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वाघा बॉर्डर पर फिल्म प्रमोशन के दौरान बजी Atif Aslam की कव्वाली: ‘ताजदार-ए-हरम’ से गूंजी सीमा

भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित ऐतिहासिक अटारी-वाघा बॉर्डर पर बीते दिन एक ऐसा अप्रत्याशित और अनोखा दृश्य देखने को मिला, जिसने सोशल मीडिया पर भूचाल ला दिया है। बॉलीवुड अभिनेता आयुष्मान खुराना और अभिनेत्री सारा अली खान अपनी नई रिलीज स्पाई-कॉमेडी फिल्म ‘उड़ता तीर’ के प्रमोशन के सिलसिले में पंजाब में अटारी बॉर्डर पहुंचे थे। सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों और वहां मौजूद हजारों देशभक्त दर्शकों के बीच दोनों कलाकार अपनी फिल्म के प्रचार और बातचीत में व्यस्त थे, लेकिन तभी सरहद के दूसरी तरफ से एक ऐसी जानी-पहचानी और रूहानी आवाज गूंजी जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। पाकिस्तान की तरफ से मशहूर गायक आतिफ असलम की आवाज में गाई गई 11 साल पुरानी सदाबहार कव्वाली ‘ताजदार-ए-हरम’ बजने लगी। इस कव्वाली की तेज और मखमली धुन ने कुछ ही पलों में सारा और आयुष्मान की आवाज को पृष्ठभूमि में धकेल दिया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो जैसे ही एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर आया, वह देखते ही देखते वायरल हो गया और दोनों मुल्कों के संगीत प्रेमियों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया।

घटना उस समय की है जब आयुष्मान खुराना और सारा अली खान मीडिया कर्मियों और दर्शकों के कैमरों के सामने अपनी फिल्म की कहानी और किरदारों के बारे में साझा कर रहे थे। दोनों सितारे अपने प्रशंसकों का अभिवादन कर रहे थे और सुरक्षा बलों के साथ देशभक्ति का माहौल साझा कर रहे थे। ठीक उसी समय सीमा के उस पार यानी वाघा की तरफ लगे बड़े स्पीकरों से कोक स्टूडियो वाली कव्वाली के सुर सुनाई देने लगे। पहले तो किसी को समझ नहीं आया कि अचानक यह संगीत कहां से शुरू हुआ, लेकिन जैसे ही आतिफ असलम का आलाप और ‘ताजदार-ए-हरम’ के शब्द हवा में तैरने लगे, वहां मौजूद लोगों के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। वीडियो में साफ दिख रहा है कि कैसे बॉलीवुड प्रमोशन के बीच सीमा पार से बज रहे इस संगीत ने पूरे माहौल की दिशा ही बदल दी। सोशल मीडिया यूजर्स इस क्लिप को जमकर री-शेयर कर रहे हैं और कह रहे हैं कि सरहद पर चाहे कितना भी तनाव और कूटनीतिक खिंचाव क्यों न हो, संगीत की अपनी एक अलग ही ताकत और दुनिया होती है।

जिस कव्वाली की धुन ने वाघा बॉर्डर पर हलचल मचाई, वह कोई साधारण गीत नहीं बल्कि आधुनिक संगीत इतिहास की सबसे सफल कृतियों में से एक है। आतिफ असलम ने वर्ष 2015 में ‘कोक स्टूडियो पाकिस्तान’ के आठवें सीजन के उद्घाटन ट्रैक के रूप में ‘ताजदार-ए-हरम’ को अपनी आवाज दी थी। रिलीज होते ही इस गाने ने यूट्यूब पर व्यूज के तमाम ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ दिए थे और यह पहला ऐसा पाकिस्तानी गाना बना था जिसे करोड़ों बार देखा गया। आतिफ असलम ने अपने रॉक और पॉप स्टाइल से हटकर जब इस पारंपरिक सूफियाना कलाम को आधुनिक वाद्ययंत्रों और गिटार-तबले के फ्यूजन के साथ पेश किया, तो यह सीमाओं के पार भारत में भी घर-घर में सुना जाने लगा। आज 11 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस गीत की ताजगी और आध्यात्मिक गहराई जरा भी कम नहीं हुई है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण वाघा बॉर्डर पर देखने को मिला।

‘ताजदार-ए-हरम’ मूल रूप से उर्दू और फारसी शायरी से प्रेरित एक बेहद पवित्र सूफियाना नत और कव्वाली है। शाब्दिक अर्थों में ‘ताजदार-ए-हरम’ का मतलब ‘पवित्र स्थल (हरम यानी मक्का-मदीना) का ताज पहनने वाला राजा’ होता है। ऐतिहासिक रूप से इस कालजयी कव्वाली को सबसे पहले 1960 के दशक में विख्यात कव्वाल जोड़ी साबरी ब्रदर्स (गुलाम फरीद साबरी और मकबूल अहमद साबरी) ने अपनी बुलंद आवाज में गाकर पूरी दुनिया में मशहूर किया था। आतिफ असलम ने 2015 में इस क्लासिक रचना को गाकर वास्तव में साबरी ब्रदर्स की सांगीतिक विरासत को श्रद्धांजलि दी थी। इस कव्वाली के अंतर्निहित भाव पैगंबर से की गई एक अत्यंत विनम्र, भावुक और रूहानी फरियाद (प्रार्थना) हैं। इसमें एक बेबस इंसान अपनी जिंदगी की सांसारिक कठिनाइयों, परेशानियों और दुखों से निजात पाने के लिए ईश्वर और उनके दूत से दया की एक नजर और आध्यात्मिक शिफारिश की गुहार लगाता है। शब्दों की इसी रूहानियत और दर्द की वजह से यह कव्वाली हर धर्म और वर्ग के श्रोता के दिल में सीधे उतर जाती है।

अटारी-वाघा बॉर्डर पर कैद हुए इस वीडियो ने इंटरनेट की दुनिया में एक सकारात्मक और भावुक बहस छेड़ दी है। एक्स पर एक यूजर ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि जहां एक तरफ बॉलीवुड अपनी फिल्म का प्रचार कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ से पाकिस्तान ने आतिफ की कव्वाली बजाकर माहौल को संगीतमय बना दिया। कई भारतीय यूजर्स ने टिप्पणी की कि कला, सुर और अल्फाज किसी वीजा या पासपोर्ट के मोहताज नहीं होते। भारत में आतिफ असलम के लाखों चाहने वाले हैं जिन्होंने उनके गाए बॉलीवुड गानों को आज भी अपनी प्लेलिस्ट में सहेज कर रखा है। सीमा की फेंसिंग के आर-पार गूंजती इस कव्वाली ने लोगों को यह अहसास कराया कि भले ही दोनों देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक दूरियां कितनी भी गहरी हों, लेकिन साझी सांस्कृतिक विरासत और संगीत की मिठास दोनों तरफ के लोगों के दिलों को जोड़ने का जरिया बनी रहती है।