Thursday , October 15 2026

अब गाय भैंसों की डीएनए जांच कराएगी बिहार सरकार

बिहार में कृषि और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार लगातार नए और आधुनिक कदम उठा रही है। इसी कड़ी में अब बिहार सरकार ने पशुधन विकास और नस्ल सुधार के क्षेत्र में एक ऐसा क्रांतिकारी फैसला लिया है, जो देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। अब बिहार में गाय और भैंसों की पहचान और उनकी गुणवत्ता सुधारने के लिए उनका डीएनए टेस्ट (DNA Test) कराया जाएगा। आमतौर पर डीएनए जांच का नाम आते ही हमारे जेहन में फोरेंसिक या आपराधिक मामलों की जांच का ख्याल आता है, लेकिन सरकार का यह कदम पूरी तरह से वैज्ञानिक और आर्थिक रूप से पशुपालकों की आय को दोगुना करने के उद्देश्य से उठाया गया है। पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग की इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य के मवेशियों की आनुवंशिक गुणवत्ता को सुधारना, दूध उत्पादन की क्षमता को बढ़ाना और कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली नस्लों को बढ़ावा देना है।

पारंपरिक रूप से हमारे देश और राज्य में पशुपालन का कार्य पीढ़ियों से चला आ रहा है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीक के अभाव में कई बार पशुपालकों को उतनी सफलता नहीं मिल पाती जितनी मेहनत वे करते हैं। साधारण नस्ल के पशुओं की उत्पादकता कम होती है और उनके खान-पान पर आने वाला खर्च अधिक होता है। इस समस्या से निपटने के लिए बिहार सरकार ने ‘जीनोमिक सिलेक्शन’ (Genomic Selection) तकनीक का सहारा लेने का फैसला किया है। डीएनए जांच के जरिए वैज्ञानिकों और पशु विशेषज्ञों को यह पता लगाने में आसानी होगी कि किस बछड़े या पाड़ी में उच्च कोटि की दूध देने की क्षमता और बीमारियों से लड़ने की ताकत छिपी हुई है। जन्म के कुछ ही दिनों या महीनों के भीतर डीएनए सैंपल के जरिए यह स्पष्ट हो जाएगा कि कौन सा पशु भविष्य में बेहतर नस्ल का साबित होगा, जिससे किसानों को अयोग्य पशुओं के पालन-पोषण में होने वाले बेवजह खर्च से बचाया जा सके।

बिहार सरकार की इस नई योजना के तहत वैज्ञानिक तरीकों से देसी और उच्च नस्ल की गायों व भैंसों के जीनोम का अध्ययन किया जाएगा। इसके माध्यम से सेक्स-सॉर्टेड सीमन (Sex-Sorted Semen) तकनीक को भी और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा ताकि किसानों को 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में बछिया ही प्राप्त हो, जिससे दुग्ध उत्पादन के व्यवसाय को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके। जब कम उम्र में ही पशुओं के डीएनए की मैपिंग हो जाएगी, तो किसानों को यह चुनने में आसानी होगी कि उन्हें किस उच्च गुणवत्ता वाले सांड या सीमन का उपयोग करना चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया से राज्य में कम समय के भीतर दुधारू पशुओं की एक बेहतरीन और स्वस्थ फौज तैयार हो जाएगी, जो बिहार को देश के अग्रणी दुग्ध उत्पादक राज्यों की श्रेणी में मजबूती से खड़ा कर देगी।

बिहार के ग्रामीण इलाकों में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिनकी आजीविका पूरी तरह से पशुपालन और दूध बिक्री पर निर्भर करती है। चारा महंगा होने और कई बार कम दूध देने वाले पशुओं के कारण किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता है। सरकार की इस डीएनए आधारित जीनोम योजना से सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। जब किसानों को पहले से ही यह पता होगा कि उनके पास मौजूद पशु की आनुवंशिक क्षमता कितनी बेहतरीन है, तो वे बेहतर प्रबंधन कर सकेंगे। इसके अलावा, उच्च नस्ल के पशुओं की मांग देश भर में बनी रहती है, जिससे पशुपालक उन्नत नस्ल के बछड़े-बछियों को बेचकर भी अच्छी खासी कमाई कर सकेंगे। सरकार इस योजना को पूरी पारदर्शिता और सुगमता के साथ जमीन पर उतारने के लिए राज्य के सभी जिलों में पशु चिकित्सालयों और प्रयोगशालाओं को अपग्रेड करने का काम कर रही है।

बिहार सरकार का यह कदम इस बात का प्रमाण है कि अब खेती और पशुपालन जैसे पारंपरिक क्षेत्रों में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जेनेटिक्स और आधुनिक विज्ञान का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। पारंपरिक तरीकों से हटकर जीनोम आधारित इस वैज्ञानिक पहल से न केवल पशुओं में होने वाली आनुवंशिक बीमारियों पर लगाम लगेगी, बल्कि दूध उत्पादन के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचा जाएगा। बिहार के पशुपालकों के लिए यह योजना किसी वरदान से कम साबित नहीं होने वाली है, क्योंकि इससे लागत कम होगी और मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा। आने वाले समय में जब यह प्रोजेक्ट धरातल पर पूरी तरह लागू हो जाएगा, तो बिहार देश के अन्य राज्यों के लिए पशुपालन और नस्ल सुधार के क्षेत्र में एक मिसाल बनकर उभरेगा।