Diwali Bonus Rules: क्या दिवाली पर कंपनी के लिए बोनस देना जरूरी है? नौकरीपेशा लोग तुरंत जान लें कानून और अपने अधिकार

त्योहारी सीजन की शुरुआत होते ही देश भर के करोड़ों नौकरीपेशा कर्मचारियों की निगाहें अपने बैंक खाते और कंपनी के एचआर विभाग के नोटिस बोर्ड पर टिक जाती हैं। लखनऊ के हजरतगंज, गोमती नगर के आईटी व कॉरपोरेट दफ्तरों से लेकर दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और बेंगलुरु तक हर कार्यस्थल पर इन दिनों केवल एक ही सवाल गूंज रहा है कि इस दिवाली प्रबंधन बोनस का ऐलान कब करेगा। त्योहारी खर्चों, मिठाइयों, नए कपड़ों और घर के बजट को संतुलित करने के लिए दिवाली बोनस हर कामकाजी पेशेवर के लिए एक बड़ी राहत बनकर आता है। कई बार कर्मचारियों के मन में यह संशय बना रहता है कि क्या बोनस पाना उनका वैधानिक अधिकार है या फिर यह पूरी तरह कंपनी प्रबंधन की स्वेच्छा और उदारता पर निर्भर करता है। भारत के श्रम कानूनों में कर्मचारियों के वित्तीय हितों की रक्षा के लिए बेहद स्पष्ट और सख्त प्रावधान किए गए हैं, जिन्हें जानना हर संगठित और असंगठित क्षेत्र के कामगार के लिए आवश्यक है।

भारत में कर्मचारियों को मिलने वाला वैधानिक बोनस किसी प्रबंधन का अहसान नहीं बल्कि एक कानूनी व्यवस्था के तहत तय किया गया अधिकार है। देश की संसद द्वारा पारित पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट 1965 (The Payment of Bonus Act, 1965) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी औद्योगिक, व्यावसायिक या कॉरपोरेट प्रतिष्ठान में काम करने वाले पात्र कामगारों को वित्तीय वर्ष के मुनाफे में से उनका हिस्सा दिया जाए। यह कानून हर उस कारखाने, उद्योग या वाणिज्यिक संस्थान पर अनिवार्य रूप से लागू होता है जहां किसी भी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी एक दिन भी 20 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत रहे हों। कई राज्यों में राज्य सरकारों ने इस सीमा को घटाकर 10 कर्मचारी तक भी निर्धारित किया है, जिससे छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी कानूनन सुरक्षा मिलती है। यदि कोई कंपनी इस कानून के दायरे में पंजीकृत है, तो वह यह कहकर बोनस देने से हाथ पीछे नहीं खींच सकती कि उसका मन नहीं है या यह केवल स्वैच्छिक उपहार है।

कानूनन बोनस पाने के लिए कर्मचारी का संबंधित संस्थान में निरंतर सेवा का एक तय समय पूरा होना अनिवार्य माना गया है। पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट के नियमों के अनुसार, किसी वित्तीय वर्ष के दौरान जिस कर्मचारी ने उस प्रतिष्ठान में कम से कम 30 कार्य दिवस (30 working days) पूरे कर लिए हों, वह न्यूनतम बोनस का दावा करने के लिए कानूनी रूप से पात्र बन जाता है। इस नियम के तहत स्थायी कर्मचारियों के अलावा संविदा, दैनिक वेतनभोगी और प्रोबेशन पर काम कर रहे वे सभी कर्मचारी आते हैं जो न्यूनतम कार्य दिवस की शर्त को पूरा करते हैं। वर्तमान वैधानिक वेतन सीमा के मुताबिक, जिन कर्मचारियों का मूल वेतन (Basic Salary) और महंगाई भत्ता (Dearness Allowance) मिलाकर प्रति माह 21,000 रुपये तक है, वे सीधे तौर पर इस अधिनियम के वैधानिक बोनस प्रावधानों के अंतर्गत सुरक्षित हैं। जिन उच्च वेतनभोगी अधिकारियों या कर्मचारियों का वेतन इस सीमा से ऊपर होता है, उन्हें दिया जाने वाला बोनस कंपनी की आंतरिक एचआर पॉलिसी, परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव और रोजगार अनुबंध की शर्तों के आधार पर तय किया जाता है।

श्रम कानून में न्यूनतम और अधिकतम बोनस का प्रतिशत पूरी तरह से स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है ताकि किसी भी कर्मचारी का वित्तीय शोषण न हो सके। अधिनियम के तहत प्रत्येक पात्र नियोक्ता को अपने कर्मचारी को कम से कम 8.33 प्रतिशत का बोनस देना कानूनी रूप से बाध्यकारी है, चाहे उस वित्तीय वर्ष में कंपनी को मुनाफा हुआ हो या घाटा उठाना पड़ा हो। यह 8.33 प्रतिशत न्यूनतम बोनस कर्मचारी के एक महीने के मूल वेतन के बराबर बैठता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दिवाली पर कामगार खाली हाथ न रहे। यदि कंपनी को उस वित्तीय वर्ष में असाधारण लाभ होता है और उपलब्ध सरप्लस फंड पर्याप्त है, तो प्रबंधन इस बोनस की दर को बढ़ाकर अधिकतम 20 प्रतिशत तक कर सकता है। बोनस की गणना के लिए सरकार ने 7,000 रुपये प्रति माह या राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी (जो भी अधिक हो) का मानक तय किया है, जिसके आधार पर ही 8.33 से 20 फीसदी की दर से वास्तविक भुगतान राशि निकाली जाती है।

अक्सर कंपनियों के प्रबंधन यह तर्क देकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि चालू कारोबारी साल में संस्था को भारी वित्तीय घाटा उठाना पड़ा है, इसलिए वे इस बार दिवाली बोनस जारी करने में असमर्थ हैं। हालांकि, भारतीय श्रम कानून का स्पष्ट नियम है कि मुनाफे की कमी न्यूनतम 8.33 प्रतिशत के बोनस भुगतान से बचने का आधार नहीं बन सकती। कानून में ‘सेट ऑन और सेट ऑफ’ (Set-on and Set-off of Allocable Surplus) की एक विस्तृत व्यवस्था दी गई है, जिसके अंतर्गत अच्छे मुनाफे वाले वर्षों के सरप्लस को सुरक्षित रखा जाता है ताकि घाटे वाले वर्षों में भी कर्मचारियों को न्यूनतम बोनस की अदायगी की जा सके। केवल नई स्थापित इकाइयों को शुरुआती पांच वर्षों के दौरान कुछ विशेष परिस्थितियों में छूट मिलती है, बशर्ते उन वर्षों में उन्होंने कोई लाभ न कमाया हो। जैसे ही किसी नए प्रतिष्ठान में मुनाफा दर्ज होता है, उसी क्षण से बोनस भुगतान के नियम पूरी तरह से प्रभावी हो जाते हैं।

कानून कर्मचारियों को अधिकार देने के साथ-साथ कार्यस्थल पर अनुशासन और निष्ठा की अपेक्षा भी करता है, जिसके चलते कुछ खास हालातों में बोनस जब्त करने की छूट है। यदि किसी कर्मचारी को सेवा से धोखाधड़ी, गबन, वित्तीय अनियमितता, कार्यस्थल पर हिंसक या उपद्रवी व्यवहार, या प्रतिष्ठान की संपत्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने (सबोटाज) के गंभीर आरोप में विधिवत जांच के बाद बर्खास्त किया गया हो, तो नियोक्ता उसका बोनस रोक सकता है। ऐसी स्थिति के अलावा सामान्य इस्तीफा देने वाले, नोटिस पीरियड पूरा करने वाले या सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी को उस वित्तीय वर्ष में किए गए कार्य दिवसों के अनुपात में पूरा बोनस पाने का पूरा अधिकार होता है। कोई भी प्रबंधन बिना किसी कानूनी जांच या ठोस आधार के मनमाने तरीके से किसी कर्मचारी का वैधानिक बोनस नहीं रोक सकता।

यदि आपकी कंपनी पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट के दायरे में आती है और सभी पात्रता शर्तें पूरी होने के बावजूद प्रबंधन दिवाली पर बोनस देने से इनकार करता है, तो आप कानूनी कदम उठा सकते हैं। सबसे पहले कर्मचारी को कंपनी के एचआर और उच्च प्रबंधन को आधिकारिक ईमेल या पत्र के जरिए कानून का हवाला देते हुए लिखित मांग पत्र भेजना चाहिए। यदि वहां से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलता है, तो कर्मचारी अपने जिले के श्रम आयुक्त कार्यालय (Office of the Labour Commissioner) में लेबर ऑफिसर के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके अलावा कर्मचारी राज्य श्रम विभाग के ऑनलाइन ग्रीवेंस पोर्टल, समाधान पोर्टल या श्रम अदालत (Labour Court) में धारा 33C के तहत अपने बकाये की वसूली के लिए वाद दायर कर सकते हैं। अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के खिलाफ जुर्माने से लेकर छह महीने तक के कारावास तक का सख्त कानूनी प्रावधान है।