
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के शीर्ष नेतृत्व के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यशैली और प्रशासनिक आदेशों को लेकर उपजे आंतरिक विवाद में एक बड़ा और चौंकाने वाला आधिकारिक खुलासा हुआ है। चुनाव आयुक्त (EC) डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ सीधे कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को पत्र लिखकर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की थी। हालांकि, केंद्र सरकार के शीर्ष प्रशासनिक निकाय यानी कैबिनेट सचिवालय (Cabinet Secretariat) ने इस पूरे मामले में कोई भी सीधी कार्रवाई करने से पूरी तरह इनकार कर दिया था। सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत सामने आई आंतरिक फाइल नोटिंग्स से यह स्पष्ट हुआ है कि कैबिनेट सचिवालय ने चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज में कार्यपालिका (Executive) के दखल को अनुचित और असंवैधानिक मानते हुए दोनों आयुक्तों की शिकायतों पर हस्तक्षेप करने से अपने हाथ पीछे खींच लिए थे।
यह पूरा मामला सेवानिवृत्त कमोडोर और पारदर्शिता कार्यकर्ता लोकेश के. बत्रा द्वारा दायर आरटीआई (RTI) आवेदन के जवाब में सार्वजनिक हुआ है। आरटीआई से मिले आधिकारिक रिकॉर्ड्स और फाइल नोटिंग्स के अनुसार, 29 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र भेजे थे। इन पत्रों में निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त (Senior Deputy Election Commissioner) मनीष गर्ग के खिलाफ गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं।
कैबिनेट सचिवालय ने पुष्टि की कि दोनों पत्र 30 जुलाई को दर्ज किए गए थे। इसके बाद 3 और 4 अगस्त को सचिवालय के भीतर इस पर गहन विचार-विमर्श हुआ। 5 अगस्त को कैबिनेट सचिव ने इस संबंध में उत्तर तैयार किया, जिसमें इस पत्राचार की प्रति मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कार्यालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को जानकारी हेतु प्रेषित की गई।
कैबिनेट सचिवालय द्वारा जारी 4 अगस्त की आधिकारिक फाइल नोटिंग में इस बात का विस्तार से उल्लेख किया गया है कि सरकार ने चुनाव आयुक्तों की मांग पर कोई दंडात्मक या प्रशासनिक कार्रवाई क्यों नहीं की:
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संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता (Constitutional Autonomy): सचिवालय ने रेखांकित किया कि निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय (Constitutional Body) है। संविधान के मूल ढांचे के तहत इसे कार्यपालिका (सरकार) के किसी भी प्रकार के अनुचित हस्तक्षेप से पूरी तरह अलग और सुरक्षित (Insulated) रखा गया है, ताकि चुनाव आयोग निष्पक्ष व पारदर्शी तरीके से कार्य कर सके।
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‘व्यक्तिगत क्षमता’ में लिखे गए पत्र: कैबिनेट सचिवालय ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा भेजे गए पत्र उनकी ‘व्यक्तिगत क्षमता’ (Individual Capacity) में लिखे गए थे। चूंकि यह आयोग की ओर से कोई साझा, औपचारिक और संस्थागत प्रस्ताव (Formal Communication from Commission as a Whole) नहीं था, इसलिए सरकार का सीधे किसी अधिकारी पर कार्रवाई करना चुनाव आयोग के आंतरिक अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण माना जाता।
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बहु-सदस्यीय आयोग का कानूनी सिद्धांत: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के तहत ईसीआई एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जहां संस्थागत फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से लिए जाते हैं। यदि आयोग के भीतर किसी प्रतिनियुक्त (Deputation) अधिकारी के आचरण को लेकर कोई असंतोष है, तो उसका नियमन निर्वाचन आयोग के अपने आंतरिक नियमों, सेवा नियमावली और दिशा-निर्देशों के तहत स्वयं आयोग द्वारा ही किया जाना चाहिए, न कि कैबिनेट सचिवालय के स्तर से।
इस पूरे विवाद की जड़ 28 जुलाई को जारी किया गया कार्य-पुनर्विभाजन (Work Re-allocation) का एक आंतरिक आदेश था।
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दरअसल, उप चुनाव आयुक्त (प्रशासन) भानु प्रकाश येतुरी 27 जुलाई से 9 अगस्त तक छुट्टी पर थे। उनकी गैर-मौजूदगी में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग (जो हिमाचल प्रदेश कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं) को प्रशासन प्रभाग का अतिरिक्त प्रभार (लिंक ऑफिसर) सौंपा गया था।
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पदभार संभालते ही गर्ग ने 28 जुलाई को आयोग के समकक्ष और वरिष्ठ अधिकारियों के कार्य आवंटन में व्यापक बदलाव के आदेश जारी कर दिए।
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चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने अपने पत्र में आरोप लगाया कि यह आदेश पूरे आयोग या आयुक्तों से बिना किसी पूर्व परामर्श, सूचना या अनुमोदन के मनमाने ढंग से जारी किया गया।
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वहीं, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी शिकायत में उठाया कि जब उन्होंने प्रशासन प्रभाग से संबंधित मूल फाइल और दस्तावेज तलब किए, तो प्रशासन प्रभाग द्वारा उन्हें वह फाइल उपलब्ध नहीं कराई गई। आयुक्तों का कहना था कि बार-बार दिए गए मौखिक और लिखित निर्देशों के बावजूद ऐसा कदम उठाना स्थापित प्रशासनिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है।
विवाद के सार्वजनिक होने के बाद निर्वाचन आयोग ने आधिकारिक बयान जारी कर स्थिति स्पष्ट की थी। आयोग ने कहा था कि कैबिनेट सचिव को लिखा गया पत्र आयोग के किसी बड़े नीतिगत मामले या आईटी डिवीजन से संबंधित नहीं था, बल्कि प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अधिकारी के कार्यप्रणाली के संदर्भ में था। आयोग ने यह भी साफ किया था कि दोनों आयुक्तों के संज्ञान में आने के तुरंत बाद उस विवादित कार्य-पुनर्विभाजन आदेश को स्थगित/रद्द कर दिया गया था और उसे धरातल पर कभी लागू ही नहीं होने दिया गया।
आरटीआई के इस ताजा खुलासे ने यह साबित कर दिया है कि भले ही निर्वाचन आयोग के भीतर प्रशासनिक नियंत्रण और फाइलों की आवाजाही को लेकर मतभेद उभरे थे, लेकिन कार्यपालिका ने संवैधानिक लक्ष्मण रेखा का सम्मान करते हुए चुनाव आयोग के आंतरिक अनुशासन संबंधी विवाद में सीधे कूदने से परहेज किया।
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