
देश भर के किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जून का महीना अब तक चिंताजनक साबित हुआ है। इस साल मानसून की प्रगति उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है और शुरुआती पखवाड़े में इसकी रफ्तार काफी सुस्त दर्ज की गई है। मौसम विभाग (IMD) और आर्थिक विश्लेषकों का अनुमान है कि इस बार देश में मानसून की कुल बारिश सामान्य से 10 फीसदी कम रह सकती है।
यह स्थिति कृषि उत्पादन के लिहाज से एक खराब संकेत है, जिसका सीधा असर ग्रामीण इलाकों में कंज्यूमर डिमांड और देश की खाद्य महंगाई (Food Inflation) पर देखने को मिल सकता है। हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में बढ़े सिंचाई के साधनों, प्रमुख जलाशयों में पानी के पर्याप्त स्तर और सरकार के पास गेहूं व चावल जैसे खाद्यान्नों के बफर स्टॉक की वजह से इस सुस्त मानसून का भारत की मुख्य जीडीपी (GDP) ग्रोथ पर बहुत ज्यादा गहरा असर नहीं पड़ेगा।
जून के शुरुआती 16 दिनों में सामान्य से 35% कम बरसे बदरा
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1 से 16 जून 2026 के बीच देश भर में होने वाली मानसूनी बारिश सामान्य के मुकाबले 35 फीसदी कम दर्ज की गई है। वैसे तो जून के महीने में मानसून की प्रगति में हमेशा उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, लेकिन इस बार वैश्विक स्तर पर उभर रही ‘अल-नीनो’ (El-Nino) की स्थितियों के पूर्वानुमान ने जून से सितंबर के पूरे सीजन के लिए चिंता बढ़ा दी है।
मौसम विभाग ने पहले ही संकेत दे दिया था कि इस पूरे सीजन में देश को आंशिक सूखे या कम बारिश का सामना करना पड़ सकता है। पानी की उपलब्धता की बात करें तो 11 जून 2026 तक देश के प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का केवल 28 फीसदी पानी ही शेष बचा था।
“मानसून पर भारतीय इकोनॉमी की निर्भरता अब हुई कम” — इकोनॉमिस्ट
नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट (NaBFID) के चीफ इकोनॉमिस्ट सुजीत कुमार ने देश के आर्थिक परिदृश्य पर बात करते हुए एक महत्वपूर्ण बदलाव को रेखांकित किया:
बदलता आर्थिक ढांचा: भारत की आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) अब पहले की तरह पूरी तरह से मानसून की बारिश पर निर्भर नहीं रह गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पिछले कुछ दशकों में देश के ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) में गैर-कृषि गतिविधियों जैसे मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सर्विस सेक्टर की हिस्सेदारी में भारी बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, कृषि क्षेत्र आज भी देश की एक बहुत बड़ी आबादी के जीविकोपार्जन का मुख्य सहारा है, इसलिए जब भी जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका असर सीधे खुदरा महंगाई, आरबीआई की ब्याज दरों (Interest Rates) और ग्रामीण बाजारों में ट्रैक्टर, टू-व्हीलर और एफएमसीजी (FMCG) उत्पादों की मांग पर पड़ता है।
कमजोर मानसून से कैसे चक्रव्यूह में फंसती है खाद्य महंगाई?
इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मनोरंजन शर्मा के अनुसार, देश को आगे मानसून की कमजोर स्थितियों और इसके आर्थिक परिणामों के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। जब भी बारिश कम होती है, तो उसका सीधा गणित फूड इन्फ्लेशन (खाद्य महंगाई) को बढ़ाने का काम करता है:
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सप्लाई चेन में रुकावट: पर्याप्त बारिश न होने से फसलों का कुल रकबा और उत्पादन घट जाता है, जिससे मंडियों में सब्जियों, दलहन (दालों) और तिलहन (खाद्य तेलों) की आवक कम हो जाती है। सप्लाई घटने से बाजार में इन चीजों के दाम तेजी से भागने लगते हैं।
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2015 का ऐतिहासिक उदाहरण: इससे पहले साल 2015 में जब देश में तगड़ा अल-नीनो आया था, तब मानसून की बारिश सामान्य से 14 फीसदी कम रही थी। उस दौरान देश की खुदरा खाद्य महंगाई बढ़कर 5 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई थी। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस साल भी फूड इन्फ्लेशन उसी स्तर के आसपास मंडरा सकता है।
खुदरा महंगाई का ताजा आंकड़ा: मई में बढ़कर 3.93% पर पहुंची
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश में खुदरा महंगाई दर (Retail Inflation) में लगातार बढ़ोतरी का सिलसिला जारी है:
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खुदरा महंगाई दर: मई 2026 में देश की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.93 फीसदी पर पहुंच गई, जो अप्रैल के महीने में 3.48 फीसदी के स्तर पर थी। यह लगातार पांचवां महीना है जब महंगाई के ग्राफ में तेजी देखी गई है।
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फूड इन्फ्लेशन का दबाव: विशेष रूप से भोजन और पेय पदार्थों की महंगाई (Retail Food Inflation) मई में 4.78 फीसदी दर्ज की गई, जो अप्रैल में 4.2 फीसदी थी। ऐसे में अगर जून और जुलाई में भी बारिश कमजोर रहती है, तो यह आंकड़ा आने वाले महीनों में 5% की सीमा को पार कर सकता है।
फसलों पर असर: धान-गेहूं सुरक्षित, दलहन और तिलहन पर संकट
कमजोर मानसून का असर देश की सभी फसलों पर एक जैसा नहीं पड़ता है। सिंचाई नेटवर्क (Canal and Tube-well Systems) और जलाशयों के बैकअप के कारण पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे बेल्ट में धान (चावल) और आगामी गेहूं की मुख्य फसलों को ज्यादा नुकसान होने की आशंका नहीं है।
लेकिन, देश के जो हिस्से पूरी तरह से केवल वर्षा-आधारित खेती (Rain-fed Agriculture) पर निर्भर हैं, वहां दलहन (दालों) और तिलहन (सोयाबीन, मूंगफली) के उत्पादन को भारी झटका लग सकता है। केयरएज (CareEdge) के ऐतिहासिक एनालिसिस के अनुसार, साल 1951 के बाद से जब भी देश में ‘स्ट्रॉन्ग अल-नीनो’ की स्थिति बनी है, तब कृषि जीवीए (Agriculture GVA) में औसतन 5.6 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इसके विपरीत, जब अल-नीनो कमजोर या सामान्य रहा है, तब कृषि क्षेत्र की ग्रोथ औसतन 1 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी है।
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