
भारतीय गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) के कारोबार और लोन बुक को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा अनुमान सामने आया है। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, देश के एनबीएफसी सेक्टर का कुल बहीखाता यानी एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) वित्त वर्ष 2027-28 (FY28) तक छलांग लगाकर 93 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक आंकड़े को छू सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में क्रेडिट (लोन) की बढ़ती मांग और रिटेल सेक्टर में आ रहे उछाल के दम पर एनबीएफसी का यह दायरा तेजी से फैल रहा है। हालांकि, इस शानदार रफ्तार के बीच एक ऐसा पहलू भी सामने आया है जिसने बैंकिंग रेगुलेटर और वित्तीय विश्लेषकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
रिटेल और एमएसएमई लोन के दम पर एनबीएफसी सेक्टर में आएगी भारी तेजी इस कड़े अनुमान के पीछे सबसे बड़ी वजह देश के मध्यम वर्ग और छोटे व्यापारियों के बीच लोन की लगातार बढ़ती मांग को माना जा रहा है। पारंपरिक बैंकों की तुलना में एनबीएफसी द्वारा आसान शर्तों और डिजिटल माध्यमों से लोन देने की प्रक्रिया ने इन्हें ग्राहकों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया है। एमएसएमई (MSME) लोन, व्हीकल लोन, और पर्सनल लोन सेगमेंट में यह कंपनियां काफी आक्रामक तरीके से अपना पोर्टफोलियो बढ़ा रही हैं। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में वित्तीय समावेशन बढ़ने से इन कंपनियों के कारोबार को और ज्यादा मजबूती मिलेगी।
अनसिक्योर्ड लोन की बढ़ती रफ्तार ने बढ़ाई केंद्रीय बैंक की चिंता इस बड़ी और रिकॉर्ड तोड़ ग्रोथ के बीच सबसे बड़ा जोखिम अनसिक्योर्ड लोन यानी बिना किसी गारंटी के दिए जाने वाले कर्ज के रूप में उभर रहा है। पिछले कुछ समय से पर्सनल लोन, कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन और क्रेडिट कार्ड जैसे अनसिक्योर्ड लोन सेगमेंट में एनबीएफसी ने बहुत तेजी से कर्ज बांटे हैं। जानकारों का कहना है कि अगर आने वाले समय में आर्थिक मोर्चे पर कोई सुस्ती आती है, तो इन अनसिक्योर्ड लोन्स के डूबने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। यही वजह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी लगातार एनबीएफसी को अपने लोन पोर्टफोलियो में जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने और अनसिक्योर्ड लोन पर लगाम लगाने की हिदायत दे रहा है।
एसेट क्वालिटी और मार्जिन पर दिख सकता है आने वाले समय में असर वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि बहीखाते का आकार 93 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचना निश्चित रूप से देश की आर्थिक प्रगति को दर्शाता है, लेकिन कंपनियों को अपनी एसेट क्वालिटी (NPA) पर पैनी नजर रखनी होगी। अनसिक्योर्ड लोन के मोर्चे पर जरा सी भी ढिलाई इन कंपनियों के बैड डेट्स को बढ़ा सकती है, जिसका सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन और शेयर बाजार में उनकी रेटिंग पर पड़ेगा। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि एनबीएफसी कंपनियां आरबीआई के कड़े नियमों का पालन करते हुए अपनी ग्रोथ की इस तेज रफ्तार और कर्ज की गुणवत्ता के बीच कैसे संतुलन बनाकर चलती हैं।
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