तकनीक के दौर में भी आदिम जीवन: जानिए नामिबिया की ‘हिंबा’ जनजाति की वो परंपराएं, जिन पर यकीन करना मुश्किल है

आज की 21वीं सदी में दुनिया तकनीक, विज्ञान और सुख-सुविधाओं के मामले में बहुत आगे निकल चुकी है। हम चांद-तारों पर बस्तियां बसाने की सोच रहे हैं और हमारी लाइफस्टाइल पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है। लेकिन इसी धरती पर आज भी कुछ ऐसे कोने हैं, जहां वक्त जैसे सदियों पहले ठहर गया था। दुनिया में आज भी कुछ ऐसी जनजातियां और कबीले मौजूद हैं, जिनकी जिंदगी, संस्कृति और परंपराओं के बारे में जानकर हमारी आंखों और कानों पर यकीन नहीं होता। इनके जीने का तरीका और इनके रोजमर्रा के नियम इतने अलग होते हैं कि आम शहरी इंसान को एक पल के लिए तगड़ा झटका लग सकता है।

ऐसी ही एक अनोखी जनजाति का नाम है ‘हिंबा’ (Himba Tribe)। यह जनजाति अफ्रीकी देश नामिबिया के कुनेन प्रांत में निवास करती है। यह इलाका दुनिया के सबसे सूखे, दुर्गम और मुख्यधारा से पूरी तरह अलग-थलग पड़े क्षेत्रों में से एक माना जाता है। आइए जानते हैं इस कबीले की उन अजीबोगरीब परंपराओं के बारे में जो इन्हें पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनाती हैं।

जिंदगी में सिर्फ एक बार नहाने की अनोखी प्रथा

इस जनजाति की सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यहां की महिलाओं के नहाने से जुड़ी है। हिंबा कबीले की लड़कियां या महिलाएं अपने पूरे जीवन में सिर्फ एक ही बार नहाती हैं, और वह खास दिन होता है उनकी शादी का। शादी के अलावा उन्हें पानी से नहाने या कपड़े धोने की बिल्कुल भी इजाजत नहीं होती है।

इसके पीछे की मुख्य वजह इस इलाके की भौगोलिक स्थिति है। नामिबिया के इस हिस्से में पानी की भयंकर किल्लत होती है, जिसके कारण सदियों पहले यह प्रथा बनाई गई ताकि पीने के पानी को बचाया जा सके।

बिना नहाए भी क्यों नहीं आती बदबू?

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कभी न नहाने के बावजूद इन महिलाओं के शरीर से कोई दुर्गंध नहीं आती और उनकी त्वचा बेहद स्वस्थ रहती है। इसके पीछे एक खास प्राकृतिक तरीका है। ये महिलाएं हर दिन अपने शरीर और बालों पर एक विशेष प्रकार का लेप लगाती हैं, जिसे ‘ओटजिज़’ (Otjize) कहा जाता है। यह लेप जानवरों की चर्बी (तेल), खास खनिजों की धूल और लाल मिट्टी को मिलाकर तैयार किया जाता है। यह लेप उन्हें अफ्रीकी जंगलों की झुलसाने वाली तेज धूप, नमी और कीड़ों के काटने से बचाता है। इसी लेप के कारण इन महिलाओं की त्वचा का रंग हमेशा हल्का लाल या तांबे जैसा दिखाई देता है।

पुरुषों से कहीं ज्यादा कठिन है महिलाओं का जीवन

हिंबा कबीले में महिलाओं का जीवन पुरुषों की तुलना में बेहद संघर्षपूर्ण और कड़ी मेहनत से भरा होता है। इस समाज में घर चलाने और कबीले को संभालने का असली काम महिलाएं ही करती हैं।

मवेशियों (गाय-बकरियों) को चराने ले जाना, दूध निकालना, मीलों दूर से पीने का पानी ढोकर लाना, लाल मिट्टी और गोबर की मदद से झोपड़ियां तैयार करना, खाना पकाना और बच्चों की परवरिश करने तक की सारी जिम्मेदारी अकेले महिलाओं के कंधों पर होती है। पुरुष आमतौर पर कबीले के फैसले लेने या शिकार करने का काम करते हैं। इन तमाम मुश्किलों और कड़ी धूप में दिनभर काम करने के बाद भी इस जनजाति की महिलाओं की प्राकृतिक बनावट और खूबसूरती की दुनिया भर में तारीफ होती है।

हिंबा जनजाति का जीवन और परंपराएं: एक नजर में (At a Glance)

इस कबीले के समाज और संस्कृति को आप नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:

जीवन का पहलू हिंबा जनजाति का नियम / परंपरा इसके पीछे की वजह
नहाने का नियम महिलाएं जीवन में सिर्फ एक बार (शादी के दिन) नहाती हैं। कुनेन प्रांत में पानी की अत्यधिक कमी होना।
त्वचा की सुरक्षा शरीर पर लाल मिट्टी और तेल का लेप (Otjize) लगाना। धूप, टैनिंग और जंगली कीड़ों से बचाव के लिए।
मेहमाननवाजी मेहमान को खुश करने के लिए पत्नी को साथ सुलाने का रिवाज। कबीले की पुरानी सामाजिक मान्यता और सम्मान का तरीका।
वैवाहिक स्वतंत्रता पुरुषों को कई शादियां करने और महिलाओं को अन्य संबंध बनाने की छूट। आपसी खुलेपन और कबीले की आबादी बनाए रखने की सोच।
मौजूदा आबादी लगभग 50,000 के आसपास। बाहरी दुनिया से संपर्क न के बराबर होना।

मेहमाननवाजी के नाम पर निभाई जाने वाली अजीब प्रथा

इस कबीले में एक ऐसी परंपरा भी सदियों से चली आ रही है जो किसी भी आधुनिक या सभ्य समाज के लोगों को हैरान कर सकती है। हिंबा कबीले के लोग अपनी खास और अनोखी मेहमाननवाजी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इसका तरीका बेहद अलग है।

जब भी कबीले में बाहर से कोई सम्मानित मेहमान आता है या किसी के घर पर रुकता है, तो घर का मुखिया (पति) मेहमान के प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए अपनी पत्नी को उस मेहमान के साथ रात बिताने की अनुमति दे देता है। इस प्रथा के तहत, उस रात पति खुद अपनी झोपड़ी छोड़कर दूसरे कमरे में या घर के बाहर सोता है, ताकि मेहमान को किसी भी तरह की असुविधा न हो।

रिश्तों और सामाजिक आजादी का ताना-बाना

हिंबा समाज में रिश्तों को लेकर एक अलग ही खुलापन देखने को मिलता है। यहाँ पुरुषों को एक से ज्यादा शादियां करने या कई महिलाओं के साथ संबंध रखने की पूरी आजादी होती है। ठीक इसी तरह, महिलाओं को भी अपने पति के अलावा कबीले के दूसरे पुरुषों के साथ संबंध बनाने से नहीं रोका जाता। इसी खुलेपन के कारण अक्सर इस कबीले में पैदा होने वाले कई बच्चों के जैविक या असली पिता का ठीक-ठीक पता नहीं चल पाता है, लेकिन पूरा कबीला मिलकर बच्चों की परवरिश करता है।

आज के समय में इस रहस्यमयी जनजाति की आबादी लगभग 50 हजार के आसपास बची है। बाहरी दुनिया के लोग और पर्यटक अब धीरे-धीरे इनके कबीले तक पहुंचने लगे हैं, लेकिन तमाम बदलावों के बावजूद ये लोग आज भी अपने इन्हीं पुराने कायदे-कानूनों और परंपराओं के साथ जंगलों में अपना सादगी भरा जीवन बिता रहे हैं।