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गन्ना तौल और रिकवरी में हेराफेरी पर केंद्र का कड़ा चाबुक: 1 हफ्ते में बनेगी उच्चस्तरीय समिति, डिजिटल वे-ब्रिज और GPS ट्रैकिंग से रुकेगी चीनी मिलों की मनमानी

अक्टूबर महीने में नए चीनी पेराई सत्र (Sugar Crushing Season 2026-27) के आगाज के साथ ही गन्ना किसानों के सबसे बड़े दर्द पर केंद्र सरकार ने निर्णायक कदम उठाया है। देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों—उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, हरियाणा और पंजाब के किसानों द्वारा लंबे समय से यह शिकायत की जा रही थी कि चीनी मिलों और गन्ना क्रय केंद्रों (Purchase Centers) पर धर्मकांटों की तौल में भारी घटतौली (कम वजन तौलना) की जाती है और प्रयोगशालाओं में चीनी की वास्तविक रिकवरी दर (Sugar Recovery Rate) को जानबूझकर घटाकर दिखाया जाता है। इस गंभीर समस्या पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि एक सप्ताह के भीतर एक उच्चस्तरीय समिति (High-Level Committee) का गठन किया जाएगा, जो तौल व रिकवरी में पारदर्शिता लाने के लिए राष्ट्रव्यापी तकनीकी मानक और जवाबदेही तय करेगी।

गन्ना किसानों की आमदनी सीधे तौर पर दो मुख्य कारकों पर निर्भर करती है—गन्ने का कुल वजन और उसमें से निकलने वाले रस की चीनी रिकवरी दर:

  • धर्मकांटों पर घटतौली: ग्रामीण क्रय केंद्रों पर मैनुअल या अन-कैलिब्रेटेड इलेक्ट्रॉनिक कांटों में छेड़छाड़ कर प्रति ट्रॉली या ट्रक 1 से 3 क्विंटल तक वजन कम आंकने के आरोप लगते रहे हैं। इससे पूरे सीजन में प्रति किसान हजारों रुपये का सीधा नुकसान होता था।

  • चीनी रिकवरी में हेराफेरी: केंद्र सरकार द्वारा घोषित उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) 10.25% की बेसिक रिकवरी दर से जुड़ा होता है। यदि मिल में रिकवरी 10.25% से अधिक आती है, तो किसान को प्रति 0.1% की बढ़ोतरी पर अतिरिक्त प्रीमियम मिलना तय होता है। कई निजी चीनी मिलें कागजों पर रिकवरी दर को जानबूझकर 9.5% या 10% के आसपास सीमित दिखा देती थीं, जिससे किसानों को उनके वाजिब प्रीमियम भुगतान से वंचित कर दिया जाता था।

केंद्रीय मंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार, बनने वाली समिति राज्य सरकारों, भारतीय चीनी मिल संघ (ISMA), किसान संगठनों और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ मिलकर निम्नलिखित कड़े कदम लागू कराएगी:

  1. डिजिटल एवं क्लाउड-कनेक्टेड वे-ब्रिज (Digital Weighbridges): सभी चीनी मिलों और बाह्य गन्ना क्रय केंद्रों पर ऑटोमैटिक इलेक्ट्रॉनिक कांटे लगाए जाएंगे, जिनका डेटा सीधे राज्य गन्ना विभाग और केंद्रीय पोर्टल के सर्वर पर रियल-टाइम अपलोड होगा। वजन दर्ज होते ही किसान के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर तत्काल एसएमएस पर्ची (Digital Slip) जाएगी।

  2. सीसीटीवी निगरानी और थर्ड-पार्टी लैब टेस्टिंग: मिलों में रिकवरी जांचने वाली प्रयोगशालाओं की जांच अब थर्ड-पार्टी नेशनल लैब्स या सरकारी पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में होगी, जिससे मिल मालिक मनमाने आंकड़े दर्ज न कर सकें।

  3. औचक निरीक्षण और सीलिंग: नाप-तौल विभाग (Legal Metrology) की विशेष टीमें पेराई सत्र के दौरान कभी भी कांटों की औचक जांच (Surprise Inspection) करेंगी। किसी भी कांटे में 100 ग्राम की भी गड़बड़ी पाए जाने पर संबंधित केंद्र व्यवस्थापक और मिल प्रबंधन पर सीधे आपराधिक मुकदमा दर्ज होगा।

  4. सख्त पेनल्टी और लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान: घटतौली या रिकवरी छिपाने की पुष्टि होने पर मिलों पर भारी वित्तीय जुर्माना लगाने और उनका पेराई लाइसेंस निलंबित करने के कड़े नियम शामिल किए जाएंगे।

भारत में लगभग 5 करोड़ किसान परिवार सीधे तौर पर गन्ना की खेती से जुड़े हैं। पेराई सत्र 2026-27 के लिए जहां केंद्र सरकार ने ₹365 प्रति क्विंटल का ऐतिहासिक एफआरपी (Fair and Remunerative Price) तय किया है, वहीं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने हाल ही में राज्य दर बढ़ाकर ₹425 प्रति क्विंटल कर दी है। ऐसे में यदि तौल और रिकवरी दोनों शत-प्रतिशत पारदर्शी हो जाती हैं, तो किसानों को उनकी खून-पसीने की उपज का एक-एक पैसा पूरा मिलेगा।

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के किसान प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार के इस त्वरित कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि तकनीक आधारित ऑटोमेशन और सीसीटीवी निगरानी से दशकों पुरानी घटतौली की प्रथा पर पूर्ण विराम लगेगा और अन्नदाता को बिचौलियों व मिल प्रबंधकों के शोषण से वास्तविक मुक्ति मिल सकेगी।