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महंगाई की तपिश से फिर घबराया बाजार: क्या RBI को रेपो रेट में करनी पड़ेगी 1-1.5% की भारी बढ़ोतरी? जानिए होम लोन EMI और आपकी जेब पर असर

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेजी और घरेलू स्तर पर खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर में आए उछाल ने केंद्रीय बैंक और वित्तीय विश्लेषकों की पेशानी पर बल ला दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने हाल ही में दरों में 25 आधार अंकों (bps) की वृद्धि कर रेपो रेट को 5.50% पर पहुंचाते हुए अपने रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (Calibrated Tightening) में बदल दिया है। हालांकि, ब्रोकरेज हाउसों, वैश्विक रेटिंग एजेंसियों और अर्थशास्त्रियों की ताजा रिपोर्टों में यह आशंका जताई जा रही है कि यदि भू-राजनीतिक तनावों के चलते कच्चे तेल के भाव ऊंचे बने रहे और खुदरा मुद्रास्फीति (CPI Inflation) 6% के ऊपरी सहनशीलता बैंड (Upper Tolerance Band) को पार कर गई, तो केंद्रीय बैंक को महंगाई पर काबू पाने के लिए आने वाले समय में कुल मिलाकर 100 से 150 आधार अंकों (1 से 1.5%) तक की संचयी (Cumulative) ब्याज दर बढ़ोतरी का कड़ा कदम उठाना पड़ सकता है।

आम उपभोक्ताओं के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि महंगाई बढ़ने पर रिजर्व बैंक ब्याज दरें क्यों बढ़ाता है। अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों के अनुसार, रेपो रेट वह दर होती है जिस पर वाणिज्यिक बैंक आरबीआई से अल्पकालिक ऋण लेते हैं:

  • कर्ज महंगा होने से मांग पर नियंत्रण: जब आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंकों के लिए फंड जुटाने की लागत बढ़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप बैंक होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों में सीधे इजाफा करते हैं।

  • उपभोग और खर्च में सुस्ती: उधारी महंगी होने से बाजार में नकदी (Liquidity) का प्रवाह घटता है। लोग गैर-जरूरी खर्चों को टालते हैं और बचत को प्राथमिकता देते हैं, जिससे कुल मांग (Aggregate Demand) घटती है और विक्रेताओं को कीमतें स्थिर या कम करने पर मजबूर होना पड़ता है।

  • मुद्रा को मजबूती: ऊंची घरेलू ब्याज दरें विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) को आकर्षित करती हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये को मजबूती मिलती है और आयातित वस्तुओं (विशेषकर क्रूड ऑयल) की लागत कम होती है।

आरबीआई के नियमों के अनुसार अधिकांश खुदरा फ्लोटिंग-रेट लोन सीधे ‘एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट’ (EBLR/RLLR) यानी रेपो रेट से जुड़े होते हैं। यदि भविष्य में दरों में 100 से 150 आधार अंकों (1% से 1.5%) की सीधी वृद्धि होती है, तो इसका सीधा असर मासिक किस्त (EMI) पर पड़ेगा:

लोन की मूल राशि (Loan Amount) मौजूदा ब्याज दर (8.50%) 1% बढ़ोतरी के बाद (9.50%) 1.5% बढ़ोतरी के बाद (10.00%) मासिक EMI में कुल अतिरिक्त बोझ
₹30 लाख (20 वर्ष अवधि) ₹26,035 ₹27,964 ₹28,951 +₹1,929 से +₹2,916 प्रति माह
₹50 लाख (20 वर्ष अवधि) ₹43,391 ₹46,607 ₹48,251 +₹3,216 से +₹4,860 प्रति माह
₹75 लाख (20 वर्ष अवधि) ₹65,087 ₹69,910 ₹72,377 +₹4,823 से +₹7,290 प्रति माह

दीर्घकालिक होम लोन में 1.5% की वृद्धि का अर्थ यह होता है कि 20 साल के पूरे कर्ज चक्र में एक ऋणी को ₹50 लाख के लोन पर 11 लाख रुपये से अधिक का अतिरिक्त ब्याज चुकाना पड़ सकता है या उसके लोन की अवधि (Tenure) कई वर्षों के लिए बढ़ सकती है।

ब्याज दरें बढ़ने का प्रभाव हर वर्ग के लिए नकारात्मक नहीं होता। जहां कर्जदारों की जेब ढीली होती है, वहीं बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और आवर्ती जमा (RD) करने वाले रूढ़िवादी निवेशकों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों और पेंशनभोगियों के लिए यह राहत भरी खबर होती है:

  • बैंक एफडी पर 8% से अधिक रिटर्न संभव: वर्तमान में अधिकांश प्रमुख बैंक 1 से 3 वर्ष की एफडी पर 6.75% से 7.25% तक ब्याज दे रहे हैं। यदि रेपो रेट में 1% से 1.5% की और बढ़ोतरी होती है, तो बैंकों को जमा जुटाने के लिए एफडी दरों को बढ़ाकर 7.75% से 8.25% (वरिष्ठ नागरिकों के लिए 8.75% तक) करना पड़ सकता है।

  • सुरक्षित बचत को प्रोत्साहन: शेयर बाजार में बढ़ती अस्थिरता के दौर में ऊंचे एफडी रेट्स निवेशकों को बिना जोखिम उठाए निश्चित और स्थिर रिटर्न अर्जित करने का शानदार अवसर प्रदान करते हैं।

हालांकि 1 से 1.5% की आक्रामक ब्याज दर बढ़ोतरी का निर्णय केंद्रीय बैंक के लिए इतना आसान नहीं होगा। यदि आरबीआई दरों में बहुत तेजी से वृद्धि करता है, तो इसका सीधा नकारात्मक असर देश की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) पर पड़ सकता है:

  1. कॉरपोरेट कैपेक्स पर ब्रेक: महंगी उधारी के कारण कंपनियां नए कारखाने लगाने और विस्तार योजनाओं (Capital Expenditure) को टालने लगती हैं, जिससे नए रोजगार सृजन की रफ्तार धीमी हो सकती है।

  2. ऑटो और रियल एस्टेट सेक्टर प्रभावित: आवास और वाहनों की बिक्री सीधे तौर पर सस्ती फाइनेंसिंग पर निर्भर करती है। ब्याज दरें दोहरे अंकों (10%+) के करीब पहुंचने पर इन दोनों प्रमुख क्षेत्रों में मांग घटने का जोखिम रहता है।

  3. संतुलित रास्ता ही विकल्प: अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केंद्रीय बैंक अचानक एक साथ 1-1.5% की बढ़ोतरी करने के बजाय आर्थिक आंकड़ों (CPI मुद्रास्फीति और कच्चे तेल के स्तर) की कड़ी निगरानी करेगा। यदि वैश्विक स्तर पर कमोडिटी के भाव संभलते हैं, तो आरबीआई आक्रामक दरों में वृद्धि के बजाय अल्पकालिक विराम (Pause) का रुख भी अपना सकता है। आने वाली तिमाहियों के आंकड़े ही तय करेंगे कि भारत में ब्याज दरों का चक्र किस ऊंचाई तक पहुंचेगा।