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ऑफिस या कॉलेज जाते हैं? बढ़ते प्रदूषण और खराब AQI के बीच खुद को सेफ रखने के लिए अपनाएं ये जरूरी टिप्स

सर्दियों की शुरुआत के साथ ही देश के कई प्रमुख शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से खतरनाक सीमा को पार करने लगा है। राजधानी दिल्ली-एनसीआर से लेकर उत्तर भारत के औद्योगिक और घनी आबादी वाले इलाकों में एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI का लगातार गिरना हर नागरिक के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी बजा रहा है। सड़कों पर दौड़ते वाहनों का अनियंत्रित धुआं, पड़ोसी राज्यों में बड़े पैमाने पर जलाई जा रही पराली, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और हवा की धीमी गति ने मिलकर पूरे वातावरण को एक जहरीली गैस चैंबर में तब्दील कर दिया है। यह स्थिति सबसे अधिक उन कामकाजी लोगों और युवाओं के लिए चुनौतीपूर्ण है जिन्हें अपनी आजीविका और पढ़ाई के सिलसिले में रोजाना ऑफिस या कॉलेज जाना पड़ता है। हवा में तैरने वाले अति सूक्ष्म पार्टिकुलेट मैटर जैसे पीएम 2.5 और पीएम 10 सांसों के जरिए सीधे हमारे श्वसन तंत्र में प्रवेश कर रहे हैं। इन जहरीले कणों का लंबे समय तक संपर्क फेफड़ों के ऊतकों को गहराई से नुकसान पहुंचाता है और अस्थमा, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस तथा क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज जैसी जानलेवा बीमारियों के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। ऐसे खतरनाक माहौल में अपनी दिनचर्या को जारी रखते हुए अपने फेफड़ों और समग्र स्वास्थ्य की हिफाजत करना बेहद जरूरी हो गया है।

यदि आपका काम ऐसा है कि आपको रोज घर की दहलीज लांघकर ट्रैफिक और भीड़भाड़ के बीच निकलना पड़ता है, तो सबसे बुनियादी और प्रभावी सुरक्षा उपाय को अपनी आदत में शामिल कर लें। जब भी घर से बाहर कदम रखें, तो हमेशा प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता वाला N95 या N99 रेस्पिरेटर मास्क सही फिटिंग के साथ पहनें। कई लोग चेहरे पर साधारण सूती रुमाल, दुपट्टा या सामान्य सर्जिकल मास्क लपेट लेते हैं, लेकिन मेडिकल रिसर्च से यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि ये कपड़े हवा में मौजूद 2.5 माइक्रोन से भी छोटे जहरीले कणों को रोकने में पूरी तरह अक्षम होते हैं। ये सूक्ष्म कण साधारण कपड़े के रेशों को पार करके सीधे आपके फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं। इसके साथ ही, जब भी आपके इलाके का वायु गुणवत्ता सूचकांक बहुत खराब या गंभीर श्रेणी में दर्ज हो, तो सुबह-सुबह की ताजी हवा के भ्रम में खुली सड़कों या पार्कों में दौड़ने, तेज टहलने या भारी वर्कआउट करने से पूरी तरह परहेज करें। सुबह और देर शाम के समय ठंडी हवा के चलते प्रदूषण की परत जमीन के सबसे करीब होती है, इसलिए उस वक्त बाहर गहरी सांस लेना शरीर में सीधे जहर भरने जैसा है। इसके बजाय घर के अंदर ही स्ट्रेचिंग और हल्की एक्सरसाइज से खुद को चुस्त-दुरुस्त रखें।

अधिकांश लोगों के मन में यह गलतफहमी होती है कि प्रदूषण का खतरा केवल चारदीवारी के बाहर सड़कों पर ही मौजूद है, जबकि वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इनडोर एयर पॉल्यूशन भी उतना ही खतरनाक हो सकता है। बाहर की दूषित हवा खिड़कियों और दरवाजों की झिर्रियों से हमारे घरों और कार्यस्थलों में दाखिल होकर बंद कमरों में जमा हो जाती है। इसलिए अपनी इनडोर एयर क्वालिटी को बेहतर बनाने के लिए संभव हो तो मुख्य कमरों और वर्कस्पेस में उच्च क्षमता वाले HEPA (हाई-एफिशिएंसी पार्टिकुलेट एयर) फिल्टर से लैस एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें। इसके अतिरिक्त, अपने रहने और काम करने की जगह पर प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर कहे जाने वाले इनडोर प्लांट्स जैसे स्नेक प्लांट, स्पाइडर प्लांट, एलोवेरा और मनी प्लांट लगाएं, जो वातावरण से कार्बन मोनोऑक्साइड और बेंजीन जैसे टॉक्सिन्स को सोखने में सहायक होते हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि इस गंभीर मौसमी दौर में घर के अंदर किसी भी तरह का कृत्रिम धुआं पैदा करने से बचें। कमरों में अगरबत्ती, धूपबत्ती, मॉस्किटो कॉइल या केमिकल युक्त खुशबूदार मोमबत्तियां जलाने से पूरी तरह परहेज करें, क्योंकि इनसे निकलने वाला धुआं बंद कमरों में कार्बन के महीन कणों का घनत्व और ज्यादा बढ़ा देता है।

प्रदूषण से सिर्फ बाहरी बचाव ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शरीर के आंतरिक रक्षा तंत्र यानी इम्यूनिटी को मजबूत करना भी उतना ही अनिवार्य है। जहरीली हवा से लड़ने के लिए अपनी दैनिक डाइट में एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर खाद्य पदार्थों की मात्रा बढ़ाएं। दिनभर में पर्याप्त मात्रा में गुनगुना या सामान्य पानी नियमित अंतराल पर पीते रहें, जिससे आपकी श्वास नली की अंदरूनी म्यूकस परत हमेशा नम और हाइड्रेटेड बनी रहे। जब श्वसन मार्ग अच्छी तरह हाइड्रेटेड रहता है, तो वह धूल और सूक्ष्म प्रदूषकों को फेफड़ों में गहराई तक जाने से रोकने में ज्यादा सक्षम होता है। अपने भोजन में विटामिन सी से भरपूर मौसमी फल जैसे आंवला, संतरा, नींबू और अमरूद शामिल करें, जो फेफड़ों में होने वाले फ्री रेडिकल डैमेज को रोकते हैं। इसके अलावा, विटामिन ई के प्राकृतिक स्रोत जैसे बादाम, अखरोट और सूरजमुखी के बीज तथा ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर चिया सीड्स या अलसी का नियमित सेवन करें। पारंपरिक रूप से गुड़ और अदरक की चाय या काढ़ा भी फेफड़ों में जमा बलगम और टॉक्सिन्स को प्राकृतिक तरीके से बाहर निकालने में बेहद असरदार माना जाता है।

प्रदूषण के दौर में फेफड़ों की जैविक क्षमता को बनाए रखने और उनकी सफाई के लिए योग और प्राणायाम सबसे वैज्ञानिक विधि है। जब बाहर हवा जहरीली हो, तो सुबह के समय घर के सभी खिड़की-दरवाजे अच्छी तरह बंद कर लें और इनडोर वातावरण में ही योगाभ्यास करें। नियमित रूप से 15 से 20 मिनट का समय अनुलोम-विलोम प्राणायाम, सौम्य कपालभाति और डीप बेली ब्रीदिंग (गहरी सांस लेने का अभ्यास) के लिए निकालें। अनुलोम-विलोम से श्वसन तंत्र की सूक्ष्म नलिकाओं का संतुलन बेहतर होता है और ऑक्सीजन का अवशोषण बढ़ता है। वहीं धीमी गति से किया गया कपालभाति फेफड़ों के निचले हिस्सों में जमी बासी हवा और सूक्ष्म कणों को बाहर धकेलने में सहायता करता है। गहरी और धीमी सांस लेने से फेफड़ों के एयर सैक्स यानी एल्वियोली पूरी तरह खुलते हैं, जिससे शरीर के हर अंग तक शुद्ध ऑक्सीजन पहुंचती है और तनाव का स्तर भी नियंत्रित रहता है।

वायु प्रदूषण के लगातार संपर्क में आने से शरीर कई तरह के चेतावनी संकेत देने लगता है, जिन्हें अक्सर लोग सामान्य मौसमी बदलाव समझकर टाल देते हैं। यदि आपको बिना किसी ज्ञात कारण के लगातार सूखी या बलगम वाली खांसी बनी हुई है, गले में लगातार खराश या जलन महसूस हो रही है, छाती में भारीपन या जकड़न का अहसास होता है, या फिर सीढ़ियां चढ़ते और सामान्य रूप से चलते समय सांस फूलने लगती है, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में न लें। ये लक्षण श्वसन तंत्र में गहरी सूजन और संक्रमण की शुरुआत का संकेत हो सकते हैं। ऐसी किसी भी स्थिति में खुद से ओवर-द-काउंटर दवाएं लेने के बजाय तुरंत किसी योग्य पल्मोनोलॉजिस्ट या जनरल फिजिशियन से संपर्क करें। समय पर की गई चिकित्सकीय जांच, पल्स ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन स्तर की निगरानी और सही इनहेलर या दवाइयों का उपयोग फेफड़ों को होने वाले किसी भी स्थायी नुकसान को समय रहते रोक सकता है।