
भारत के राजनीतिक पटल पर जब भी सबसे ज्यादा जागरूक, उथल-पुथल भरी और दिलचस्प सियासत की चर्चा होती है, तो उसमें बिहार का नाम सबसे ऊपर आता है। यहां की राजनीतिक जमीन पर कब कौन सा समीकरण बन जाए और कौन सा नया इतिहास लिख दिया जाए, इसका अनुमान लगाना बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी आसान नहीं होता है। इन दिनों जब राज्य में विधान परिषद यानी एमएलसी (MLC) चुनावों और मतदाता सूचियों को लेकर सरगर्मी तेज है, तो बिहार की राजनीति के अतीत के पन्ने भी पलटे जाने लगे हैं। आम तौर पर आम जनता यही मानती है कि किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री बनने के लिए उस व्यक्ति का सीधे तौर पर विधायक (MLA) चुनकर विधानसभा पहुंचना अनिवार्य होता है। लेकिन भारतीय संविधान और हमारे संसदीय लोकतंत्र में एक बेहद महत्वपूर्ण और विशेष प्रावधान ऐसा भी है जिसके तहत बिना सीधे चुनाव मैदान में उतरे या विधानसभा चुनाव हारे बिना भी कोई व्यक्ति विधान परिषद के रास्ते राज्य के सर्वोच्च पद यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकता है। बिहार का राजनीतिक इतिहास इस बात का सबसे बड़ा गवाह रहा है कि यहां ऐसे कई दिग्गज नेता हुए हैं जिन्होंने एमएलसी के रूप में अपनी राजनीतिक पारी खेलते हुए सरकार की बागडोर संभाली है।
बिहार के राजनीतिक इतिहास पर अगर गहरी नजर डाली जाए, तो ऐसे एक या दो नहीं बल्कि कुल 7 ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान विधानसभा के सदस्य (MLA) होने के बजाय विधान परिषद (MLC) के जरिए शासन की कमान संभाली थी। इस सूची में राज्य के कई दिग्गज और प्रभावशाली नेताओं के नाम शामिल हैं जिन्होंने अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता और दलीय समर्थन के दम पर सूबे की राजनीति को लंबे समय तक दिशा दी। इस परंपरा की शुरुआत और निरंतरता इस बात को साबित करती है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 (4) के तहत किसी भी ऐसे व्यक्ति को मंत्री या मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है जो विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य हो। चूंकि बिहार में द्विसदनीय विधायिका (विधानसभा और विधान परिषद) की व्यवस्था मौजूद है, इसलिए राजनीतिक परिस्थितियों, उपचुनाव की जटिलताओं या रणनीतिक कारणों के चलते कई बार नेताओं ने विधान परिषद के रास्ते को चुनना ज्यादा बेहतर और सुरक्षित समझा।
इस फेरिस्ट में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के सबसे बड़े चेहरे और लंबे समय से बिहार की सत्ता संभाल रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम भी शामिल है। कई मौकों पर वे विधानसभा का चुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद के सदस्य के रूप में राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रहे हैं और सदन का नेतृत्व करते रहे हैं। उनके अलावा यदि इतिहास के पन्नों को टटोला जाए तो महामाया प्रसाद सिन्हा, अनुग्रह नारायण सिंह (जिन्होंने उप मुख्यमंत्री और प्रमुख पदों पर कार्य किया) और अब्दुल गफूर जैसे कई नाम सामने आते हैं जिन्होंने अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमताओं का लोहा मनवाते हुए विधान परिषद के माध्यम से ही अपनी सरकार का सफल संचालन किया। इन नेताओं के लिए सदन का उच्च सदन यानी विधान परिषद वैचारिक बहस, नीतियों के निर्धारण और प्रशासनिक नियंत्रण का एक ऐसा मंच साबित हुआ जहां से उन्होंने पूरे राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को बेहद कुशलता के साथ नियंत्रित किया और अपनी राजनीतिक पकड़ को हमेशा मजबूत बनाए रखा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधान परिषद (Legislative Council) को हमारे संविधान निर्माताओं ने ‘बड़ों का सदन’ या विश्राम गृह के रूप में नहीं, बल्कि एक बेहद सूझबूझ और समीक्षा करने वाले मंच के रूप में गढ़ा था। जिन राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था है, वहां लोकसभा या विधानसभा के प्रत्यक्ष चुनावों के अलावा परोक्ष रूप से चुने जाने वाले ये प्रतिनिधि राज्य के बौद्धिक और वैचारिक संतुलन को बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब कभी किसी राज्य में ऐसे हालात बनते हैं कि कोई मुख्य नेता सीधे चुनाव लड़ने की स्थिति में न हो या राजनीतिक समीकरणों के कारण उसे सुरक्षित रास्ते की जरूरत हो, तो विधान परिषद का यह रास्ता हमेशा से एक मजबूत संवैधानिक विकल्प साबित हुआ है। बिहार के इन 7 मुख्यमंत्रियों का इतिहास इस बात का जीवंत प्रमाण है कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास और सदन के भीतर बहुमत का समर्थन ही सबसे सर्वोप
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