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सोनिया गांधी का बड़ा हमला: 12 साल में लोकतंत्र को भारी चोट, अब जनता को हो रहा नुकसान का अहसास

देश की राजनीति के शीर्ष नेतृत्व में शुमार और कांग्रेस संसदीय दल की वरिष्ठ मार्गदर्शक सोनिया गांधी ने केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी सरकार की कार्यशैली पर बेहद तीखा और वैचारिक हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पिछले 12 वर्षों के शासनकाल के दौरान देश के लोकतांत्रिक ढांचे, स्वायत्त संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने को ऐसी गहरी चोट पहुंचाई गई है जिसकी भरपाई आने वाले लंबे समय तक करना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। अंग्रेजी दैनिक ‘द हिंदू’ को दिए एक विशेष और बेबाक साक्षात्कार में सोनिया गांधी ने कहा कि अब भारत की आम जनता को इस सुनियोजित नुकसान का धरातल पर गहरा अहसास होने लगा है। देश के विभिन्न हिस्सों में नागरिकों के भीतर वर्तमान शासन प्रणाली और व्यवस्था को लेकर बेचैनी और असंतोष साफ महसूस किया जा रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि जब लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर किया जाता है, तो उसका सीधा असर समाज की एकता और नागरिक अधिकारों पर पड़ता है। सोनिया गांधी ने उम्मीद जताई कि आगामी समय में जब जनता के जनादेश से सरकार बदलेगी, तो देश में एक पारदर्शी और संवेदनशील सुशासन की पुनर्स्थापना होगी। हालांकि उन्होंने यह यथार्थवादी चेतावनी भी दी कि पिछले एक दशक से अधिक समय में जिन संवैधानिक स्तंभों को खोखला किया गया है, उन्हें पहले की तरह स्वतंत्र और मजबूत बनाने के लिए महज सरकार बदलना काफी नहीं होगा, बल्कि इसके लिए देश के सभी जिम्मेदार राजनीतिक दलों को लंबे समय तक एक साथ मिलकर ईमानदार प्रयास करने होंगे। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने स्पष्ट किया कि वे देश की अंतर्निहित शक्ति और लोकतंत्र के भविष्य को लेकर पूरी तरह आशावादी हैं।

सोनिया गांधी का यह बहुचर्चित और विस्तृत साक्षात्कार उनकी बहुप्रतीक्षित आत्मकथात्मक पुस्तक ‘बिलोंगिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ (Belonging: A Journey of Love) के वैश्विक प्रकाशन से ठीक पहले सामने आया है। हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित की जा रही यह पुस्तक 10 नवंबर को औपचारिक रूप से पाठकों के सामने आने वाली है। इस किताब में उन्होंने अपने जीवन के हर उस अनछुए और संवेदनशील पहलू को विस्तार से कलमबद्ध किया है जो इटली के उनके बचपन से लेकर भारत की ऐतिहासिक राजनीतिक यात्रा तक फैला हुआ है। किताब में उन्होंने भारत की माटी से अपने आत्मिक जुड़ाव, गांधी परिवार में एक बहू के रूप में प्रवेश, राजीव गांधी के साथ बिताए सुख-दुख के अनमोल पल, त्रासदियों के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर संभालने और आज के समकालीन राजनीतिक परिदृश्य पर अपने अंतर्मन के विचारों को बेहद भावुक और निर्भीक तरीके से साझा किया है। साक्षात्कार के दौरान उन्होंने बताया कि यह किताब किसी राजनीतिक घोषणापत्र के बजाय उनके जीवन के अनुभवों, नैतिक संघर्षों और भारत के प्रति उनकी निष्ठा की एक प्रमाणिक दास्तान है, जो देश के मौजूदा राजनीतिक संकट को भी एक व्यापक मानवीय और संवैधानिक नजरिए से देखने की कोशिश करती है।

कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति और चुनावी चुनौतियों पर बात करते हुए सोनिया गांधी ने किसी भी तरह की निराशा को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने दो टूक शब्दों में आरोप लगाया कि मौजूदा दौर में विपक्ष के लिए चुनावी मैदान अब निष्पक्ष और समतल नहीं रह गया है। सत्ताधारी दल ने संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर लगभग सभी स्वायत्त नियामक संस्थाओं, विशेष रूप से चुनाव आयोग पर अपना अघोषित नियंत्रण स्थापित कर रखा है। इसके अतिरिक्त देश की मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार के सीधे प्रभाव में काम कर रहा है, जिससे जनसरोकार के वास्तविक मुद्दे दब जाते हैं और केवल एकतरफा नैरेटिव को आगे बढ़ाया जाता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि राजनीति में बेहिसाब काले धन और धर्म के खुलेआम भावनात्मक इस्तेमाल से स्वस्थ लोकतांत्रिक मुकाबले की निष्पक्षता को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया है। सोनिया गांधी ने कहा कि इन तमाम विपरीत परिस्थितियों, जांच एजेंसियों के लगातार दबाव और उत्पीड़न के बावजूद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और जमीनी नेताओं का मनोबल नहीं टूटा है। बूथ स्तर से लेकर जिला और राष्ट्रीय स्तर तक कांग्रेस कार्यकर्ता संविधान और लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा के लिए अडिग खड़े हैं। उन्होंने हालिया चुनावों में सामने आई प्रशासनिक गड़बड़ियों और वोटिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव का जिक्र करते हुए कहा कि इन घटनाओं ने देश के जागरूक मतदाताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उनके मताधिकार की वास्तविक ताकत कैसे सुरक्षित रखी जाए।

विपक्षी गठबंधन की भावी संभावनाओं और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की एकजुटता पर चर्चा करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि कांग्रेस निरंतर समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के साथ तालमेल बिठाकर काम कर रही है। जमीनी हकीकत के साथ जिस तरह से कांग्रेस ने तमाम संकटों के बीच खुद को एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में खड़ा रखा है, वह उसकी वैचारिक दृढ़ता और आंतरिक ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की संभावनाएं दिन-ब-दिन और अधिक परिपक्व और मजबूत होती जा रही हैं। व्यावहारिक राजनीति में गठबंधन की जटिलताओं को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि व्यापक जनहित में कभी-कभी ऐसे दलों के साथ भी न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति बनानी पड़ती है जिनकी मूल विचारधारा कांग्रेस से पूरी तरह मेल नहीं खाती। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ऐसे समझौते उनके व्यक्तिगत स्वभाव को कभी बहुत सहज नहीं लगे। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने पूरी दृढ़ता से स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विभाजनकारी और सांप्रदायिक विचारों के साथ कांग्रेस ने कभी कोई वैचारिक समझौता नहीं किया है और न ही भविष्य में कभी ऐसा कोई समझौता संभव है। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता पर पार्टी की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भले ही पार्टी के कुछ नेताओं की व्यक्तिगत राय अलग रही हो, लेकिन कांग्रेस का आधिकारिक और बुनियादी संकल्प यही रहा है कि प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भय के अपने धर्म, आस्था और विश्वास का पालन करने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए।

वर्ष 2004 में कांग्रेस की ऐतिहासिक चुनावी जीत के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी न स्वीकार करने के अपने बहुचर्चित फैसले पर बात करते हुए सोनिया गांधी ने साफ किया कि उन्हें अपने उस निर्णय पर कभी कोई पछतावा या मलाल नहीं रहा। उस दौर में डॉक्टर मनमोहन सिंह ने देश के प्रधानमंत्री के रूप में सरकार का बेहद कुशल, गरिमापूर्ण और ऐतिहासिक नेतृत्व किया, जबकि उन्होंने खुद संगठन और पार्टी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी संभाली। दोनों ने एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र का सम्मान करते हुए एक मजबूत और भरोसेमंद टीम की तरह काम किया, जिसने देश को विकास और सामाजिक सुरक्षा की कई ऐतिहासिक योजनाएं दीं। अपने निजी और राजनीतिक संस्कारों का श्रेय देते हुए उन्होंने कहा कि भारत आने के बाद स्वर्गीय इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के सानिध्य ने उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह गढ़ा। दोनों ही नेताओं का अदम्य साहस, धर्मनिरपेक्ष भारत के प्रति अटूट निष्ठा, समाज के कमजोर तबकों के प्रति संवेदनशीलता और राष्ट्र सेवा को सर्वोच्च रखने का भाव उनके जीवन का स्थायी मार्गदर्शन बना रहा। उन्होंने यह भी साझा किया कि इटली में परवरिश पाने के कारण परिवार, निष्ठा और जिम्मेदारी के जो नैतिक मूल्य उन्हें बचपन में मिले थे, वे आज भी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास के विवादित दौर पर बेहद परिपक्व रुख अपनाते हुए सोनिया गांधी ने आपातकाल को देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक काला अध्याय करार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि उस समय नागरिक स्वतंत्रताओं और बंदी प्रत्यक्षीकरण के अधिकारों को निलंबित किया गया था, लेकिन स्वयं इंदिरा गांधी ने बाद में जनभावनाओं को समझते हुए मार्च 1977 में स्वतंत्र चुनाव कराने का साहसिक फैसला लिया था और उस दौरान हुई प्रशासनिक ज्यादतियों के लिए सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करते हुए देश से माफी भी मांगी थी, जो उनके लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण को दर्शाता है।