
देश भर में मतदाता सूचियों को पारदर्शी, त्रुटिहीन और निष्पक्ष बनाने की दिशा में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने एक ऐतिहासिक और कड़ा कदम उठाया है। चुनावी प्रक्रियाओं के दौरान अक्सर यह देखा जाता रहा है कि विरोधी गुट या शरारती तत्व दुर्भावनापूर्ण इरादे से सामूहिक रूप से सैकड़ों मतदाताओं के नाम कटवाने के लिए आपत्तियां दर्ज करा देते थे। इस तरह के फर्जी और बेबुनियाद दावों पर स्थायी रूप से नकेल कसने के लिए आयोग ने फॉर्म-7 के उपयोग पर स्पष्ट सीमा तय कर दी है। निर्वाचन आयोग के नए आदेश के तहत अब कोई भी अकेला व्यक्ति अधिकतम 10 मतदाताओं के नाम पर ही विलोपन (नाम हटाने) की आपत्ति दर्ज करा सकता है। 10 से अधिक आपत्तियां दाखिल करने के लिए अब सख्त कानूनी शर्तें, व्यक्तिगत पहचान और भौतिक सत्यापन को अनिवार्य बना दिया गया है। आयोग का यह फैसला देश के हर जिले, कस्बे और मतदान केंद्र स्तर पर लागू होगा, जिससे वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का डर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
भारतीय चुनावी व्यवस्था में मतदाता सूची को लगातार अपडेट करने के लिए अलग-अलग फॉर्म निर्धारित हैं। नए मतदाता के पंजीकरण के लिए फॉर्म-6, पते या प्रविष्टि में संशोधन के लिए फॉर्म-8 और पहले से दर्ज किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने या उस पर आपत्ति दर्ज करने के लिए फॉर्म-7 का इस्तेमाल किया जाता है। बीते कुछ वर्षों में कई राज्यों के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान आयोग के संज्ञान में यह बात आई थी कि राजनीतिक दलों के स्थानीय कार्यकर्ता या कुछ व्यक्ति सुनियोजित तरीके से बल्क में फॉर्म-7 भरकर जमा करा देते थे। इनमें कई बार ऐसे लोगों के नाम शामिल कर दिए जाते थे जो उसी मोहल्ले में रह रहे होते थे, लेकिन सिर्फ चुनावी समीकरण बिगाड़ने के लिए उनके नाम के आगे ‘मृत’ या ‘स्थान छोड़ चुके’ लिख दिया जाता था। इस अव्यवस्था से बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) पर बेवजह काम का बोझ बढ़ता था और जांच पूरी न होने पर वास्तविक नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते थे। इसी विसंगति को जड़ से खत्म करने के लिए निर्वाचन आयोग ने यह लक्ष्मण रेखा खींची है।
निर्वाचन आयोग द्वारा जारी विस्तृत दिशा-निर्देशों के अनुसार अब कोई भी नागरिक किसी एक निर्वाचन क्षेत्र में एक समय में अधिकतम 10 फॉर्म-7 ही दाखिल कर सकता है। यदि किसी व्यक्ति, प्रतिनिधि या सामाजिक कार्यकर्ता को यह लगता है कि किसी क्षेत्र में 10 से अधिक लोग अपात्र हैं, फर्जी तरीके से पंजीकृत हैं या उनका देहांत हो चुका है, तो वे सीधे ऑनलाइन या एकमुश्त कागजी फॉर्म नहीं भर सकेंगे। 10 से अधिक नामों पर आपत्ति दर्ज कराने की स्थिति में शिकायतकर्ता को निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) या सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (AERO) के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। शिकायतकर्ता को हर एक नाम के लिए ठोस दस्तावेजी साक्ष्य देने होंगे, जैसे संबंधित व्यक्ति का मृत्यु प्रमाण पत्र या उसके नए स्थायी पते का प्रमाण। इसके साथ ही शिकायतकर्ता को एक औपचारिक शपथ पत्र (Affidavit) भी जमा करना होगा, जिसमें यह स्पष्ट घोषणा करनी होगी कि दी गई जानकारी पूर्णतः सत्य है और झूठी पाए जाने पर उसके खिलाफ भारतीय कानून के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
चुनाव आयोग ने केवल शिकायतकर्ताओं पर ही पाबंदी नहीं लगाई है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर काम करने वाले बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) की जवाबदेही भी कई गुना बढ़ा दी है। अब किसी भी फॉर्म-7 को स्वीकार करते ही नाम को सीधे सूची से नहीं हटाया जा सकेगा। नए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के तहत बीएलओ को उस पते पर भौतिक रूप से जाना होगा जहां का नाम कटवाने के लिए आवेदन आया है। बीएलओ को उस घर और आस-पड़ोस के कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर अपनी रिपोर्ट में शामिल करने होंगे। यदि मतदाता वहां अनुपस्थित मिलता है, तो उसे बाकायदा 7 से 14 दिनों का लिखित नोटिस थमाया जाएगा या उसके रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर सूचना भेजी जाएगी। नोटिस की समयावधि समाप्त होने और मतदाता द्वारा कोई जवाब न दिए जाने के बाद ही नाम विलोपन की अंतिम प्रक्रिया शुरू होगी। इस पूरी प्रक्रिया की डिजिटल लॉग एंट्री तैयार की जाएगी, ताकि बाद में कोई भी अधिकारी अपनी मनमर्जी से किसी का नाम न हटा सके।
स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर आम चुनावों तक वार्ड और बूथ स्तर पर कई बार मतदाता सूची से विरोधी समर्थकों के नाम हटवाने की साजिशें देखने को मिलती रही हैं। कई बार एक ही व्यक्ति द्वारा 200 से 500 फॉर्म-7 के बंडल जमा कर दिए जाते थे, जिससे प्रशासनिक तंत्र दबाव में आ जाता था। अब नई सीमा तय होने के बाद कोई भी व्यक्ति या संगठन थोक के भाव में फर्जी आपत्तियां नहीं लगा सकेगा। आयोग का यह कदम ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में वोटिंग अधिकारों को सुरक्षित करेगा। शहरी इलाकों में जहां लोग किराए के मकान तेजी से बदलते हैं, वहां अक्सर पड़ोसियों द्वारा नाम हटाने की गलत शिकायतें दर्ज हो जाती थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में पारिवारिक या राजनीतिक रंजिश के चलते एक-दूसरे के परिवार के नाम कटवाने के आवेदन दिए जाते थे। नई प्रणाली से ऐसे सभी मामलों में पारदर्शिता आएगी क्योंकि गलत शिकायत दर्ज कराने वाले पर कानूनी शिकंजा तुरंत कसेगा।
निर्वाचन आयोग अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म यानी वोटर सर्विस पोर्टल (VSP) और ईसीआई मोबाइल एप्लीकेशन को भी इस नए नियम के अनुकूल तेजी से अपडेट कर रहा है। पोर्टल पर ऐसा सुरक्षा तंत्र विकसित किया गया है जो शिकायतकर्ता के मोबाइल नंबर, आधार और मतदाता पहचान पत्र को ट्रैक करेगा। जैसे ही कोई यूजर 10वें फॉर्म-7 के बाद 11वां फॉर्म सबमिट करने की कोशिश करेगा, सिस्टम उसे ब्लॉक कर देगा और उसे संबंधित निर्वाचन कार्यालय जाने का पॉप-अप संदेश दिखाएगा। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एल्गोरिदम के जरिए उन पैटर्न्स की भी पहचान की जाएगी जहां किसी एक खास मोहल्ले या जाति-वर्ग के लोगों के खिलाफ एक साथ कई अलग-अलग खातों से आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हों। यदि सिस्टम को किसी असामान्य गतिविधि की भनक लगेगी, तो वह संबंधित जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को तुरंत अलर्ट भेज देगा।
निर्वाचन आयोग ने देश के सभी नागरिकों से भी अपील की है कि वे आयोग के अधिकृत पोर्टल या वोटर हेल्पलाइन ऐप पर जाकर मतदाता सूची में अपने नाम की पुष्टि नियमित रूप से करते रहें। यदि किसी नागरिक को बिना उसकी जानकारी के हटाए जाने का नोटिस मिलता है, तो वह तुरंत अपने बीएलओ या ईआरओ से संपर्क कर अपनी नागरिकता और निवास के प्रमाण के साथ अपील दायर कर सकता है। आयोग का यह सख्त और पारदर्शी फैसला देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने, हर पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा करने और चुनाव प्रक्रिया में जनता का अटूट भरोसा बनाए रखने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम साबित होगा।
girls globe