यूपी : धर्म से हटकर आखिर क्यों जाति की राजनीति पर दांव लगा रहे हैं सीएम योगी? जानिए पूरा सियासी गुणा-गणित

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही देश के राजनीतिक गलियारों का केंद्र बिंदु रही है, जहां हर एक छोटा बदलाव बड़े सियासी भूचाल लाने की ताकत रखता है। पिछले कुछ सालों से राज्य की राजनीति में हिंदुत्व और धार्मिक मुद्दों को मुख्यधारा में रखने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रणनीति में अब एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राजनीतिक गलियारों और विश्लेषकों के बीच इन दिनों यह चर्चा सबसे गर्म है कि आखिर क्या वजह है कि बीजेपी और सीएम योगी ने हिंदुत्व के साथ-साथ अब जातिगत समीकरणों और सोशल इंजीनियरिंग (Caste Politics in UP Elections) पर अपना पूरा फोकस शिफ्ट कर दिया है। उत्तर प्रदेश की आगामी चुनावी वैतरणी पार करने के लिए इस नई रणनीति के पीछे का सियासी गुणा-गणित क्या कहता है, इसे समझना बेहद दिलचस्प है।

क्यों जरूरी हो गया है धर्म से आगे बढ़कर जाति के समीकरणों को साधना?

भारतीय जनता पार्टी और सीएम योगी आदित्यनाथ की यह रणनीति इस बात का सटीक उदाहरण है कि चुनावी राजनीति में कोई भी समीकरण स्थाई नहीं होता। हालांकि पार्टी की वैचारिक पहचान हमेशा से हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन उत्तर प्रदेश के जटिल सामाजिक ताने-बाने में बिना हर जाति और उप-जाति को साधे चुनावी जंग जीतना आसान नहीं है। विपक्ष द्वारा लगातार जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय के मुद्दों को जोर-शोर से उठाने के बाद, सत्ताधारी दल ने भी यह भांप लिया है कि सिर्फ धार्मिक मुद्दों के सहारे हर विधानसभा क्षेत्र के स्थानीय समीकरणों को नहीं साधा जा सकता। यही कारण है कि अब विभिन्न जातियों के क्षेत्रीय क्षत्रपों, छोटे दलों और नाराज चल रहे जातीय समूहों को पाले में लाने के लिए पार्टी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है।

गैर-यादव पिछड़ों और दलित जातियों पर विशेष फोकस की क्या है रणनीति?

यूपी की चुनावी रणभूमि में जीत हासिल करने के लिए सबसे बड़ा फॉर्मूला ‘नॉन-यादव ओबीसी’ और ‘नॉन-जाटव दलित’ वोटों को अपने पाले में रखना माना जाता है। सीएम योगी और पार्टी संगठन का पूरा जोर अब इसी बड़े वोटबैंक को एकजुट करने पर है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर उन नेताओं और चेहरों को आगे बढ़ाया जा रहा है जो अपनी-अपनी जातियों में मजबूत पकड़ रखते हैं। इसके साथ ही, विभिन्न जातियों के महापुरुषों की जयंतियों, सामाजिक सम्मेलनों और विकास योजनाओं के जरिए हर वर्ग को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सरकार सबका साथ और सबका विकास के एजेंडे पर पूरी तरह से काम कर रही है, ताकि किसी भी समुदाय में हाशिए पर होने का अहसास न हो।

आगामी चुनावों पर कितना असर डालेगा सीएम योगी का यह सियासी दांव?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सीएम योगी का यह नया अंदाज और जातिगत संतुलन साधने की यह कला आने वाले चुनावों में गेमचेंजर साबित हो सकती है। एक तरफ जहां कट्टर हिंदुत्व का आधार सुरक्षित रहता है, वहीं दूसरी तरफ जातियों के जमीनी समीकरणों को दुरुस्त करके विरोधियों के हर सियासी दांव की काट तैयार की जा रही है। उत्तर प्रदेश के इस जटिल राजनीतिक खेल में कौन सी पार्टी किस जाति के वोट बैंक को अपने पक्ष में करने में कामयाब होती है, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार का चुनावी मुकाबला बेहद रोमांचक और कांटे की टक्कर वाला होने जा रहा है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।