
देशभर में पेट्रोल के बढ़ते दामों और ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर लागू किए गए एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को लेकर भारतीय राजनीति में एक नया और गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक विस्तृत और आक्रामक बयान जारी करते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर सीधा हमला बोला है। राहुल गांधी ने कर्नाटक सरकार द्वारा कराई गई एक आधिकारिक वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि देश के आम नागरिकों की गाड़ियों से सरेआम पेट्रोल की चोरी की जा रही है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिस ईंधन को सरकार स्वच्छ ऊर्जा और आत्मनिर्भरता का नाम देकर E20 पेट्रोल बताकर बेच रही है, वह असल में आम जनता के साथ एक बड़ा ‘420’ यानी भारी वित्तीय और तकनीकी धोखा बन चुका है। केंद्र सरकार का दावा रहा है कि इस पेट्रोल में केवल 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जाता है, लेकिन प्रयोगशालाओं की जांच में सामने आए तथ्य इसके बिल्कुल उलट एक गंभीर विसंगति की ओर इशारा कर रहे हैं।
विपक्ष के नेता के इस विस्फोटक बयान के बाद देश के करोड़ों वाहन चालकों, ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों के बीच हलचल तेज हो गई है। राहुल गांधी का आरोप है कि तेल विपणन कंपनियां आम उपभोक्ताओं से शुद्ध और महंगे पेट्रोल का पूरा पैसा वसूल रही हैं, जबकि उनकी गाड़ियों के ईंधन टैंक में सस्ते एथेनॉल की अत्यधिक मात्रा ठूंस दी जा रही है। यह मामला सिर्फ उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश में चल रहे करोड़ों गैर-E20 अनुकूल वाहनों के इंजनों की सुरक्षा, उनकी दीर्घकालिक कार्यक्षमता और आम जनता के अधिकार से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। इस खुलासे के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय और तेल कंपनियों की गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।
इस पूरे राजनीतिक और तकनीकी विवाद की जड़ कर्नाटक सरकार द्वारा कराई गई एक व्यापक और स्वतंत्र जांच रिपोर्ट है। कर्नाटक के खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों के विभाग ने राज्य के सात अलग-अलग जिलों के पेट्रोल पंपों से औचक निरीक्षण के दौरान पेट्रोल के 14 नमूने एकत्र किए थे। इन सभी नमूनों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अधिकृत रासायनिक प्रयोगशालाओं में गहन परीक्षण के लिए भेजा गया था। जब इन प्रयोगशालाओं की आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने आई, तो उसने अधिकारियों और विशेषज्ञों दोनों को हतप्रभ कर दिया। एकत्रित किए गए कुल 14 नमूनों में से 11 नमूनों में एथेनॉल का स्तर सरकार द्वारा निर्धारित 20 प्रतिशत की वैधानिक सीमा से कहीं अधिक पाया गया।
इस जांच रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह उजागर हुई कि देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) के पेट्रोल पंप से लिए गए सैंपल में एथेनॉल की मात्रा 31.2 प्रतिशत तक दर्ज की गई। इसी तरह हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के ईंधन में एथेनॉल की मौजूदगी 30.5 प्रतिशत तक पाई गई। जांच के घेरे में केवल सरकारी तेल कंपनियां ही नहीं आईं, बल्कि भारत पेट्रोलियम (BPCL) के साथ-साथ निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां जैसे नायरा एनर्जी (Nayara) और शेल (Shell) के आउटलेट्स से लिए गए नमूनों में भी एथेनॉल की मात्रा तय सरकारी सीमा से काफी ज्यादा निकली। राहुल गांधी ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि जब इन कंपनियों की अपनी इन-हाउस प्रयोगशालाओं से जांच रिपोर्ट मांगी गई, तो उन्होंने अपनी परीक्षण रिपोर्टों में पेट्रोल के भीतर मौजूद वास्तविक एथेनॉल प्रतिशत का कोई उल्लेख ही नहीं किया, जो एक सुनियोजित मिलीभगत और पारदर्शिता के अभाव को दर्शाता है।
राहुल गांधी ने अपने बयान में इस नीति के सीधे दुष्प्रभावों का तकनीकी और आर्थिक विश्लेषण करते हुए आम वाहन मालिकों की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने लिखा कि उपभोक्ता हर लीटर पर 100 रुपये से अधिक की भारी-भरकम कीमत चुका रहे हैं, जो महंगे पेट्रोल के हिसाब से वसूली जाती है, जबकि तेल कंपनियां उसमें सस्ता एथेनॉल मिलाकर मोटा मुनाफा कमा रही हैं। इसका सीधा और तात्कालिक नुकसान देश के उस मध्यमवर्गीय परिवार को उठाना पड़ रहा है, जिसने अपनी गाढ़ी कमाई से दोपहिया या चौपहिया वाहन खरीदा है। उन्होंने तकनीकी पहलुओं पर बात करते हुए समझाया कि भारत की सड़कों पर दौड़ने वाली अधिकांश पुरानी और यहां तक कि कई नई गाड़ियां भी 20 या 30 प्रतिशत से अधिक एथेनॉल मिश्रण को सहन करने के लिए तकनीकी रूप से डिजाइन नहीं की गई हैं।
ऑटोमोबाइल इंजीनियरों के अनुसार, एथेनॉल में नमी सोखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, जिसके कारण ईंधन प्रणाली में जंग लगने, रबर की पाइपों के गलने और फ्यूल इंजेक्टर के जाम होने का गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। इसके अतिरिक्त, एथेनॉल का ऊर्जा घनत्व (Energy Density) शुद्ध गैसोलीन की तुलना में काफी कम होता है, जिसके चलते ईंधन में एथेनॉल का अनुपात 30 प्रतिशत तक पहुंचते ही वाहन के औसत माइलेज में 10 से 15 प्रतिशत की भारी गिरावट आ जाती है। राहुल गांधी ने चेताया कि इसका सीधा मतलब यह है कि जनता को बार-बार पेट्रोल पंप के चक्कर लगाने पड़ेंगे, माइलेज बुरी तरह गिरेगा और आए दिन गाड़ियों को ठीक कराने के लिए गैरेज और मैकेनिक के पास जाना पड़ेगा, जिससे लोगों की मेहनत की कमाई से खरीदी गई गाड़ियां समय से पहले ही कबाड़ में बदल जाएंगी।
कांग्रेस नेता ने पूरे मामले को नीतिगत विफलता और उपभोक्ता अधिकारों के घोर हनन का मामला बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे पांच तीखे सवाल पूछे हैं। उन्होंने सवाल दागा कि प्रधानमंत्री देश को स्पष्ट करें कि भारतीय नागरिकों की गाड़ियों की टंकियों में असल में क्या भरा जा रहा है? देश में बिक रहे पेट्रोल में एथेनॉल की सटीक और पारदर्शी मात्रा कितनी है? 20 प्रतिशत से अधिक अनधिकृत और गैरकानूनी मिलावट करने वाली सरकारी और निजी तेल विपणन कंपनियों के खिलाफ केंद्र सरकार कब सख्त दंडात्मक कार्रवाई करेगी? इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया कि देश के किसी भी पेट्रोल पंप पर स्पष्ट सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया है जो यह बताए कि ग्राहक की गाड़ी में किस अनुपात का ब्लेंडेड फ्यूल डाला जा रहा है।
राहुल गांधी ने इस बात को भी प्रमुखता से उठाया कि दुनिया के विकसित देशों में जहां बायोफ्यूल का इस्तेमाल होता है, वहां उपभोक्ताओं को यह लोकतांत्रिक और उपभोक्ता अधिकार दिया जाता है कि वे अपनी गाड़ी के इंजन की बनावट के अनुसार सामान्य पेट्रोल या एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल में से किसी एक को चुन सकें। भारत में उपभोक्ताओं के सामने ऐसा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं कराया गया है और उन्हें अनिवार्य रूप से अत्यधिक मिश्रित पेट्रोल खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है। अपने बयान के अंत में उन्होंने प्रधानमंत्री को डिबेट की पुरानी चुनौती याद दिलाते हुए कहा कि खुली बहस की चुनौती अब भी बरकरार है और इस नए मुद्दे को भी उस बहस की कार्यसूची में जोड़ा जाएगा। उन्होंने अंतिम सवाल पूछते हुए सरकार से जवाब मांगा कि इस पूरी अनियंत्रित और गैर-पारदर्शी नीति से वास्तव में देश की जनता को फायदा हो रहा है या फिर कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों और तेल सिंडिकेट्स की तिजोरियां भरी जा रही हैं।
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