पीएचडी छात्रों के लिए पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी का फैसला, वाइवा के 7 दिन के भीतर शोधगंगा पर थीसिस अपलोड करना अनिवार्य

बिहार के उच्च शिक्षा जगत और शोधार्थियों (रिसर्च स्कॉलर्स) के लिए पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय (PPU), पटना से एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा नियम सामने आया है। अब विश्वविद्यालय से पीएचडी (Ph.D) की डिग्री प्राप्त करने के लिए शोधार्थियों को अपनी वाइवा (मौखिक) परीक्षा संपन्न होने के ठीक सात दिनों के भीतर अपनी थीसिस को ‘शोधगंगा’ (Shodhganga) पोर्टल पर अपलोड करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा।

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय ने राजभवन और कुलाधिपति के आदेशों का पालन करते हुए इस नए नियम को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना में साफ शब्दों में चेतावनी दी गई है कि यदि कोई शोधार्थी तय समय सीमा (एक सप्ताह) के भीतर अपनी थीसिस डिजिटल रूप से जमा नहीं करता है, तो उसके पीएचडी अवार्ड की अधिसूचना (Ph.D Award Notification) जारी नहीं की जाएगी, यानी उसकी डिग्री पूरी तरह रोक दी जाएगी।

पेन ड्राइव में जमा करनी होगी पूरी थीसिस, राजभवन के कड़े निर्देश पर कार्रवाई

दरअसल, पिछले दिनों बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में शोध की गुणवत्ता सुधारने और पारदर्शिता लाने के लिए एक स्पष्ट निर्देश जारी किया था। इसी कड़ी में पाटलिपुत्र विवि ने सबसे पहले कदम उठाते हुए इस व्यवस्था को अनिवार्य बनाया है।

अधिसूचना के मुताबिक, वाइवा खत्म होने के एक सप्ताह के भीतर शोधार्थी को अपनी पूरी थीसिस की एक पीडीएफ (PDF) फाइल को पेन ड्राइव में सुरक्षित करना होगा। इसके बाद, स्कॉलर को एक निर्धारित आवेदन पत्र के साथ इस पेन ड्राइव को विश्वविद्यालय के ‘पीएचडी सेल’ (Ph.D Cell) में ले जाकर खुद जमा करना होगा। इस प्रक्रिया के सफलतापूर्वक पूरा होने और सत्यापन (Verification) के बाद ही छात्र को डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी की उपाधि से सम्मानित करने की आधिकारिक घोषणा की जाएगी।

यूनिवर्सिटी ने तय किया ‘मानक प्रारूप’ (Standard Format)

पेन ड्राइव में थीसिस जमा करने को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक कड़ा मानक प्रारूप (Format) तैयार किया है। शोधार्थियों को अपनी थीसिस की मुख्य पीडीएफ को कुल 12 अलग-अलग हिस्सों (फाइलों) में बांटकर सबमिट करना होगा:

क्यों उठाना पड़ा यह सख्त कदम?

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के परीक्षा और प्रशासनिक प्रभाग के अनुसार, इस पूरी पेचीदा और सख्त प्रक्रिया को लागू करने के पीछे तीन मुख्य उद्देश्य हैं:

  1. शोध कार्य में पारदर्शिता (Transparency): बिहार के विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध कार्यों की गुणवत्ता को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करना।

  2. डिजिटल उपलब्धता (Digital Availability): देश-दुनिया के अन्य छात्र शोधगंगा पोर्टल के जरिए इस थीसिस को आसानी से पढ़ सकें और संदर्भ ले सकें।

  3. साहित्यिक चोरी की रोकथाम (Plagiarism Check): कॉपिंग या इंटरनेट से डेटा चुराकर पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाले फर्जीवाड़े पर पूरी तरह लगाम लगाना। इस संबंध में विवि ने सभी संकायाध्यक्षों (Deans) और विभागाध्यक्षों (HODs) को सख्त निर्देश जारी कर दिए हैं।

क्या होती है पीएचडी अवार्ड अधिसूचना (Ph.D Award Notification)?

आम भाषा में समझें तो ‘पीएचडी अवार्ड अधिसूचना’ विश्वविद्यालय द्वारा जारी किया जाने वाला वह सर्वोच्च और आधिकारिक कानूनी दस्तावेज (प्रोविजनल सर्टिफिकेट से पहले का मुख्य प्रमाण) होता है, जो यह प्रमाणित करता है कि अमुक शोधार्थी ने अपने डॉक्टरेट कोर्स की सभी अकादमिक शर्तें, रिसर्च गाइडलाइंस और वाइवा परीक्षा को सफलता पूर्वक पूरा कर लिया है। इसी अधिसूचना के जारी होने के बाद ही छात्र के नाम के आगे आधिकारिक तौर पर ‘डॉक्टर’ (Dr.) शब्द लगाने की पात्रता मिलती है।