मजबूत किया था। अगस्त 2025 में भारत और चीन के बीच लिपुलेख सहित तीन हिमालयी दर्रों को खोलने पर सहमति बनी थी। लक्ष्य है कि जून 2026 तक इस मार्ग को तीर्थयात्रियों के लिए पूरी तरह बहाल कर दिया जाए। हालांकि, नेपाल के ताजा रुख ने इस दिशा में कूटनीतिक पेच फंसा दिया है। नेपाल ने शांतिपूर्ण कूटनीति के जरिए समाधान की बात कही है, लेकिन उसकी यह आपत्ति आगामी यात्रा सीजन के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।