
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में रेपो रेट में संभावित 25 बेसिस पॉइंट्स (0.25%) की बढ़ोतरी की चर्चाओं ने देश भर के कर्जदारों की चिंता बढ़ा दी है। जब भी केंद्रीय बैंक रेपो रेट बढ़ाता है, तो वाणिज्यिक बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से फंड उधार लेना महंगा हो जाता है। नतीजतन, बैंक इस बढ़ी हुई लागत का भार तुरंत अपने रिटेल कर्जदारों पर डाल देते हैं। आज देश में अधिकांश बैंक फ्लोटिंग-रेट होम लोन को एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR/RLLR) से जोड़कर रखते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि रेपो रेट में 0.25% की वृद्धि होते ही होम लोन की ब्याज दरें भी 24 से 48 घंटे के भीतर 0.25% बढ़ जाती हैं। लखनऊ, दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे शहरों में मध्यमवर्गीय परिवारों के मासिक बजट में होम लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई सबसे बड़ा खर्च होती है, और इस बढ़ोतरी से मासिक किस्त के साथ-साथ कुल ब्याज का बोझ भी लाखों रुपये बढ़ जाता है।
होम लोन लंबी अवधि (15 से 25 साल) का कर्ज होता है, इसलिए ब्याज दर में महज 0.25% (25 bps) का मामूली बदलाव भी कुल भुगतान पर बहुत बड़ा प्रभाव डालता है। आइए 20 और 25 साल के दो लोकप्रिय लोन विकल्पों के जरिए इसका सटीक हिसाब समझें:
अधिकांश बैंक ब्याज दर बढ़ने पर ग्राहकों की मासिक ईएमआई तुरंत बढ़ाने के बजाय लोन का कार्यकाल (Tenure) चुपचाप 1 से 2 साल आगे बढ़ा देते हैं। कई बार कर्जदारों को इसका अहसास भी नहीं होता कि उनका 20 साल का लोन 22 साल का हो चुका है। उदाहरण के लिए, ₹50 लाख के लोन पर यदि आप अपनी मासिक ईएमआई नहीं बढ़ाते हैं, तो 0.25% की दर बढ़ने पर आपकी लोन अवधि में लगभग 12 से 18 महीने की अतिरिक्त किस्तों का इजाफा हो सकता है, जिससे आपका ब्याज खर्च अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। हालांकि, रिजर्व बैंक के हालिया नियमों के अनुसार अब बैंकों को रीसेट के समय ग्राहक को यह विकल्प देना अनिवार्य है कि वे अपनी मासिक ईएमआई बढ़ाना चाहते हैं या अवधि का विस्तार करना चाहते हैं।
पर्सनल लोन आमतौर पर 3 से 5 साल की छोटी अवधि और बिना किसी गारंटी (Unsecured Loan) के दिए जाते हैं। पर्सनल लोन पर रेपो रेट का असर इस बात पर निर्भर करता है कि आपका लोन फिक्स्ड रेट पर है या फ्लोटिंग रेट पर:
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फिक्स्ड रेट पर्सनल लोन: देश में 80% से अधिक पर्सनल लोन फिक्स्ड ब्याज दर पर स्वीकृत होते हैं। यदि आपका पर्सनल लोन पहले से फिक्स्ड रेट पर चल रहा है, तो रेपो रेट में बढ़ोतरी का आपकी मौजूदा ईएमआई या ब्याज दर पर शून्य (0%) असर पड़ेगा।
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फ्लोटिंग रेट पर्सनल लोन: यदि आपका लोन फ्लोटिंग दर पर है, तो बैंक इसका ब्याज 0.25% तक बढ़ा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, ₹5 लाख के पर्सनल लोन पर 3 साल की अवधि के लिए 12.0% की जगह 12.25% ब्याज होने पर मासिक किस्त में लगभग ₹58 से ₹60 प्रति माह का अंतर आता है, यानी 3 वर्षों में कुल अतिरिक्त बोझ लगभग ₹2,100 से ₹2,200 के आसपास रहता है। हालांकि, नए ग्राहकों के लिए नए पर्सनल लोन की ब्याज दरें महंगी हो सकती हैं।
यदि रेपो रेट में बढ़ोतरी के बाद आपकी ईएमआई बढ़ जाती है, तो आप इन व्यावहारिक वित्तीय रणनीतियों को अपनाकर अतिरिक्त ब्याज के बोझ को पूरी तरह समाप्त कर सकते हैं:
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सालाना आंशिक प्री-पेमेंट (Partial Prepayment): हर साल मिलने वाले बोनस या बचत से लोन मूलधन का मात्र 5% अतिरिक्त चुकाएं। इससे लोन का मूलधन घटता है और ब्याज में लाखों की बचत होती है।
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हर साल 5% ईएमआई खुद बढ़ाएं: यदि आपकी आमदनी में वार्षिक वेतन वृद्धि होती है, तो बैंक से संपर्क कर अपनी ईएमआई में 5% से 10% का स्वैच्छिक इजाफा कराएं। इससे 20 साल का लोन 13-14 साल में ही चुकता हो जाएगा।
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होम लोन बैलेंस ट्रांसफर (Refinancing): यदि आपका वर्तमान बैंक अत्यधिक ब्याज दर (जैसे 9.25%+) वसूल रहा है, जबकि अन्य सरकारी या निजी बैंक कम स्प्रेड पर लोन दे रहे हैं, तो अपने लोन को कम ब्याज दर वाले बैंक में ट्रांसफर कराने पर विचार करें।
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