US-Iran Peace Deal & Crude Oil Impact: अमेरिका-ईरान शांति समझौते से कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट; जानें ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर इसका पूरा असर

वैश्विक ऊर्जा बाजार (Global Energy Market) और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक बहुत बड़ी राहतकारी खबर सामने आई है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने, रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने और ईरानी तेल निर्यात पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों (US Sanctions) में ढील देने के मकसद से एक अंतरिम समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।

इस ऐतिहासिक शांति समझौते ने हाल के इतिहास में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आई सबसे बड़ी और खौफनाक रुकावट को पूरी तरह से दूर कर दिया है। गुरुवार, 18 जून 2026 को शुरुआती ट्रेडिंग सत्र के दौरान ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे भारत सहित दुनिया भर के आयातक देशों ने बड़ी राहत की सांस ली है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के ताजा भाव

शांति समझौते की खबर सार्वजनिक होते ही दोनों प्रमुख वैश्विक कच्चे तेल के बेंचमार्क सूचकांकों में तेज गिरावट देखी गई और उन्होंने बुधवार को दर्ज की गई अपनी पिछली बढ़त को पूरी तरह खो दिया:

  • ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स (Brent Crude): अंतरराष्ट्रीय मानक माना जाने वाला ब्रेंट क्रूड 89 सेंट या 1.12% की गिरावट के साथ $78.66 प्रति बैरल पर आ गया है।

  • WTI क्रूड फ्यूचर्स (West Texas Intermediate): अमेरिकी क्रूड बेंचमार्क भी 98 सेंट या 1.28% टूटकर $75.81 प्रति बैरल के स्तर पर ट्रेड कर रहा है।

इससे पहले बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के एक कड़े बयान के कारण बाजार में हल्की तेजी आई थी, जिसमें उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि ईरान की लीडरशिप ने “ठीक से काम नहीं किया” तो अमेरिकी सैन्य हमले दोबारा शुरू हो सकते हैं। लेकिन अंतिम कूटनीतिक सफलता के बाद बाजार का सेंटिमेंट पूरी तरह सुधर गया है।

शांति समझौते की 3 मुख्य शर्तें: होर्मुज स्ट्रेट पर 30 दिनों का डेडलाइन

अमेरिका और ईरान के बीच सहमति वाले इस 14-पॉइंट के ऐतिहासिक मेमोरेंडम के तहत अगले 60 दिनों की आधिकारिक बातचीत का समय (विंडो) शुरू हो गया है। इस डील के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  1. टोल-फ्री ट्रांजिट की अनुमति: ईरान वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस (LNG) के सबसे मुख्य समुद्री मार्ग ‘होर्मुज स्ट्रेट’ से सभी अंतरराष्ट्रीय जहाजों को पूरी तरह से टोल-फ्री ट्रांजिट (मुफ्त आवाजाही) की इजाजत देने पर सहमत हो गया है।

  2. 30 दिनों में पूर्ण परिचालन क्षमता: समझौते की शर्तों के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों का ट्रैफिक अगले 30 दिनों के भीतर अपनी 100% परिचालन क्षमता (Operating Capacity) पर वापस आ जाना चाहिए।

  3. $300 बिलियन का इकोनॉमिक पैकेज: हालांकि इस शुरुआती डील में ईरान के परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) जैसे विवादित और संवेदनशील मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं, लेकिन इसके बदले ईरान की चरमराई अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी देशों से $300 बिलियन का फंडिंग पैकेज बनाने की अपील की गई है।

IEA की चेतावनी: 2027 तक बाजार में आ सकता है ‘सप्लाई सरप्लस’ का सैलाब

रॉयटर्स की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency – IEA) ने बुधवार को अपने मंथली मार्केट आउटलुक में दुनिया को एक नए आर्थिक समीकरण से रूबरू कराया है:

5.05 मिलियन बैरल का सरप्लस: आईईए ने चेतावनी दी है कि यदि यह शांति समझौता पूरी तरह जमीनी स्तर पर लागू होता है और होर्मुज स्ट्रेट नियमित रूप से खुल जाता है, तो वर्तमान में जारी वैश्विक तेल की भारी किल्लत बहुत जल्द ‘सप्लाई सरप्लस’ (जरूरत से ज्यादा आपूर्ति) में बदल जाएगी। एजेंसी का अनुमान है कि अगले साल (2027 तक) जब मिडिल ईस्ट का क्रूड पूरी क्षमता के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में लौटेगा, तब दुनिया भर में तेल की दैनिक आपूर्ति उसकी कुल मांग से 5.05 मिलियन बैरल प्रति दिन ज्यादा हो सकती है, जिससे कच्चे तेल के दामों में आगे और भी बड़ी मंदी आ सकती है।

दूसरी तरफ: US Fed की सख्ती से तेल की मांग घटने का अंदेशा

कच्चे तेल की कीमतों को नीचे लाने में केवल शांति समझौता ही नहीं, बल्कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व (US Fed) की नीतियां भी परोक्ष रूप से दबाव बना रही हैं।

फेडरल रिजर्व इस साल के अंत तक अमेरिका में महंगाई के दबाव को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी (Rate Hike) करने की संभावना पर बेहद आक्रामक तरीके से विचार कर रहा है। बुधवार को जारी हुए तिमाही अनुमानों के मुताबिक, फेड के 19 पॉलिसीमेकर्स में से 9 अधिकारियों ने अब रेट हाइक की जरूरत का समर्थन किया है, जबकि तीन महीने पहले तक कोई भी इसके पक्ष में नहीं था। यदि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो वहां की औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ सकती हैं, जिससे आने वाले समय में ईंधन और कच्चे तेल की वैश्विक मांग में भारी कमी आने की आशंका है।