
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के निजीकरण और इसके पुनर्गठन को लेकर सोशल मीडिया और कुछ मीडिया मंचों पर चल रही अटकलों और भ्रामक रिपोर्टों पर स्पेस एजेंसी ने औपचारिक रूप से पूर्ण विराम लगा दिया है। इसरो के शीर्ष नेतृत्व और अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) ने एक स्पष्ट और कड़ा बयान जारी करते हुए इन सभी खबरों को पूरी तरह ‘निराधार, तथ्यहीन और बेबुनियाद’ करार दिया है। एजेंसी ने दो-टूक शब्दों में साफ किया है कि भारत सरकार या अंतरिक्ष विभाग के पास इसरो के किसी भी केंद्र, संपत्ति या उसके प्रशासनिक ढांचे को निजी हाथों में सौंपने या उसका निजीकरण (Privatisation) करने का कोई प्रस्ताव न तो विचाराधीन है और न ही भविष्य में ऐसी कोई योजना है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि देश में लागू किए गए प्रगतिशील अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधारों (Space Sector Reforms) को कुछ वर्गों द्वारा गलत तरीके से ‘निजीकरण’ का नाम देकर प्रस्तुत किया जा रहा है। इसरो ने देशवासियों और अंतरिक्ष प्रेमियों को आश्वस्त किया है कि भारत की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी के रूप में उसका दर्जा, स्वायत्तता और संप्रभु महत्व हमेशा पहले की तरह सर्वोच्च बना रहेगा।
इसरो नेतृत्व ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि निजीकरण की बात सोचना भी हास्यास्पद है, क्योंकि आने वाले दशकों में इसरो की राष्ट्रीय और रणनीतिक जिम्मेदारी घटने के बजाय कई गुना बढ़ने जा रही है। एजेंसी ने जोर देकर कहा कि नियमित उपग्रहों के निर्माण और वाणिज्यिक रॉकेट लॉन्चिंग के बोझ से मुक्त होकर इसरो अब अपना पूरा ध्यान और वैज्ञानिक संसाधन उन ‘अत्यधिक जटिल और अभूतपूर्व मिशनों’ पर केंद्रित कर रहा है जिन्हें कोई भी निजी कंपनी अपने दम पर करने का जोखिम नहीं उठा सकती। भारत का महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन ‘गगनयान’ (Gaganyaan), चंद्रमा से नमूने वापस लाने का ऐतिहासिक मिशन ‘चंद्रयान-4’ (Chandrayaan-4), मंगल और शुक्र ग्रह (Shukrayaan) के वैज्ञानिक अन्वेषण तथा वर्ष 2035 तक पृथ्वी की कक्षा में भारत का अपना ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (Bharatiya Antariksh Station – BAS) स्थापित करने जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स का संपूर्ण नेतृत्व पूरी तरह इसरो के कुशल वैज्ञानिकों के हाथों में ही रहेगा। इसके अलावा देश की सीमाओं की रक्षा, सैन्य निगरानी, उन्नत रडार इमेजिंग और आपदा प्रबंधन उपग्रहों के संवेदनशील डेटा का नियंत्रण भी हमेशा इसरो के विशेष अधिकार क्षेत्र में रहेगा, जहां किसी भी निजी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इसरो ने स्पष्ट किया है कि भारत सरकार की ‘भारतीय अंतरिक्ष नीति’ (Indian Space Policy) का मूल उद्देश्य इसरो का निजीकरण करना नहीं, बल्कि देश में एक मजबूत और आत्मनिर्भर निजी अंतरिक्ष इकोसिस्टम (Private Space Ecosystem) तैयार करना है। इस पूरी व्यवस्था को तीन प्रमुख स्तंभों के जरिए समझा जा सकता है:
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इसरो (ISRO): देश का मुख्य अनुसंधान एवं विकास (R&D) संस्थान, जो नई तकनीकों, अगली पीढ़ी के हेवी-लिफ्ट रॉकेट (Next-Gen Launch Vehicle – NGLV), डीप-स्पेस रोबोटिक्स और जटिल वैज्ञानिक खोजों का नेतृत्व करेगा।
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इन-स्पेस (IN-SPACe): भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र एक स्वतंत्र सिंगल-विंडो नियामक संस्था के रूप में कार्य करता है। इसका काम निजी स्टार्टअप्स (जैसे स्काईरूट, अग्निकुल, पिक्सल, ध्रुव स्पेस) को इसरो की सुविधाओं (लॉन्च पैड, टेस्टिंग फैसिलिटी) का उपयोग करने की अनुमति देना और उनके रॉकेट व सैटेलाइट्स को मंजूरी देना है, न कि इसरो को बेचना।
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न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL): यह अंतरिक्ष विभाग के अधीन भारत सरकार का पूर्ण स्वामित्व वाला सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (CPSE) है। इसका मुख्य कार्य उन परिपक्व तकनीकों (जैसे पीएसएलवी और एसएसएलवी रॉकेट निर्माण) का उद्योग जगत के साथ मिलकर व्यावसायिक उत्पादन करना है, ताकि इसरो के वैज्ञानिक फैक्टरी की तरह रॉकेट बनाने के बजाय नए अनुसंधानों में अपना समय लगा सकें।
इसरो द्वारा अपनाई जा रही यह रणनीति ठीक उसी सफल वैश्विक मॉडल पर आधारित है जिसे अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ (NASA) ने दशकों पहले अपनाया था। अमेरिका में नासा ने कभी अपना निजीकरण नहीं किया, बल्कि उसने स्पेसएक्स (SpaceX), बोइंग और नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन जैसी निजी अमेरिकी कंपनियों को व्यावसायिक कार्गो, रॉकेट निर्माण और संचार उपग्रहों के क्षेत्र में उतरने का अवसर दिया। परिणामस्वरूप, नासा का ध्यान जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप, आर्टेमिस मून मिशन और मार्स रोवर्स जैसे विशाल अनुसंधानों पर केंद्रित हो सका, जबकि निजी कंपनियों ने अंतरिक्ष प्रक्षेपण को सस्ता बनाकर वैश्विक बाजार पर कब्जा कर लिया। भारत भी ठीक इसी राह पर अग्रसर है। वर्तमान में 500 अरब डॉलर से अधिक की वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था (Global Space Economy) में भारत की हिस्सेदारी मात्र 2 से 3 प्रतिशत के आसपास है। भारत सरकार का लक्ष्य आगामी वर्षों में इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 8 से 10 प्रतिशत तक पहुंचाना है। यह लक्ष्य तभी हासिल हो सकता है जब देश के निजी स्टार्टअप्स और उद्योग जगत भी अंतरिक्ष की दौड़ में शामिल हों और इसरो उन्हें अपनी मेंटरशिप और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करे।
इसरो ने अपने कर्मचारियों, इंजीनियरों और वैज्ञानिक संगठनों की चिंताओं को भी पूरी तरह निराधार बताया है। कुछ अफवाहों में यह दावा किया गया था कि निजी कंपनियों के आने से इसरो के कर्मचारियों की नौकरियों, पेंशन और भर्ती प्रक्रियाओं पर असर पड़ेगा। इस पर अधिकारियों ने साफ किया कि इसरो के सभी वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारी पहले की तरह ही केंद्र सरकार के स्थायी कार्मिक बने रहेंगे और उनकी सेवा शर्तों में रत्ती भर भी बदलाव नहीं हुआ है। वास्तव में, इसरो के सभी प्रमुख केंद्रों—जैसे तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC), बेंगलुरु स्थित यूआर राव उपग्रह केंद्र (URSC), श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC SHAR) और अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC)—के बुनियादी ढांचे का लगातार विस्तार किया जा रहा है। सरकार ने अंतरिक्ष विभाग के वार्षिक बजट आवंटन में लगातार वृद्धि की है ताकि तमिलनाडु के कुलशेखरपट्टिनम में देश के दूसरे स्पेसपोर्ट का निर्माण, सेमी-क्रायोजेनिक इंजनों का विकास और मानव अंतरिक्ष उड़ान प्रयोगशालाओं को विश्वस्तरीय बनाया जा सके। इसरो ने आम जनता और युवाओं से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर फैलने वाली अपुष्ट और भ्रामक खबरों पर विश्वास न करें और देश की इस गौरवशाली संस्था की उपलब्धियों पर गर्व बनाए रखें।
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