
घर की बढ़ती जरूरत, माता-पिता के लिए अलग आशियाना या फिर रियल एस्टेट में रेंटल इनकम कमाने के उद्देश्य से कई लोग जिंदगी में दूसरी बार होम लोन (Second Home Loan) लेने का फैसला करते हैं। अगर आपके पास पहले से एक एक्टिव होम लोन चल रहा है या आपने पहला लोन हाल ही में चुकाया है, तो बैंक दूसरा लोन देने में आमतौर पर हिचकिचाते नहीं हैं बशर्ते आपका क्रेडिट स्कोर 750 से ऊपर हो। लेकिन पहली बार होम लोन लेने और दूसरी बार होम लोन लेने के वित्तीय गणित में जमीन-आसमान का अंतर होता है। बैंक की मंजूरी मिलने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपकी जेब दोहरी ईएमआई (Double EMI) का बोझ उठाने के लिए तैयार है। नया एग्रीमेंट साइन करने से पहले खुद से ये 3 बुनियादी सवाल पूछना और सटीक कैलकुलेशन समझना बेहद जरूरी है।
बैंक किसी भी ग्राहक को दूसरा लोन देने से पहले उसके ‘फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेशियो’ (FOIR) की कड़ी जांच करते हैं। अधिकांश बैंक यह अनिवार्य करते हैं कि आपकी कुल मासिक ईएमआई (पहला लोन + दूसरा लोन + कार लोन/पर्सनल लोन) आपकी शुद्ध मासिक आय (Net Take-Home Salary) के 50% से 55% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
मान लीजिए आपकी मासिक इन-हैंड सैलरी ₹1,50,000 है और आपके पहले होम लोन की ईएमआई ₹35,000 प्रति माह जा रही है। 50% के सुरक्षित FOIR नियम के मुताबिक, आपकी सभी ईएमआई का कुल योग ₹75,000 से ऊपर नहीं होना चाहिए। इसका मतलब है कि नए लोन के लिए आपके पास अधिकतम ₹40,000 प्रति माह की ही ईएमआई क्षमता बचती है। अगर आप 60-70% आय केवल किस्तों में झोंक देंगे, तो बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल इमरजेंसी, परिवार के रहन-सहन और रिटायरमेंट की बचत पूरी तरह ठप हो जाएगी।
यदि आप दूसरा घर केवल निवेश या किराए की कमाई (Rental Yield) के मकसद से खरीद रहे हैं, तो भारत के रियल एस्टेट बाजार की जमीनी हकीकत को समझना होगा। भारत के प्रमुख मेट्रो शहरों (मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे) में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की औसत रेंटल यील्ड मात्र 2.5% से 3.5% सालाना के बीच घूमती है।
दूसरी ओर, बैंक आपको दूसरा होम लोन 8.50% से 9.00% की सालाना ब्याज दर पर देंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि किराए से मिलने वाला पैसा बैंक की ईएमआई का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही निकाल पाएगा। बाकी 65% से 70% किस्त, प्रॉपर्टी टैक्स, मेंटेनेंस चार्ज और घर खाली रहने के महीनों का वित्तीय भार आपको अपनी जेब से ही उठाना पड़ेगा। जब तक उस इलाके में प्रॉपर्टी के दामों में सालाना 10-12% से अधिक की पूंजीगत बढ़ोतरी (Capital Appreciation) की ठोस संभावना न हो, तब तक भारी कर्ज पर निवेश करना घाटे का सौदा बन सकता है।
यह वह सबसे कड़वा सच है जिसे ज्यादातर होम बायर्स पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं। कई लोगों को यह गलतफहमी होती है कि दो होम लोन होने पर उन्हें दोनों घरों के मूलधन और ब्याज पर अलग-अलग डबल टैक्स छूट मिलेगी। आयकर कानून (Income Tax Act) के तहत टैक्स नियमों की सीमाएं बिल्कुल स्पष्ट हैं:
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मूलधन (Principal Repayment – Section 80C): आप चाहे एक होम लोन चुका रहे हों या दो, धारा 80C के तहत कुल कटौती की अधिकतम सीमा ₹1,50,000 सालाना ही है। इसी डेढ़ लाख में आपकी पीपीएफ, ईपीएफ, ईएलएसएस और बच्चों की ट्यूशन फीस भी शामिल होती है।
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ब्याज पर छूट (Interest Deduction – Section 24b): यदि आपके पास दो मकान हैं और आप दोनों को ‘सेल्फ-ऑक्यूपाइड’ (खुद रहने के लिए) घोषित करते हैं, तब भी दोनों मकानों के ब्याज को मिलाकर अधिकतम टैक्स छूट सीमा केवल ₹2,00,000 प्रति वर्ष ही रहेगी।
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किराए पर दिया गया मकान (Let-Out Property): यदि आप दूसरा मकान किराए पर देते हैं, तो उसके पूरे ब्याज को रेंटल इनकम के सामने सेट-ऑफ किया जा सकता है। लेकिन हाउस प्रॉपर्टी हेड के तहत होने वाले कुल नुकसान (Loss from House Property) को अन्य आय (सैलरी) से घटाने की अधिकतम सीमा भी ₹2,00,000 सालाना पर ही सीमित कर दी गई है। बाकी बचा हुआ नुकसान अगले 8 सालों तक कैरी-फॉरवर्ड तो होता है, लेकिन चालू वित्त वर्ष में टैक्स राहत सीमित ही मिलती है।
यदि आप मौजूदा 8.50% की औसत ब्याज दर पर 20 साल की अवधि के लिए ₹50 लाख का दूसरा होम लोन लेते हैं, तो मासिक ईएमआई और कुल भुगतान का सटीक वित्तीय ब्योरा इस प्रकार रहेगा:
| लोन का विवरण | वित्तीय मान (Financial Values) |
| लोन की मूल राशि (Principal Amount) | ₹50,00,000 |
| ब्याज दर (Annual Interest Rate) | 8.50% प्रति वर्ष |
| लोन की अवधि (Loan Tenure) | 20 वर्ष (240 महीने) |
| मासिक ईएमआई (Monthly EMI) | ₹43,391 |
| 20 साल में कुल चुकाया गया ब्याज | ₹54,13,879 |
| कुल देय राशि (Principal + Total Interest) | ₹1,04,13,879 |
जैसा कि गणना से स्पष्ट है, ₹50 लाख के कर्ज पर आप 20 सालों में ₹54.13 लाख से अधिक केवल बैंक को ब्याज के रूप में चुकाएंगे। यानी मकान की मूल कीमत से अधिक पैसा केवल फाइनेंसिंग कॉस्ट में चला जाएगा।
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पर्याप्त इमरजेंसी फंड रखें: दो होम लोन का मतलब है दोहरी जिम्मेदारी। नौकरी छूटने या व्यापार में मंदी की स्थिति से निपटने के लिए कम से कम 9 से 12 महीने की दोनों ईएमआई और घरेलू खर्च के बराबर लिक्विड फंड (एफडी या लिक्विड म्यूचुअल फंड) में अलग से रखें।
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टर्म इंश्योरेंस कवर बढ़ाएं: नया लोन लेते ही अपने मौजूदा टर्म इंश्योरेंस कवर को नए कर्ज की राशि के बराबर तुरंत बढ़ाएं ताकि किसी अनहोनी की स्थिति में परिवार पर कर्ज का पहाड़ न टूटे।
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प्री-पेमेंट की रणनीति बनाएं: हर साल मिलने वाले बोनस या इंसेंटिव से लोन का 5% से 10% मूलधन प्री-पे करने की योजना रखें ताकि लोन 20 साल के बजाय 10 से 12 साल में खत्म हो सके।
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जॉइंट होम लोन पर विचार करें: यदि जीवनसाथी कामकाजी हैं, तो उन्हें को-ऐप्लिकेंट बनाकर लोन लें। इससे आपकी एलिजिबिलिटी बढ़ेगी और दोनों पार्टनर्स अलग-अलग टैक्स छूट का लाभ उठा सकेंगे।
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