
अपना आशियाना खरीदने के लिए जब कोई मध्यमवर्गीय परिवार बैंक से होम लोन लेता है, तो अमूमन घर की रजिस्ट्री और लोन दस्तावेज में पति और पत्नी दोनों के नाम शामिल किए जाते हैं। लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर, दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में नौकरीपेशा दंपतियों के बीच यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है कि यदि पति अपने बैंक खाते से होम लोन की पूरी मासिक ईएमआई भर रहा है, तो क्या पत्नी भी अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में उस होम लोन पर टैक्स बेनिफिट क्लेम कर सकती है। इस प्रश्न का सीधा, स्पष्ट और कानूनी उत्तर यह है कि आयकर नियमों के अनुसार यदि पत्नी का ईएमआई भुगतान में शून्य वित्तीय योगदान है, तो वह होम लोन पर किसी भी प्रकार की टैक्स छूट का दावा नहीं कर सकती। आयकर कानून के तहत टैक्स छूट केवल रिश्ते के आधार पर या केवल कागजों पर नाम होने से नहीं मिलती, बल्कि इसके लिए वित्तीय रूप से ईएमआई का वास्तविक भुगतान साबित करना अनिवार्य होता है। कई बार करदाता टैक्स बचाने की जल्दबाजी में दोनों फाइलों में डिडक्शन दिखा देते हैं, जो भविष्य में आयकर विभाग के स्क्रूटनी नोटिस और भारी जुर्माने का कारण बन सकता है।
आयकर विभाग के स्थापित प्रावधानों के अनुसार होम लोन पर धारा 24(b) और धारा 80C के तहत कर छूट हासिल करने के लिए तीन बुनियादी कसौटियों पर खरा उतरना कानूनी रूप से आवश्यक है। यदि इनमें से एक भी शर्त अधूरी रह जाती है, तो टैक्स छूट का दावा अमान्य घोषित हो जाता है।
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1. संपत्ति का कानूनी सह-मालिक (Co-owner): मकान या फ्लैट की सेल डीड और रजिस्ट्री में पत्नी का नाम बतौर सह-मालिक दर्ज होना अनिवार्य है। यदि संपत्ति केवल पति के नाम पर पंजीकृत है, तो पत्नी किसी भी सूरत में टैक्स छूट की पात्र नहीं हो सकती, भले ही लोन जॉइंट हो।
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2. लोन में सह-उधारकर्ता (Co-borrower): बैंक या हाउसिंग फाइनेंस कंपनी के लोन एग्रीमेंट में पत्नी का नाम को-एप्लीकेंट या को-बॉरोअर के रूप में दर्ज होना चाहिए।
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3. ईएमआई का वास्तविक भुगतान (Actual Financial Contribution): सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक शर्त यह है कि लोन की मासिक किस्त का भुगतान वास्तव में किसके खाते से हो रहा है। यदि पति अपने सैलरी अकाउंट से 100% ईएमआई चुका रहे हैं और पत्नी के खाते से कोई पैसा नहीं कट रहा है, तो 100% टैक्स डिडक्शन केवल पति को ही मिलेगा, पत्नी को इसका 1% भी लाभ नहीं दिया जा सकता।
अक्सर लोग यह मान बैठते हैं कि अगर बैंक ने लोन पात्रता (Eligibility) बढ़ाने के लिए पत्नी को को-बॉरोअर बना लिया है और रजिस्ट्री में भी उनका नाम शामिल है, तो वे स्वतः टैक्स लाभ की हकदार हो गई हैं। वित्तीय विशेषज्ञों और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CAs) का कहना है कि सह-मालिक और सह-उधारकर्ता होना टैक्स लाभ पाने की पहली सीढ़ी जरूर है, लेकिन यह अंतिम पैमाना नहीं है। आयकर अधिनियम की धारा 24(b) स्पष्ट रूप से यह कहती है कि ब्याज पर छूट उसी व्यक्ति को दी जाएगी जिसने उस ब्याज का वास्तविक भार वहन किया है। यदि पत्नी कामकाजी हैं, टैक्स स्लैब में आती हैं, लेकिन ईएमआई का एक भी रुपया अपने बैंक खाते से ट्रांसफर नहीं करती हैं, तो आयकर विभाग की नजर में उनका वित्तीय योगदान शून्य माना जाएगा। यदि वे अपने आईटीआर में इस कटौती को दिखाती हैं, तो असेसिंग ऑफिसर बैंक स्टेटमेंट मांगकर इस दावे को खारिज कर सकता है और इसे फर्जी कटौती मानकर ब्याज व पेनल्टी ठोक सकता है।
यदि पति और पत्नी दोनों कामकाजी हैं और दोनों टैक्स बचाना चाहते हैं, तो एक सुनियोजित वित्तीय रणनीति अपनाकर वे परिवार के स्तर पर हर साल ₹7 लाख तक की कुल कर योग्य आय पर छूट हासिल कर सकते हैं। इसके लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाने होंगे:
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ईएमआई का अनुपात तय करें: पति और पत्नी दोनों को अपने-अपने बैंक खातों से ईएमआई का एक निश्चित अनुपात तय करके भुगतान करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर 50:50, 60:40 या 70:30 का अनुपात रखा जा सकता है।
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जॉइंट अकाउंट का सही इस्तेमाल: यदि ईएमआई किसी संयुक्त बैंक खाते से कट रही है, तो दोनों पति-पत्नी अपने व्यक्तिगत वेतन खातों से उस जॉइंट खाते में तय अनुपात में पैसे ट्रांसफर करें, ताकि बैंक स्टेटमेंट में दोनों का योगदान साफ नजर आए।
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स्वामित्व और डिडक्शन का गणित (पुरानी कर व्यवस्था में): जब दोनों ईएमआई भरते हैं, तो धारा 24(b) के तहत होम लोन के ब्याज पर पति ₹2 लाख तक और पत्नी भी अलग से ₹2 लाख तक (कुल ₹4 लाख) की छूट क्लेम कर सकती हैं। वहीं धारा 80C के तहत मूलधन (Principal Repayment) पर पति ₹1.50 लाख और पत्नी भी ₹1.50 लाख (कुल ₹3 लाख) का डिडक्शन ले सकती हैं। इस तरह दोनों मिलकर ₹7 लाख तक की कटौती का दोहरा फायदा ले सकते हैं।
होम लोन पर टैक्स प्लानिंग करते समय यह ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आप आयकर की कौन सी कर व्यवस्था (Tax Regime) का चयन कर रहे हैं। वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई नई कर व्यवस्था (New Tax Regime) डिफ़ॉल्ट व्यवस्था है। नई टैक्स व्यवस्था के तहत सेल्फ-ऑक्यूपाइड प्रॉपर्टी (जिस मकान में आप खुद रह रहे हैं) के होम लोन पर मिलने वाले ब्याज (धारा 24b) और मूलधन (धारा 80C) दोनों की टैक्स कटौतियों को समाप्त कर दिया गया है। होम लोन पर ब्याज और मूलधन की यह दोहरी टैक्स छूट केवल और केवल पुरानी कर व्यवस्था (Old Tax Regime) चुनने वाले करदाताओं को ही उपलब्ध होती है। इसलिए आईटीआर फाइल करने से पहले पति-पत्नी दोनों को अपने टैक्स स्लैब और कटौतियों का तुलनात्मक अध्ययन जरूर कर लेना चाहिए। यदि पत्नी नॉन-वर्किंग हैं या उनकी आय बेसिक छूट सीमा से कम है, तो पति को ही अपने नाम से पूरी ईएमआई भरनी चाहिए और पुरानी कर व्यवस्था के तहत अधिकतम ₹3.5 लाख (₹2 लाख ब्याज + ₹1.5 लाख मूलधन) की कटौती का पूरा लाभ अपनी फाइल में अकेले उठाना चाहिए।
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