
भारतीय शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था और देश की राजधानी दिल्ली में लगातार सामने आने वाली बुनियादी समस्याओं को लेकर अक्सर अपनी बेबाक राय रखने वाले मशहूर उद्यमी और शार्क टैंक फेम अशनीर ग्रोवर ने एक बार फिर से अपने तीखे बयानों से सनसनी मचा दी है। दिल्ली के एक पीजी में हाल ही में हुई दर्दनाक और झकझोर देने वाली दुर्घटना के बाद जहां हर तरफ शोक और गुस्से का माहौल है, वहीं अशनीर ग्रोवर ने इस पूरी घटना को केवल एक साधारण हादसा मानने से इनकार करते हुए देश की उच्च शिक्षा और शहरी बुनियादी ढांचे पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया और विभिन्न चर्चाओं के दौरान यह कड़ा बयान दिया है कि यदि दिल्ली विश्वविद्यालय यानी डीयू जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के विकास और आधुनिकीकरण के लिए बीस हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि की आवश्यकता है, तो सरकार को इस दिशा में प्राथमिकता के आधार पर काम करना चाहिए। अशनीर का यह तर्क है कि जब देश के युवाओं को अपनी ही राजधानी में सुरक्षित रहने के लिए ढंग के पीजी, हॉस्टल और बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलती हैं और शैक्षणिक संस्थानों में बजट की कमी बनी रहती है, तो मजबूर होकर मध्यम और उच्च वर्ग के लोग अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने को मजबूर हो जाते हैं। इस बेबाक और कड़े बयान के सामने आने के बाद से राजनीतिक गलियारों से लेकर शैक्षणिक जगत तक में एक नया भूचाल आ गया है, और लोग इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या भारत की शिक्षा और नगरीय व्यवस्था वाकई उस स्तर पर पिछड़ रही है जहां युवाओं को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
दिल्ली के पीजी हादसों का खौफनाक सच और छात्रों की सुरक्षा पर खड़े होते गंभीर सवाल
देश के कोने-कोने से लाखों छात्र हर साल अपने सुनहरे भविष्य की उम्मीद लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य बड़े संस्थानों में पढ़ाई करने के लिए आते हैं, जिनके रहने के लिए दिल्ली के मुखर्जी नगर, विजय नगर, ओखला और राजेंद्र नगर जैसे इलाके मुख्य केंद्र माने जाते हैं। लेकिन इन इलाकों में संचालित होने वाले अधिकांश प्राइवेट पीजी और हॉस्टल बिना किसी मानक, फायर सेफ्टी और प्रशासनिक अनुमति के अवैध रूप से चल रहे हैं, जहां छात्रों की जान हमेशा खतरे में बनी रहती है। हाल ही में हुए उस भीषण पीजी हादसे ने एक बार फिर से इस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है कि किस तरह से व्यावसायिक मुनाफे की अंधी दौड़ में छात्रों की सुरक्षा को ताक पर रख दिया जाता है और स्थानीय प्रशासन आंखें मूंदकर बैठा रहता है। जब युवा छात्र अपने घरों से दूर रहकर इस तरह के असुरक्षित माहौल में अपनी पढ़ाई पूरी करने को मजबूर होते हैं, तो उनके माता-पिता की सांसें हर वक्त अटकी रहती हैं कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। अशनीर ग्रोवर ने इसी व्यवस्था की पोल खोलते हुए यह सवाल उठाया है कि आखिर कब तक हमारे देश के बच्चे इस तरह की लापरवाही और लचर व्यवस्था की भेंट चढ़ते रहेंगे, और कब सरकार व प्रशासन इन अवैध और असुरक्षित पीजी संचालकों पर शिकंजा कसने के लिए कोई ठोस और स्थाई नीति बनाएगा।
शिक्षा के नाम पर बड़े-बड़े दावे और जमीनी स्तर पर बजट की कमी का गंभीर संकट
भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें देश में शिक्षा के स्तर को सुधारने और विश्वस्तरीय यूनिवर्सिटी बनाने के बड़े-बड़े दावे करती हैं, लेकिन जब धरातल पर बजट आवंटन और बुनियादी सुविधाओं की बात आती है, तो स्थिति काफी निराशाजनक नजर आती है। अशनीर ग्रोवर ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से इस बात का जिक्र किया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे ऐतिहासिक और विशाल संस्थान को अपनी साख बनाए रखने और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए भारी फंड की दरकार है, जिसे पूरा करने में सरकारें कंजूसी कर रही हैं। जब देश के प्रमुख सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रयोगशालाएं पुरानी हो जाती हैं, हॉस्टल की इमारतें जर्जर होने लगती हैं और रिसर्च के लिए पर्याप्त बजट नहीं मिलता है, तो छात्रों का मोहभंग होना स्वाभाविक हो जाता है। शिक्षा किसी भी राष्ट्र के विकास की सबसे पहली और मजबूत सीढ़ी होती है, और यदि उसी पर सबसे कम ध्यान दिया जाएगा, तो देश की प्रतिभाएं धीरे-धीरे विदेश की तरफ पलायन करने के लिए मजबूर हो जाएंगी। यही कारण है कि आज भारत का एक बहुत बड़ा छात्र वर्ग अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप के अन्य देशों का रुख कर रहा है, जहां उन्हें भले ही भारी भरकम फीस चुकानी पड़े, लेकिन कम से कम उन्हें एक सुरक्षित, आधुनिक और व्यवस्थित शैक्षणिक माहौल तो मिलता है।
भारत से विदेशों की ओर होता युवा पलायन और देश की अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा प्रभाव
अपने देश की लचर शिक्षा व्यवस्था, सुरक्षित आवासों की कमी और सीमित अवसरों से तंग आकर हर साल लाखों छात्र अपने माता-पिता की गाढ़ी कमाई खर्च करके विदेश की धरती पर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जा रहे हैं, जिसे आज के समय में ‘ब्रेन Drain’ यानी प्रतिभा पलायन के रूप में देखा जा रहा है। अशनीर ग्रोवर के इस बयान ने इस गंभीर मुद्दे पर एक बार फिर से रोशनी डाली है कि कैसे भारत अपने सबसे होनहार युवाओं को रोकने में नाकाम साबित हो रहा है क्योंकि हमारे यहां का सिस्टम उन्हें वह भरोसा नहीं दे पा रहा है जिसकी वे उम्मीद करते हैं। जब छात्र एक बार विदेश चले जाते हैं, तो उनमें से अधिकांश लोग वहीं की कंपनियों में सेटल हो जाते हैं और अपनी योग्यता का लाभ भारत के बजाय दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को पहुंचाते हैं, जिससे देश को एक बहुत बड़ा आर्थिक और बौद्धिक नुकसान उठाना पड़ता है। यदि भारत को वाकई एक ग्लोबल सुपरपावर बनना है और दुनिया का नेतृत्व करना है, तो उसे अपने देश के अंदर ही ऐसे विश्वस्तरीय संस्थान और सुरक्षित शहर विकसित करने होंगे जहां युवा बिना किसी डर और परेशानी के अपनी पढ़ाई और करियर को आगे बढ़ा सकें। इसके लिए शिक्षा के बजट में भारी बढ़ोतरी करने के साथ-साथ शहरी विकास योजनाओं को भी पूरी पारदर्शिता और सख्ती के साथ लागू करने की आवश्यकता है, ताकि किसी भी छात्र को मजबूरी में अपना देश न छोड़ना पड़े।
अशनीर ग्रोवर के तीखे तेवर और सोशल मीडिया पर छिड़ी देशव्यापी बहस के मायने
अपने बेबाक अंदाज और बिना किसी लाग-लपेट के सीधे शब्दों में अपनी बात रखने के लिए पहचाने जाने वाले अशनीर ग्रोवर ने इस बार जिस तरह से दिल्ली के पीजी हादसे को शिक्षा व्यवस्था और सरकारी नीतियों से जोड़ा है, उसने आम जनता के दिलों को छू लिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उनके इस बयान को लाखों लोगों द्वारा शेयर किया जा रहा है और हर कोई इस बात की सराहना कर रहा कम से कम किसी ने तो मुख्यधारा की राजनीति से हटकर इस गंभीर मुद्दे पर खुलकर अपनी आवाज उठाई है। लोग अब यह मांग कर रहे हैं कि केवल बयानबाजी या संवेदना व्यक्त करने से कुछ नहीं होगा, बल्कि सरकार को तुरंत प्रभाव से दिल्ली और देश के अन्य बड़े शैक्षणिक केंद्रों में छात्रों के लिए हॉस्टल और पीजी के नियम कड़े करने चाहिए। यदि समय रहते इन बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह संकट और अधिक विकराल रूप धारण कर सकता है, जिससे देश के युवाओं का भविष्य अधर में लटक जाएगा। अशनीर ग्रोवर की यह चेतावनी नीति निर्माताओं के लिए एक बहुत बड़ी घंटी है जिसे सुनकर उन्हें नींद से जागना होगा और देश की शिक्षा तथा युवा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी, ताकि किसी भी अन्य माता-पिता को अपनी संतान को इस तरह की व्यवस्था की भेंट न चढ़ाना पड़े।
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