
जल ही जीवन है, लेकिन आधुनिक दौर में अशुद्ध और दूषित पानी कई गंभीर बीमारियों की जड़ भी बन चुका है। इसी डर के चलते आज देश के लगभग हर दूसरे घर में रिवर्स ऑस्मोसिस यानी आरओ (RO) वॉटर प्यूरीफायर लग चुका है। दिल्ली, लखनऊ, पटना, जयपुर, मुंबई या बेंगलुरु जैसे शहरों में लोग अक्सर यह मानते हैं कि पानी का टीडीएस (TDS) जितना कम होगा, पानी उतना ही अधिक शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक होगा। कई घरों में आरओ टेक्नीशियन टीडीएस के स्तर को घटाकर 30, 40 या 50 पीपीएम (PPM) तक सेट कर देते हैं और लोग इसे सबसे ‘साफ’ पानी मानकर पीते रहते हैं।
चिकित्सा विज्ञान और जल वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि अत्यधिक कम टीडीएस वाला पानी पीने से शरीर में आवश्यक खनिजों की भारी कमी हो जाती है, जो दिल, हड्डियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता को अंदर से कमजोर कर देता है। आइए जानते हैं कि आखिर टीडीएस क्या होता है और स्वास्थ्य के नजरिए से इसका आदर्श पैमाना क्या होना चाहिए।
टीडीएस का पूरा नाम टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड्स (Total Dissolved Solids) है। इसका सीधा अर्थ है कि पानी के भीतर घुले हुए कुल ठोस पदार्थों की मात्रा कितनी है। इसे पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन – PPM) या मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) में मापा जाता है।
पानी में घुले इन ठोस तत्वों में दो तरह के घटक शामिल होते हैं:
-
आवश्यक खनिज (Good Minerals): कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम, सोडियम और बाइकार्बोनेट—जो शरीर की हड्डियों, मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र के सामान्य संचालन के लिए अनिवार्य हैं।
-
हानिकारक अशुद्धियां (Harmful Contaminants): सीसा (Lead), आर्सेनिक, पारा, फ्लोराइड, नाइट्रेट्स और औद्योगिक कचरे से निकले भारी धातु (Heavy Metals)।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS – IS 10500:2012) के दिशा-निर्देशों के अनुसार पीने के पानी के टीडीएस स्तर को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है:
-
50 से कम (अत्यधिक नुकसानदेह): यदि आपके पानी का टीडीएस 50 से नीचे है, तो वह ‘डेड वॉटर’ (Dead Water) या मिनरल-रहित डिस्टिल्ड पानी जैसा बन जाता है। ऐसा पानी स्वाद में कसैला और अम्लीय होता है, जो आंतों में आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट्स को सोखने के बजाय शरीर से बाहर खींच लेता है।
-
80 से 150 PPM (स्वीकार्य लेकिन थोड़ा कम): यह पानी पीने के लिए सुरक्षित तो है, लेकिन इसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम की मात्रा काफी कम हो जाती है।
-
150 से 300 PPM (सर्वोत्तम और आदर्श स्तर): स्वास्थ्य विशेषज्ञों, हृदय रोग विशेषज्ञों और पोषण विशेषज्ञों के अनुसार 150 से 250 (अधिकतम 300) पीपीएम का स्तर मानव शरीर के लिए सबसे उत्कृष्ट माना गया है। इस स्तर पर पानी का स्वाद मीठा और संतुलित रहता है और शरीर को दैनिक आवश्यकता के जरूरी खनिज पानी से ही मिल जाते हैं।
-
300 से 500 PPM (पीने योग्य): यह पानी पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है, हालांकि इसका स्वाद थोड़ा भारी हो सकता है।
-
500 से अधिक PPM (खराब): 500 से 1,000 पीपीएम का पानी हार्ड वॉटर होता है और 1,000 से ऊपर का पानी पीने योग्य नहीं माना जाता।
| टीडीएस स्तर (PPM / mg/L) | पानी की गुणवत्ता | स्वास्थ्य के लिए प्रभाव |
| < 50 PPM | अत्यधिक कम (De-mineralized) | हानिकारक: हड्डियों की कमजोरी और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन |
| 50 – 150 PPM | मध्यम | सुरक्षित, पर खनिजों की आंशिक कमी |
| 150 – 250 PPM | सर्वोत्तम (Excellent) | आदर्श: स्वाद, पाचन और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए बेस्ट |
| 250 – 300 PPM | बहुत अच्छा (Good) | दैनिक उपयोग और मिनरल्स के संतुलन के लिए उपयुक्त |
| 300 – 500 PPM | सामान्य / स्वीकार्य | सुरक्षित, बिना किसी गंभीर साइड इफेक्ट के |
| > 500 PPM | खराब (Hard Water) | आरओ प्यूरीफायर का इस्तेमाल अनिवार्य |
अक्सर लोग स्वाद के चक्कर में आरओ का टीडीएस 50 से नीचे करवा लेते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, लगातार लो-टीडीएस वाला डी-मिनरलाइज्ड पानी पीने से शरीर में ये परेशानियां हो सकती हैं:
-
हड्डियों का खोखलापन और जोड़ों का दर्द: जब पानी में शून्य कैल्शियम होता है, तो रक्त के पीएच स्तर को बनाए रखने के लिए शरीर हड्डियों से कैल्शियम खींचने लगता है। इससे समय से पहले ऑस्टियोपोरोसिस और जोड़ों में दर्द शुरू हो जाता है।
-
दिल की बीमारियों का खतरा: पानी में मौजूद मैग्नीशियम हृदय की मांसपेशियों को सामान्य रूप से धड़कने में मदद करता है। मैग्नीशियम-रहित पानी लंबे समय तक पीने से उच्च रक्तचाप (Hypertension) और दिल के दौरे का खतरा बढ़ सकता है।
-
लगातार थकान और मांसपेशियों में ऐंठन: सोडियम और पोटेशियम के अभाव में शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ता है, जिससे दिनभर सुस्ती और सिरदर्द की शिकायत रहती है।
-
अम्लता (Acidity) बढ़ना: लो-टीडीएस पानी का पीएच स्तर 6.5 से नीचे गिरकर अम्लीय हो जाता है, जिससे पेट में लगातार जलन और गैस्ट्रिक अल्सर का जोखिम बनता है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और वैज्ञानिकों का स्पष्ट निर्देश है कि हर स्रोत के पानी के लिए आरओ की आवश्यकता नहीं होती:
-
यदि सप्लाई का पानी 300 PPM से कम है: यदि आपके घर में नगर निगम या जलकल की सप्लाई आती है और उसका टीडीएस 200 से 300 के बीच है, तो आरओ की बिल्कुल जरूरत नहीं है। वहां केवल एक सामान्य यूवी (UV) और यूएफ (UF) प्यूरीफायर या पानी को उबालकर पीना ही सबसे बेहतर विकल्प है।
-
यदि टीडीएस 500 PPM से अधिक है: यदि आप सीधे सबमर्सिबल, बोरवेल या अत्यधिक खारे भूजल का उपयोग कर रहे हैं जिसका टीडीएस 500 से 1500 के बीच है, केवल तभी आरओ का उपयोग करें।
-
टीडीएस कंट्रोलर और मिनरल कार्ट्रिज: यदि आपके घर में आरओ लगा हुआ है, तो मैकेनिक से कहकर उसका टीडीएस एडजस्टर (TDS Controller) 150 से 200 पीपीएम के बीच सेट करवाएं और साथ में एक अच्छी ‘मिनरल कार्ट्रिज’ या ‘एल्कलाइन फिल्टर’ अवश्य लगवाएं।
girls globe