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ओडिशा के जंगलों में मिले 5 दुर्लभ ‘महावानर’: इंसानों से 95% मैच करता है DNA; हजारों किमी समंदर पार कर इंडोनेशिया से भारत कैसे पहुंचे?

पूर्वी भारत के समृद्ध जैव-विविधता वाले राज्य ओडिशा के घने वन क्षेत्र के करीब अचानक 5 विशाल और दुर्लभ महावानर (Apes – मुख्य रूप से ओरांगउटान प्रजाति) के मिलने से वन्यजीव विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और पर्यावरण प्रेमियों के बीच सनसनी फैल गई है।

चिकित्सकीय और आनुवंशिक (Genetic) विश्लेषण के प्राथमिक नमूनों से पुष्टि हुई है कि इन महावानरों का डीएनए (DNA) इंसानों से 95% से लेकर 97% तक मेल खाता है। भारत में प्राकृतिक रूप से वानर वर्ग में केवल असम और पूर्वोत्तर में पाए जाने वाले ‘हूलॉक गिब्बन’ (Hoolock Gibbon) ही वानर (Lesser Apes) के रूप में जाने जाते हैं। ऐसे में सुमात्रा और बोर्नियो के जंगलों में रहने वाले विशाल आकार के ओरांगउटान जैसे महावानरों का भारत की धरती पर मिलना किसी अजूबे से कम नहीं माना जा रहा था। लेकिन इस रहस्य के पीछे जो कहानी सामने आई है, उसने अंतरराष्ट्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के भी कान खड़े कर दिए हैं।

ओरांगउटान और चिम्पांजी वर्ग के ये जीव ‘ग्रेट एप्स’ (Great Apes) कहलाते हैं:

  • इंसानी समानता: इनका जेनेटिक कोड इंसानों के सबसे करीब होता है। इनके चेहरे के हाव-भाव, उंगलियों की पकड़, भावनाओं को व्यक्त करने का तरीका और समस्याओं को हल करने की बौद्धिक क्षमता इंसानी बच्चों के स्तर की होती है।

  • उपकरणों का इस्तेमाल: ये प्राकृतिक वातावरण में शाखाओं और पत्तों को औजार की तरह इस्तेमाल करने में सक्षम होते हैं।

  • शारीरिक बनावट: लाल-भूरे लंबे बाल, लंबे मजबूत हाथ और भारी-भरकम शरीर इनकी पहचान है।

सबसे बड़ा और पेचीदा सवाल यह था कि प्राकृतिक रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया के वर्षावनों में पाए जाने वाले ये महावानर हजारों किलोमीटर चौड़े हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी को पार करके ओडिशा के जंगलों तक कैसे पहुंचे?

वन विभाग और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) की विस्तृत जांच में इस रहस्य से पर्दा उठ गया है। यह कोई प्राकृतिक प्रवास (Natural Migration) नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी (Illegal Exotic Wildlife Trade) का एक संगठित और खतरनाक खेल था:

  • 1. समंदर के रास्ते गुप्त कंटेनर शिपमेंट: जांच में खुलासा हुआ कि इन 5 महावानरों को इंडोनेशिया के सुमात्रा क्षेत्र से अवैध शिकार कर पकड़ा गया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय समुद्री कार्गो जहाजों और अवैध मछली पकड़ने वाली बड़ी ट्रॉलरों के जरिए इन्हें गुप्त रूप से बंगाल की खाड़ी के रास्ते भारतीय समुद्री सीमा में लाया गया।

  • 2. म्यांमार-पूर्वोत्तर और तटीय रूट: तस्कर आमतौर पर विदेशी प्रजातियों के जानवरों को म्यांमार-मिजोरम सीमा के रास्ते या फिर ओडिशा-पश्चिम बंगाल की तटीय बेल्ट में गुप्त जेटी के जरिए उतारते हैं।

  • 3. प्राइवेट जू और रईसों के फार्महाउस का ऑर्डर: देश के कुछ बड़े शहरों में गैरकानूनी प्राइवेट चिड़ियाघर बनाने और स्टेटस सिंबल के तौर पर ‘एक्सोटिक पेट्स’ (Exotic Pets) पालने का चलन तेजी से बढ़ा है। इन दुर्लभ महावानरों की अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट में कीमत करोड़ों रुपये में आंकी जाती है।

  • 4. पकड़े जाने के डर से जंगलों में छोड़ा: पुलिस और कस्टम्स की सख्त चेकिंग तथा खुफिया सूचना के डर से तस्करों ने डिलीवरी से पहले ही इन्हें ओडिशा के सुनसान वन इलाके के पास कंटेनर से उतारकर लावारिस छोड़ दिया और मौके से फरार हो गए।

स्थानीय ग्रामीणों की सूचना पर तुरंत हरकत में आई वन विभाग की टीम ने पशु चिकित्सकों के साथ मिलकर एक सुरक्षित रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया और सभी 5 महावानरों को ट्रैंक्विलाइजर के न्यूनतम और सुरक्षित इस्तेमाल के साथ सुरक्षित कब्जे में ले लिया।

  • क्वॉरेंटाइन और मेडिकल केयर: विदेशी मूल के होने के कारण इनमें जूनोटिक संक्रमण (Zoonotic Diseases) की आशंका रहती है। फिलहाल इन्हें नंदनकानन या विशेष आइसोलेशन सेंटर में डॉक्टरों की 24 घंटे निगरानी में रखा गया है।

  • सीबीडी और साइट्स (CITES) के तहत कदम: भारत अंतरराष्ट्रीय संधि ‘CITES’ (लुप्तप्राय प्रजातियों के व्यापार पर कन्वेंशन) का हस्ताक्षरकर्ता देश है। इसके तहत अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और विदेश मंत्रालय इंडोनेशियाई सरकार के साथ संपर्क साध रहे हैं ताकि कानूनी औपचारिकताओं के बाद इन्हें सुरक्षित रूप से उनके मूल प्राकृतिक आवास में वापस (Repatriate) भेजा जा सके।

इस घटना ने एक बार फिर भारत के समुद्री और स्थलीय सीमाओं पर सक्रिय अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव माफिया के बढ़ते दुस्साहस को उजागर कर दिया है।