News India Live, Digital Desk : तेलंगाना सरकार द्वारा कराए गए महत्वाकांक्षी सामाजिक-आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी गई है, जिसके आंकड़े राज्य में जातिगत और आर्थिक असमानता की एक भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना में अनुसूचित वर्ग (SC) की जातियां सामान्य वर्ग के मुकाबले तीन गुना अधिक पिछड़ी हैं। वहीं, पिछड़ा वर्ग (BC) भी सवर्णों की तुलना में 2.7 गुना ज्यादा पिछड़ा पाया गया है। राज्य सरकार ने इसे लेकर एक विशेष ‘बैकवर्ड इंडेक्स स्कोर’ जारी किया है, जो जातियों की दयनीय स्थिति को अंकों में दर्शाता है।
बैकवर्ड इंडेक्स का गणित: ‘डक्काल’ सबसे नीचे और ‘कापू’ सबसे ऊपर
तेलंगाना के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री पी. प्रभाकर ने सर्वे के नतीजे साझा करते हुए बताया कि इंडेक्स में जिस जाति का स्कोर जितना ज्यादा है, वह उतनी ही पिछड़ी मानी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में ‘डक्काल’ जाति सबसे ज्यादा पिछड़ी पाई गई है, जिसका इंडेक्स स्कोर 116 है। इसके विपरीत, सवर्ण समुदाय से आने वाली ‘कापू’ बिरादरी राज्य की सबसे सशक्त और अग्रणी जाति बनकर उभरी है, जिसका स्कोर मात्र 12 रहा। कापू समुदाय के पास बड़ी संख्या में कृषि भूमि है और वे लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक रूप से मजबूत रहे हैं।
आमदनी का भारी अंतर: 78% पिछड़ों की कमाई 1 लाख से भी कम
सर्वे में आय की असमानता को लेकर जो खुलासा हुआ है, वह चिंताजनक है। राज्य की पिछड़ी जातियों के 78 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनकी सालाना कमाई 1 लाख रुपये या उससे भी कम है। दूसरी ओर, संपन्न समुदायों के 13 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनकी वार्षिक आय 5 लाख से 50 लाख रुपये के बीच है। अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) वर्ग की स्थिति और भी विकट है; इस वर्ग के केवल 2.1 फीसदी लोग ही ऐसे हैं जो साल में 5 लाख रुपये से अधिक कमा पा रहे हैं।
बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही 135 जातियां
रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना की कुल 142 जातियों में से 135 जातियां सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी हुई हैं। इन जातियों की आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का 67 प्रतिशत है। बुनियादी सुविधाओं की स्थिति यह है कि:
21% आबादी के पास अब भी पीने के पानी की नियमित सप्लाई नहीं है।
13% लोग आज भी शौचालय (Toilet) जैसी प्राथमिक सुविधा से वंचित हैं।
6% घरों में अब तक बिजली का कनेक्शन नहीं पहुंच पाया है।
42 संकेतकों पर मापी गई बदहाली: शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुंच से दूर
राज्य सरकार ने जातियों के पिछड़ेपन को मापने के लिए कुल 42 इंडिकेटर (संकेतक) तय किए थे। कुल 242 जातियों के अध्ययन में पाया गया कि 135 पिछड़ी जातियों में से 69 पिछड़ा वर्ग की, 41 अनुसूचित जाति की और 25 जनजातियां हैं। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि इन जातियों के पास न केवल रोजगार और शिक्षा का अभाव है, बल्कि उनकी अस्पतालों तक पहुंच भी बेहद सीमित है। इनके घर छोटे हैं और भूमिहीन होने के कारण ये सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी काफी पीछे रह गई हैं। सरकार का कहना है कि यह गैर-बराबरी राज्य के विकास के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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