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सोनभद्र में 48 बीघा आदिवासी जमीन पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: प्रशासन की कार्रवाई पर मुहर, डिप्टी कलेक्टर के आदेश में दखल से इनकार

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले की दुद्धी तहसील अंतर्गत बघाड़ू गांव में चर्चित 48 बीघा आदिवासी भूमि प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने संबंधित जमीन के अवैध हस्तांतरण पर जिला प्रशासन की ओर से की गई दंडात्मक कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने डिप्टी कलेक्टर दुद्धी द्वारा दिए गए पूर्व आदेशों को पूर्णतः बरकरार रखते हुए प्रशासनिक तंत्र को आगे की वैधानिक कार्रवाई के लिए हरी झंडी दे दी है। इस बड़े न्यायिक निर्णय के बाद स्थानीय स्तर पर आदिवासी समुदाय के अधिकारों के संरक्षण को कानूनी मजबूती मिली है और जमीन को ग्राम सभा अथवा राज्य सरकार के खाते में निहित करने की प्रक्रिया तेज हो गई है।

यह पूरा विवाद दुद्धी तहसील के बघाड़ू क्षेत्र में स्थित करीब 48 बीघा जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़ा हुआ था। राजस्व विभाग की आंतरिक जांच में यह तथ्य उजागर हुआ कि आदिवासी परिवारों की जमीन को फर्जी या संदेहास्पद जाति प्रमाणपत्रों के सहारे नियमों को ताक पर रखकर खरीदा गया था। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता और आदिवासी भूमि संरक्षण नियमों के तहत गैर-आदिवासी व्यक्ति किसी आदिवासी की जमीन बिना सक्षम अधिकारी यानी जिलाधिकारी की पूर्व अनुमति के नहीं खरीद सकता। इस मामले में रजिया उर्फ दुलरिया और नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा के नाम से अलग-अलग बैनामों के जरिए जमीन की रजिस्ट्री कराई गई थी। प्रशासन की विस्तृत जांच में सामने आया कि ये बैनामे कानून की तय प्रक्रियाओं और प्रावधानों के सरासर खिलाफ थे।

प्रकरण की गहराई से छानबीन के दौरान यह खुलासा हुआ कि रजिया उर्फ दुलरिया के नाम वर्ष 2012 में एक अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्र जारी किया गया था। इसी प्रमाणपत्र का सहारा लेकर आदिवासी जमीन की रजिस्ट्री कराई गई। जब मामले की शिकायत उठी, तो जिला स्तरीय जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड, परिवार के मूल दस्तावेज, स्थानीय गवाहों के बयान और ऐतिहासिक साक्ष्यों की सघन जांच की। जांच में यह प्रमाणित हुआ कि लाभार्थी नियमों के मुताबिक अनुसूचित जनजाति वर्ग की वास्तविक पात्र नहीं थी, जिसके बाद सत्यापन समिति ने 2012 में जारी उस एसटी प्रमाणपत्र को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया। प्रमाणपत्र रद्द होते ही जमीन की रजिस्ट्री की कानूनी वैधता स्वतः समाप्त हो गई और प्रशासन ने इन बैनामों को शून्य घोषित कर जमीन को सरकारी नियंत्रण में लेने की कार्रवाई शुरू की।

दूसरे पक्ष में नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा की ओर से खरीदी गई भूमि को लेकर भी कानूनी विवाद खड़ा हुआ था। नन्हकी ने खुद को जन्म से भुइयां अनुसूचित जनजाति का बताते हुए अपनी रजिस्ट्री को वैध ठहराया था और डिप्टी कलेक्टर दुद्धी द्वारा जमीन निरस्त किए जाने के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वह आदिवासी पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती हैं, इसलिए उन पर गैर-आदिवासी के रूप में जमीन खरीदने का प्रतिबंध लागू नहीं होना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अपनी निरंतर जनजातीय पहचान और समाज से सक्रिय जुड़ाव का कोई ठोस व अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रही।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक बेहद अहम कानूनी बिंदु पर स्पष्ट टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि केवल धर्म परिवर्तन कर लेने भर से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति का वैधानिक दर्जा अपने आप समाप्त नहीं होता, किंतु यह साबित करना अनिवार्य है कि वह व्यक्ति वास्तव में अपनी जनजातीय पहचान, विशिष्ट परंपराओं, रीति-रिवाजों और अपने मूल समुदाय के सामाजिक ताने-बाने से निरंतर जुड़ा हुआ है। न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यही था कि क्या जमीन की खरीद के समय खरीदार अपनी जनजातीय पहचान को प्रमाणित करने में सक्षम रहा। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों और साक्ष्यों का समग्रता से परीक्षण करते हुए पाया कि जमीन की खरीद कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी, इसलिए डिप्टी कलेक्टर दुद्धी द्वारा दिए गए आदेश में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की कोई कानूनी गुंजाइश नहीं बनती।

उच्च न्यायालय का यह फैसला आते ही सोनभद्र में प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह सक्रिय हो गया है। जिला प्रशासन ने साफ संकेत दिए हैं कि इस 48 बीघा विवादित जमीन से अवैध कब्जे हटाकर इसे जनहित के व्यापक कार्यों में उपयोग किया जाएगा। प्रशासनिक योजना के अनुसार इस भूमि का इस्तेमाल सार्वजनिक खेल मैदान, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, पंचायत भवन या अन्य सरकारी जनकल्याणकारी परियोजनाओं के निर्माण के लिए किया जा सकता है। प्रशासन का कहना है कि प्राकृतिक संपदा और आदिवासी बहुल इस सीमावर्ती जिले में भू-माफियाओं द्वारा आदिवासियों की जमीन पर अवैध कब्जे के किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस न्यायिक फैसले के बाद जिले में सियासी सरगर्मी भी तेज हो गई है। स्थानीय भाजपा जिलाध्यक्ष नंदलाल गुप्ता ने इस पूरे प्रकरण को आदिवासी समाज की जमीन के अवैध हस्तांतरण से जोड़ते हुए ‘लैंड जिहाद’ का आरोप लगाया और जिले भर में फर्जी दस्तावेजों के जरिए हथियाई गई अन्य जमीनों की भी उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है। हालांकि, विधिक जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का फैसला किसी राजनीतिक बयानबाजी पर नहीं, बल्कि भूमि हस्तांतरण की कानूनी प्रक्रिया, साक्ष्यों की वैधता और फर्जी दस्तावेजों के निरस्तीकरण के ठोस आधार पर टिका है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े रुख से पूरे विंध्य और पूर्वांचल क्षेत्र में आदिवासी जमीनों की खरीद-फरोख्त में लगे भू-माफियाओं में हड़कंप मच गया है। डिप्टी कलेक्टर दुद्धी के आदेश पर अदालत की मुहर लगने से यह साफ संदेश गया है कि नियमों को दरकिनार कर आदिवासियों के अधिकारों का हनन करने वालों पर कानून का डंडा सख्ती से चलेगा। अब जिला प्रशासन 48 बीघा जमीन पर भौतिक कब्जा लेकर इसे राजस्व अभिलेखों में पूर्ण रूप से सुरक्षित करने और अवैध खरीद-फरोख्त में शामिल अन्य कड़ियों की जांच को आगे बढ़ाने की तैयारी में जुट गया है।