चिट्ठियां और पगडंडियों का सहारा, जानें कैसे इजरायल और अमेरिका को छका रहे ईरानी सुप्रीम लीडर खामेनेई

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News India Live, Digital Desk: दुनिया जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सैटेलाइट ट्रैकिंग के दौर में जी रही है, वहीं ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने इजरायल की मोसाद और अमेरिका की सीआईए (CIA) को मात देने के लिए ‘पाषाण युग’ की तकनीक अपना ली है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह खुलासा हुआ है कि खामेनेई अपनी सुरक्षा के लिए स्मार्टफोन या पेजर नहीं, बल्कि हाथ से लिखी चिट्ठियों और गांव की कच्ची पगडंडियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस पुरानी पद्धति ने आधुनिक जासूसी तंत्र के कान खड़े कर दिए हैं।

डिजिटल सिग्नल से तौबा, कागज-कलम पर भरोसा

हाल ही में हिजबुल्लाह के पेजर धमाकों और लेबनान में हुए इलेक्ट्रॉनिक हमलों के बाद ईरान के सुरक्षा घेरे में बड़ा बदलाव आया है। इंटेलिजेंस रिपोर्ट बताती है कि खामेनेई अब अपने कमांडरों को किसी भी प्रकार का डिजिटल संदेश नहीं भेज रहे हैं। इसके बजाय, भरोसेमंद दूतों के जरिए हाथ से लिखे संदेश (Handwritten Letters) भेजे जा रहे हैं। इन संदेशों को ट्रैक करना किसी भी आधुनिक रडार या जासूसी सॉफ्टवेयर के लिए नामुमकिन है क्योंकि इनमें कोई इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल पैदा नहीं होता।

पगडंडियों का सफर और ‘अदृश्य’ सुरक्षा चक्र

इजरायली मिसाइलों और ड्रोन्स की नजरों से बचने के लिए खामेनेई के काफिले ने मुख्य हाईवे का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया है। बताया जा रहा है कि वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए गांवों के कच्चे रास्तों और पगडंडियों का सहारा ले रहे हैं। इन रास्तों पर भारी सुरक्षा तामझाम के बजाय साधारण गाड़ियों का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि आसमान से निगरानी कर रहे ड्रोन्स को किसी वीआईपी मूवमेंट का शक न हो। यह ‘लो-टेक’ रणनीति इजरायल की उस तकनीक के खिलाफ एक मजबूत ढाल बन गई है जो मोबाइल सिग्नल और जीपीएस के आधार पर पिन-पॉइंट टारगेट करती है।

मोसाद के लिए बनी बड़ी चुनौती

इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद को दुनिया की सबसे सटीक सर्विलांस एजेंसी माना जाता है, लेकिन ईरान की इस ‘बैक टू बेसिक्स’ रणनीति ने उसे उलझा दिया है। जब कोई संदेश हवा (Airwaves) में होगा ही नहीं, तो उसे इंटरसेप्ट कैसे किया जाएगा? खामेनेई का यह बदला हुआ अंदाज बताता है कि वे हिजबुल्लाह और हमास के नेताओं के हश्र से सबक ले चुके हैं। ईरान अब अपनी पूरी संचार प्रणाली को ‘ऑफलाइन’ मोड में ले जाने की कोशिश कर रहा है ताकि युद्ध की स्थिति में उसका नेतृत्व सुरक्षित रह सके।

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