बिहार विधान परिषद चुनाव और राजनीतिक घरानों से जुड़े दिग्गजों की अनूठी चुनावी मजबूरी

देश के राजनीतिक पटल पर जब भी बिहार की राजनीति का जिक्र होता है, तो यहां के सियासी समीकरण, दलों की रणनीति और दिग्गजों के फैसलों पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहती हैं। इन दिनों बिहार की सियासत में एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला वाकया चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मामला राज्य में होने वाले विधान परिषद (MLC) यानी ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्र के चुनावों से जुड़ा हुआ है। लोकतंत्र के इस महापर्व और चुनावी रण में जब हर कोई अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए उत्सुक रहता है, वहीं राज्य के दो सबसे बड़े राजनीतिक परिवारों के वारिस इस बार इस महत्वपूर्ण वोटिंग प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। जी हां, एक तरफ जहां प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुपुत्र निशांत कुमार इस चुनाव में वोट नहीं डाल पाएंगे, तो वहीं दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी इस मतदाता सूची से बाहर हैं। इस स्थिति के सामने आते ही सियासी चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है और लोग इसके पीछे के कानूनी व शैक्षणिक प्रावधानों को जानने के लिए बेताब हैं।

भारतीय संविधान और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत विधान परिषद के चुनाव में कुछ सीटें ऐसी होती हैं जिनके लिए विशेष योग्यताओं का होना अनिवार्य होता है। इनमें से एक ‘स्नातक निर्वाचन क्षेत्र’ (Graduate Constituency) भी है, जिसके माध्यम से चुने जाने वाले प्रतिनिधि राज्य के पढ़े-लिखे प्रबुद्ध वर्ग की आवाज विधानसभा और विधान परिषद में उठाते हैं। इस निर्वाचन क्षेत्र की सबसे बड़ी और अनिवार्य शर्त यह होती है कि मतदान करने वाला व्यक्ति किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक (Graduate) यानी डिग्री धारक होना चाहिए और उसने चुनाव से निर्धारित समय सीमा से पहले अपना पंजीकरण कराया हो। चूंकि राजनीतिक पृष्ठभूमि और अन्य व्यस्तताओं के चलते राज्य के इन प्रमुख राजनीतिक चेहरों की शैक्षणिक डिग्रियों या इस विशेष मतदाता सूची में पंजीकरण को लेकर तकनीकी स्थितियां पूरी नहीं बैठती हैं, इसलिए वे इस बार स्नातक कोटे के तहत होने वाले इन चुनावों में अपना वोट डालने के अधिकार से वंचित रह गए हैं। प्रशासनिक नियमों के आगे आम हो या खास, सभी के लिए कानून समान रूप से लागू होता है, और यह वाकया इस बात का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण है।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब देश या राज्य के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े परिवारों के लोग किन्हीं तकनीकी या शैक्षणिक कारणों से किसी चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन पाते हैं, तो विरोधी दलों को बैठे-बिठाये एक बड़ा मुद्दा मिल जाता है। इस घटना के सामने आने के बाद से ही राजनीतिक विश्लेषक और विपक्षी दलों के नेता तरह-तरह की बयानबाजी कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि यह कोई राजनीतिक बहिष्कार या जानबूझकर लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से चुनाव आयोग के कानूनी प्रावधानों और शैक्षणिक योग्यताओं का मामला है। कोई भी सामान्य नागरिक या राजनीतिक हस्ती तभी किसी विशेष कोटे के मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकती है जब वह उन शर्तों को विधिवत पूरा करता हो। इसके बावजूद, सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस बात की चर्चा बड़े पैमाने पर हो रही है कि सूबे की सत्ता और विपक्ष की धुरी माने जाने वाले इन परिवारों के युवा चेहरे खुद इस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा क्यों नहीं बन सके।

बिहार की राजनीति में शिक्षा, रोजगार और योग्यता हमेशा से बहुत संवेदनशील और बड़े मुद्दे रहे हैं। ऐसे समय में जब राज्य के युवा अपने भविष्य और रोजगार के लिए डिग्री और कौशल पर जोर दे रहे हैं, तब इस प्रकार की घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि कानून के दायरे में कागजी और शैक्षणिक औपचारिकताएं कितनी मायने रखती हैं। चुनाव आयोग द्वारा संचालित मतदाता पुनरीक्षण अभियान के तहत हर पात्र नागरिक को अपनी योग्यता के आधार पर सूची में नाम दर्ज कराने का अवसर दिया जाता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर से इस बात को रेखांकित कर दिया है कि लोकतंत्र में वीवीआईपी संस्कृति या राजनीतिक रसूख से ऊपर उठकर संवैधानिक नियमों का पालन सर्वोपरि होता है। चाहे सत्ता पक्ष का परिवार हो या विपक्ष का, चुनाव के नियम सभी के लिए एक समान रूप से प्रभावी होते हैं। आने वाले दिनों में इन चुनावों के नतीजे चाहे जो भी हों, लेकिन दिग्गजों के वोटिंग से बाहर रहने की यह चर्चा बिहार की राजनीतिक फिजा में लंबे समय तक गूंजती रहेगी।