
अगर आप रोजाना स्विगी या जोमैटो से खाना मंगवाते हैं या जेप्टो और ब्लिंकिट से 10 मिनट में ग्रॉसरी मंगाने के आदी हैं, तो यह खबर आपकी जेब और डिलीवरी व्यवस्था दोनों को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाली है। देश में ऐप-आधारित फूड डिलीवरी और क्विक-कॉमर्स सेक्टर को अब तक केवल ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब राज्य परिवहन विभाग इन्हें पारंपरिक ‘बाइक-टैक्सी’ और ट्रांसपोर्ट एग्रीगेटर के नियमों के दायरे में लाने की पूरी तैयारी में हैं।
महाराष्ट्र के परिवहन विभाग ने ‘महाराष्ट्र बाइक-टैक्सी रूल्स’ में संशोधन का एक नया प्रस्ताव तैयार किया है, जिसके तहत स्विगी, जोमैटो, जेप्टो, ब्लिंकिट, अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों को एक ‘डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर’ के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। अगर यह प्रस्ताव कानूनी रूप ले लेता है, तो यह देश का पहला ऐसा मामला होगा जहां पार्सल और फूड पहुंचाने वाली दोपहिया गाड़ियों को पैसेंजर ले जाने वाली बाइक-टैक्सियों की तरह कड़े परिवहन नियमों का पालन करना होगा।
नए नियमों के तहत क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
परिवहन विभाग के ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, डिलीवरी और ई-कॉमर्स कंपनियों को ओला, उबर और रैपिडो जैसी राइड-हेलिंग कंपनियों की तर्ज पर ही नियमों का पालन करना होगा। इन प्रमुख बदलावों में निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
-
100% इलेक्ट्रिक वाहन (EV) की अनिवार्यता: 15 किलोमीटर से कम दूरी की सभी डिलीवरी के लिए कंपनियों को केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों (Electric Two-Wheelers) का ही इस्तेमाल करने की अनुमति दी जाएगी। पेट्रोल वाली निजी बाइकों पर रोक लगाने की योजना है।
-
2% ड्राइवर वेलफेयर फंड सेस: हर राइड या डिलीवरी ट्रांजैक्शन पर 2 प्रतिशत का शुल्क काटा जाएगा, जिसे राज्य सरकार द्वारा बनाए गए ‘ड्राइवर वेलफेयर फंड’ में जमा कराया जाएगा।
-
जीपीएस और रियल-टाइम ट्रैकिंग: डिलीवरी करने वाले हर वाहन और राइडर की रियल-टाइम जीपीएस ट्रैकिंग को परिवहन आयुक्त के केंद्रीय डिजिटल पोर्टल से जोड़ना अनिवार्य होगा।
-
यूनिक लाइसेंस आईडी और कमर्शियल औपचारिकताएं: एग्रीगेटर्स और डिलीवरी राइडर्स के लिए पुलिस वेरिफिकेशन, पब्लिक सर्विस व्हीकल (PSV) बैज, फिटनेस जांच और एक विशेष लाइसेंस नंबर लेना अनिवार्य किया जा सकता है।
-
आरएचए (RTA) किराया नियंत्रण: रीजनल ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी द्वारा तय की गई दरों और फेयर कैपिंग का दायरा इन पर भी लागू हो सकता है।
डिलीवरी पार्टनर्स (गिग वर्कर्स) को क्या फायदा और क्या नुकसान होगा?
इस नए नियम का सबसे दोहरा प्रभाव लाखों की संख्या में काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर्स पर पड़ेगा।
फायदे की बात: जो 2 प्रतिशत वेलफेयर सेस प्रस्तावित किया गया है, उससे गिग वर्कर्स के लिए एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा ढांचा तैयार होगा। इस फंड से डिलीवरी बॉयज को पेंशन, 5 से 10 लाख रुपये तक का आकस्मिक दुर्घटना बीमा, ई-बाइक खरीदने के लिए आसान ब्याज पर लोन और उनके बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति जैसे लाभ मिलेंगे।
चिंता और चुनौतियां: अधिकांश डिलीवरी राइडर्स अपनी निजी पेट्रोल बाइक का उपयोग करके पार्ट-टाइम काम करते हैं। यदि अचानक निजी पेट्रोल वाहनों पर रोक लगाकर केवल रजिस्टर्ड कमर्शियल इलेक्ट्रिक गाड़ियां अनिवार्य कर दी गईं, तो लाखों युवाओं के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जाएगा। नई इलेक्ट्रिक बाइक खरीदने का भारी खर्च उठाना एक साधारण डिलीवरी एक्जीक्यूटिव के लिए आसान नहीं होगा। इसके अलावा अनिवार्य डोमिसाइल और कमर्शियल लाइसेंस की शर्तें भी प्रवासी कामगारों के लिए रुकावट बन सकती हैं।
स्विगी, जोमैटो और जेप्टो जैसी कंपनियों पर क्या असर होगा?
क्विक-कॉमर्स और फूड डिलीवरी मॉडल की पूरी यूएसपी ‘कम लागत और तेज डिलीवरी’ पर टिकी है। बाइक-टैक्सी नियमों के दायरे में आने से कंपनियों के ऑपरेटिंग मॉडल पर बड़ा असर पड़ेगा:
-
लागत में भारी इजाफा: अपनी पूरी फ्लीट को पेट्रोल से ईवी में बदलना और वाहनों को जीपीएस से लैस करना कंपनियों के लिए करोड़ों रुपये का अतिरिक्त पूंजीगत खर्च (Capex) लाएगा।
-
किराया संरचना का पेंच: बाइक-टैक्सी में प्रति किलोमीटर एक निश्चित पैसेंजर किराया होता है, लेकिन फूड डिलीवरी में बेस पे, इंसेंटिव, दूरी और पीक ऑवर के अलग-अलग फॉर्मूले होते हैं। ऐसे में 2% वेलफेयर सेस ऑर्डर वैल्यू पर लगेगा, दूरी पर या राइडर के पे-आउट पर, इसे लेकर तकनीकी भ्रम बना हुआ है।
-
सख्त कानूनी और रेगुलेटरी अनुपालन: कंपनियों को प्रत्येक जिले के आरटीओ कार्यालयों से अप्रूवल और लाइसेंसिंग की प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिससे उनकी कारोबारी सुगमता पर असर पड़ सकता है।
आम उपभोक्ता की जेब पर कैसे पड़ेगा असर?
कंपनियों की परिचालन लागत (Operational Cost) और 2% वेलफेयर लेवी का बोझ अंततः ग्राहकों पर ही स्थानांतरित होने की पूरी संभावना है।
वर्तमान में जहां ग्राहक 5 से 10 रुपये हैंडलिंग या प्लेटफॉर्म फीस देते हैं, वहां कंपनियां अतिरिक्त ‘वेलफेयर सेस’ या ‘रेगुलेटरी कम्प्लायंस चार्ज’ जोड़ सकती हैं। इसके अलावा अगर फ्लीट की कमी के कारण डिलीवरी राइडर्स की उपलब्धता कम होती है, तो 10 मिनट वाली क्विक-कॉमर्स डिलीवरी का समय बढ़कर 20 से 30 मिनट हो सकता है और बारिश या त्योहारों के दौरान सर्ज प्राइसिंग (Surge Pricing) अधिक देखने को मिल सकती है।
केंद्र बनाम राज्य: क्या कोर्ट में टिक पाएगा यह नियम?
इस प्रस्तावित नियम को लेकर कानूनी पेंच भी सामने आ रहे हैं। वर्तमान में फूड और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म केंद्र सरकार के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act, 2019) और सोशल सिक्योरिटी कोड (Code on Social Security, 2020) के अंतर्गत काम करते हैं।
कर्नाटक में भी इसी तरह जब 1% गिग वर्कर सेस लगाने का प्रयास किया गया, तो एग्रीगेटर्स ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत राज्यों को पैसेंजर ट्रांसपोर्ट रेगुलेट करने का सीधा अधिकार है, लेकिन गुड्स या पार्सल डिलीवरी में इस्तेमाल होने वाले 250 वॉट से कम शक्ति वाले लो-स्पीड इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन मोटर वाहन अधिनियम की सामान्य परिभाषा से बाहर रहते हैं। ऐसे में राज्य सरकार के इस प्रस्ताव को लागू होने से पहले कानून व न्याय विभाग और संभावित अदालती चुनौतियों से गुजरना होगा।
कुल मिलाकर, यदि डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स पर बाइक-टैक्सी नियम लागू होते हैं, तो यह गिग वर्कर्स के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा और पर्यावरण के लिहाज से ग्रीन मोबिलिटी की दिशा में बड़ा कदम होगा। हालांकि, कंपनियों के बढ़ते खर्च और उपभोक्ताओं के बढ़े हुए डिलीवरी बिल के बीच संतुलन साधना सरकार और उद्योग दोनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा।
girls globe