
नई दिल्ली। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर गाजे-बाजे और अपार उत्साह के साथ घर-घर व भव्य पंडालों में पधारे प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की विदाई की पावन बेला आ गई है। 10 दिनों तक भक्तों के दुख हरने और रिद्धि-सिद्धि का वरदान देने के बाद, अनंत चतुर्दशी के महापर्व पर श्रद्धालु भारी मन और नम आंखों से बप्पा को विदा करते हैं। चारों तरफ केवल एक ही गूंज सुनाई दे रही है—“गणपति बप्पा मोरया, पुढ़च्या वर्षी लवकर या” (गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ)।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत की रचना के लिए महर्षि वेदव्यास जी के आग्रह पर भगवान गणेश ने लगातार 10 दिनों तक बिना रुके महाभारत महाकाव्य का लेखन किया था। लगातार लिखने के कारण उनके शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया था। 10वें दिन यानी अनंत चतुर्दशी पर वेदव्यास जी ने बप्पा को शीतल जल (सरस्वती नदी) में स्नान कराकर उनका ताप शांत किया था। इसी स्मृति में हर वर्ष 10 दिनों की सेवा के बाद गणेश प्रतिमा का जल में विसर्जन करने की परंपरा है। विसर्जन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक पवित्र अनुष्ठान है। यदि विदाई शास्त्रों में बताए गए नियमों और मर्यादा के साथ न की जाए, तो 10 दिनों की पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
बप्पा को विदा करने से पहले घर या पंडाल में विधिवत पूजन करना अनिवार्य होता है। विसर्जन की सही वैदिक प्रक्रिया इस प्रकार है:
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प्रातः षोडशोपचार पूजा व भोग: विसर्जन वाले दिन सुबह स्नान कर बप्पा की अंतिम दैनिक पूजा करें। उन्हें रोली, चंदन, अक्षत, दूर्वा, ताजे लाल फूल और जनेऊ अर्पित करें। बप्पा को उनके प्रिय मोदक, बेसन के लड्डू, पंचमेवा और ऋतुफलों का भोग लगाएं।
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कर्पूर आरती और क्षमा प्रार्थना: पूरे परिवार के साथ मिलकर गणेश जी की महाआरती गाएं। आरती के बाद हाथ जोड़कर जाने-अनजाने 10 दिनों की सेवा में हुई किसी भी भूल या त्रुटि के लिए क्षमा मांगें—“हे विघ्नहर्ता! हम अज्ञानी हैं, हमारी सेवा को स्वीकार करें और परिवार पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।”
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चौकी/पाटा हिलाना (प्रस्थान संकल्प): पूजा संपन्न होने के बाद बप्पा जिस लकड़ी की चौकी (पाटा) पर विराजमान हैं, उसे दाहिने हाथ से थोड़ा सा आगे की ओर सरकाएं या हिलाएं। इसे देव प्रतिमा का ‘उत्थापन’ (प्रस्थान) कहा जाता है। इसका अर्थ है कि अब बप्पा ने विदाई की अनुमति दे दी है।
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पाथेय (रास्ते का प्रसाद) बांधना: जिस तरह हम किसी अपने को यात्रा पर भेजते समय रास्ते के लिए भोजन-पानी देते हैं, ठीक उसी तरह एक साफ पीले या लाल कपड़े में 5 लड्डू/मोदक, थोड़ी दूर्वा, सुपारी, अक्षत और दक्षिणा (सिक्का) बांधकर बप्पा की प्रतिमा के साथ रखें।
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विसर्जन मंत्र का उच्चारण: प्रतिमा को आदरपूर्वक दोनों हाथों से उठाकर विसर्जन स्थल (पवित्र नदी, सरोवर या घर में इको-फ्रेंडली टब) की ओर ले जाएं और इस मंत्र का जाप करते रहें:
‘गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥’
(अर्थ: हे देवताओं में श्रेष्ठ परमेश्वर! आप अपने परम धाम को पधारें और मेरे द्वारा की गई इस पूजा को पूर्णता प्रदान करें।)
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आदरपूर्वक जल समाधि: विसर्जन स्थल पर पहुंचकर बप्पा का मुख अपनी ओर रखें और धीरे-धीरे उन्हें जल में प्रवाहित करें।
धार्मिक मान्यता है कि विदाई के समय की गई छोटी सी लापरवाही भी वास्तु दोष और अमंगल का कारण बन सकती है:
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1. प्रतिमा को पानी में फेंकना सख्त वर्जित: कई लोग जल्दबाजी में या दूर से ही मूर्ति को नदी, नहर या तालाब में उछाल या फेंक देते हैं। ऐसा करना भगवान का घोर अपमान माना जाता है। पानी में उतरकर या किनारे पर झुककर मूर्ति को अत्यंत आदर और सहजता से जल में धीरे-धीरे डुबोएं।
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2. राहुकाल में विसर्जन का शुभारंभ: पंचांग देखकर ही विसर्जन यात्रा शुरू करें। दिन के राहुकाल के समय प्रतिमा को चौकी से उठाना या विसर्जित करना अशुभ माना जाता है। हमेशा शुभ, लाभ, अमृत या चर चौघड़िया मुहूर्त में ही यात्रा निकालें।
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3. काले और नीले वस्त्र पहनना: विसर्जन कोई शोक का समय नहीं, बल्कि उत्सव की विदाई है। इस दिन काले, नीले या मैले वस्त्र पहनने से बचें। लाल, पीले, नारंगी या पारंपरिक श्वेत-केसरिया वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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4. हवन सामग्री और निर्माल्य को कूड़े में फेंकना: 10 दिनों तक चढ़ाई गई दूर्वा, फूल, माला और कलश का नारियल कभी भी सामान्य कूड़ेदान में न डालें। इसे ‘निर्माल्य’ कहा जाता है। इसे या तो प्रतिमा के साथ जल में प्रवाहित करें या घर के गमले में मिट्टी के नीचे दबाकर जैविक खाद बना लें।
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5. कलश के जल को नाली में बहाना: गणेश स्थापना के समय जो मंगल कलश स्थापित किया जाता है, उसके पवित्र जल को कभी भी सिंक या नाली में न बहाएं। इस जल में आम के पत्तों से पूरे घर में छिड़काव करें ताकि नकारात्मक ऊर्जा दूर हो, और शेष जल को तुलसी या किसी पवित्र पौधे में अर्पित कर दें।
यदि आपके घर में मिट्टी (शाडू माटी) से बने इको-फ्रेंडली गणपति बप्पा स्थापित हैं, तो नदियों और जलाशयों को प्रदूषित होने से बचाने के लिए सबसे श्रेष्ठ उपाय है ‘होम विसर्जन’:
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घर की बालकनी या आंगन में एक साफ बड़ा टब या बाल्टी लें और उसे गंगाजल मिश्रित शुद्ध पानी से भरें।
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बप्पा की प्रतिमा को उसमें धीरे-धीरे रखें। कुछ ही घंटों में मिट्टी पूरी तरह पानी में घुल जाएगी।
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इसके बाद उस पवित्र मिट्टी और जल को घर के गमलों या बगीचे के पौधों (जैसे तुलसी, अपराजिता या शमी) में डाल दें। इस तरह बप्पा आपके घर में ही प्रकृति और हरियाली के रूप में सदा वास करेंगे।
बप्पा की यह विदाई एक नए इंतजार की शुरुआत है। विघ्नहर्ता से यही प्रार्थना की जाती है कि वे जाते-जाते घर के सारे संकट, रोग, दरिद्रता और क्लेश अपने साथ ले जाएं और परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की सौगात छोड़ जाएं।
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