
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। राजधानी में सौर ऊर्जा को जन-जन तक पहुंचाने और आम नागरिकों के बिजली के बिल को पूरी तरह शून्य करने के मकसद से सरकार ने अपनी सोलर नीति के दिशा-निर्देशों में एक बड़ा और निर्णायक मोड़ दिया है। इस नए फैसले के तहत उन घरेलू उपभोक्ताओं पर विशेष फोकस किया गया है जिनकी औसत मासिक खपत 400 यूनिट तक सीमित रहती है। अब ऐसे घरों को 3 किलोवाट (KW) तक के रूफटॉप सोलर प्लांट की स्थापना पर ऐतिहासिक लाभ और वित्तीय प्रोत्साहन देने की रूपरेखा तैयार की गई है। राजधानी के पर्यावरण को स्वच्छ बनाने और ग्रिड पर निर्भरता घटाने के इरादे से यह कदम उठाया गया है, जिससे मध्यम वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों की जेब पर पड़ने वाला ऊर्जा का बोझ पूरी तरह खत्म हो सकता है।
दिल्ली में पहले से लागू 200 यूनिट तक की मुफ्त बिजली और 400 यूनिट तक के आधे बिल वाली सब्सिडी योजना से आगे बढ़कर अब सरकार ने आत्मनिर्भर ऊर्जा मॉडल पर जोर देना शुरू किया है। नीति में हुए इस रणनीतिक बदलाव के अनुसार, जो परिवार हर महीने 201 से 400 यूनिट के बीच बिजली की खपत करते हैं, उन्हें 3 किलोवाट तक की क्षमता वाले रूफटॉप सोलर पैनल लगाने के लिए विशेष वित्तीय सहायता, केंद्र व राज्य की संयुक्त सब्सिडी और अतिरिक्त जेनरेशन बेस्ड इंसेंटिव (GBI) के जरिए लगभग मुफ्त जैसी सुविधा दी जा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि उपभोक्ता को अपनी जेब से शुरुआती निवेश के रूप में नाममात्र की रकम देनी होगी, या तय मॉडल के तहत निजी वेंडर्स के सहयोग से बिना किसी अग्रिम भुगतान के छत पर सोलर सिस्टम स्थापित हो सकेगा।
इस नीति का मुख्य आधार राजधानी में उपलब्ध लाखों स्वतंत्र मकानों, कॉलोनियों और ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों की छतों का शत-प्रतिशत उपयोग करना है। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि औसतन 1 किलोवाट का सोलर पैनल प्रतिदिन 4 से 5 यूनिट बिजली का उत्पादन करता है। ऐसे में 3 किलोवाट का प्लांट महीने में लगभग 360 से 450 यूनिट हरित ऊर्जा का उत्पादन आसानी से कर देता है। यदि किसी परिवार की खपत 350 से 400 यूनिट प्रति माह है, तो उसका कुल उत्पादन उसकी मासिक मांग के ठीक बराबर या उससे अधिक बैठता है, जिससे महीने का नेट बिजली बिल शून्य के आंकड़े पर पहुंच जाता है।
दिल्ली की इस अद्यतन रूफटॉप सौर नीति की सबसे आकर्षक कड़ी इसका जेनरेशन बेस्ड इंसेंटिव (GBI) मॉडल है। बिजली कंपनियों (डिस्कॉम्स) जैसे टाटा पावर डीडीएल (TPDDL), बीएसईएस राजधानी (BRPL) और बीएसईएस यमुना (BYPL) के साथ नेट मीटरिंग व्यवस्था के तहत उपभोक्ता के घर पर एक बाइ-डायरेक्शनल मीटर लगाया जाता है। यह मीटर दिन के समय पैदा होने वाली सौर ऊर्जा और रात के समय ग्रिड से ली जाने वाली बिजली का सटीक हिसाब रखता है।
नीति के तहत न केवल ग्रिड को दी जाने वाली बिजली का समायोजन बिल में होता है, बल्कि उत्पादित प्रति यूनिट सौर बिजली पर राज्य सरकार की ओर से तय समयावधि तक सीधा नकद प्रोत्साहन उपभोक्ता के खाते में भेजा जाता है। इस प्रकार, जो उपभोक्ता 400 यूनिट के स्लैब में आते हैं, वे न केवल अपना चालू बिल शून्य कर लेंगे, बल्कि यदि गर्मियों की छुट्टियों या सर्दियों के दिनों में बिजली का इस्तेमाल कम हुआ, तो अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचकर बैंक खाते में सीधी आय भी हासिल कर सकेंगे।
भौगोलिक दृष्टिकोण से दिल्ली देश का एक ऐसा महानगर है जहां गर्मियों के चरम दिनों में बिजली की मांग 8000 मेगावाट का आंकड़ा पार कर जाती है। एयर कंडीशनर और कूलरों के भारी लोड के चलते स्थानीय ट्रांसफार्मरों पर जबरदस्त दबाव बनता है। इस समस्या से निपटने के लिए मोहल्लों और आवासीय कॉलोनियों के स्तर पर ही बिजली का विकेंद्रीकृत उत्पादन सबसे असरदार उपाय बनकर उभरा है। जब हजारों घरों की छतों पर 3 किलोवाट के पैनल एक साथ धूप से बिजली बनाएंगे, तो दिन के वक्त ग्रिड पर पड़ने वाला पीक लोड कई गुना कम हो जाएगा।
इसके अलावा, राजधानी में वायु प्रदूषण और कार्बन फुटप्रिंट को कम करने की दिशा में यह एक गेम-चेंजर साबित होगा। कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों से आने वाली बिजली पर दिल्ली की निर्भरता कम होने से प्रतिवर्ष लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी दर्ज की जाएगी। स्थानीय स्तर पर सोलर इंस्टॉलेशन, मेंटेनेंस और इनवर्टर सर्विसिंग के क्षेत्र में हजारों युवाओं के लिए नए तकनीकी रोजगार के द्वार भी खुलेंगे।
इस योजना का लाभ उठाने के लिए दिल्ली के उपभोक्ताओं को किसी भी सरकारी दफ्तर के चक्कर काटने की आवश्यकता नहीं है। पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और पूर्णतः डिजिटल रखा गया है। उपभोक्ता राष्ट्रीय सोलर रूफटॉप पोर्टल या अपनी संबंधित बिजली वितरण कंपनी (BRPL, BYPL या TPDDL) के आधिकारिक पोर्टल पर जाकर सीधे ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं।
आवेदन के लिए मुख्य रूप से उपभोक्ता का नवीनतम बिजली बिल, आधार कार्ड, बैंक खाते का विवरण और छत का मालिकाना हक या अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) आवश्यक होता है। आवेदन दर्ज होने के बाद संबंधित डिस्कॉम के तकनीकी अधिकारी साइट का भौतिक निरीक्षण करते हैं और छत की लोड क्षमता तथा धूप की उपलब्धता का आकलन करते हैं। मंजूरी मिलने के बाद पैनल इंस्टॉलेशन, नेट मीटरिंग और सब्सिडी ट्रांसफर की प्रक्रिया तय समयसीमा के भीतर पूरी कर दी जाती है।
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