अदब की दुनिया का सूरज डूबा, नहीं रहे मशहूर शायर बशीर बद्र, 91 की उम्र में ली अंतिम सांस

उर्दू अदब और आधुनिक गजल विधा को आम जनमानस की भाषा बनाने वाले देश के सबसे लोकप्रिय और मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र (Bashir Badr) का गुरुवार को निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे और पिछले लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। बशीर बद्र के निधन की दुखद जानकारी उनकी पत्नी राहत बद्र ने सोशल मीडिया के जरिए साझा की। उन्होंने बेहद भावुक शब्दों में लिखा, “बशीर साहब लेफ्ट अस…प्रेयर्स” (बशीर साहब हमें छोड़कर चले गए… दुआओं में याद रखें)।

डॉ. बशीर बद्र के रुखसत होने की खबर मिलते ही पूरे देश और साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। आम लोगों से लेकर दुनिया भर के जाने-माने कलमकारों ने उन्हें नम आंखों से श्रद्धांजलि दी है। बशीर बद्र को आधुनिक गजल का ‘उस्ताद’ माना जाता है, जिन्होंने उर्दू शायरी को किताबी संजीदगी से बाहर निकालकर आम आदमी के सुख-दुख से जोड़ा था।

अयोध्या से अलीगढ़ और मेरठ तक का शानदार सफर

15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे डॉ. बशीर बद्र का शिक्षा और साहित्य से बेहद गहरा नाता था। उन्होंने देश की मशहूर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की और यहीं से साल 1973 में उर्दू में अपनी पीएचडी (PhD) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने एएमयू में ही उर्दू के प्रोफेसर के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। 12 अगस्त 1974 को उन्होंने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर जॉइन किया। वे शायरी के उस ऊंचे मुकाम पर थे कि मेरठ कॉलेज में नौकरी के दौरान उन्हें कभी अपनी पीएचडी की उपाधि दिखाने की जरूरत ही नहीं पड़ी; उनका नाम ही हर डिग्री से बड़ा हो चुका था।

जब 1987 के मेरठ दंगों में जलकर राख हो गया था बशीर बद्र का आशियाना

बशीर बद्र के जीवन में एक ऐसा काला दौर भी आया जिसने उनकी पूरी जिंदगी को बदलकर रख दिया। साल 1987 में मेरठ में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों के दौरान उपद्रवियों ने इस महान शायर का घर भी जला दिया था। इस त्रासदी में न केवल उनका आशियाना छिना, बल्कि उनकी बरसों की मेहनत, अनमोल ऐतिहासिक रचनाएं, डायरियां और कविताएं हमेशा-हमेशा के लिए जलकर राख हो गईं। इस गहरे सदमे और दर्द के बाद बशीर बद्र ने मेरठ छोड़ दिया और वे हमेशा के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जाकर शिफ्ट हो गए थे।

ठेठ और आसान शब्दों में गजल लिखने में हासिल थी महारत

बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने गजल विधा में भारी-भरकम और क्लिष्ट उर्दू शब्दों की जगह बेहद आसान, ठेठ और रोजमर्रा की बोलचाल वाली भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने ‘उजाले’, ‘आंखें’, ‘मजबूरियां’ और ‘दोस्ती’ जैसे आम शब्दों को अपनी गजलों में पिरोकर उन्हें अमर बना दिया। “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता” और “जी बहुत चाहता है सच बोलें, क्या करें हौसला नहीं होता” जैसे उनके अनगिनत शेर आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। हालांकि, गंभीर बीमारी के चलते पिछले कई सालों से उन्होंने शायरी की महफिलों और लिखने से पूरी तरह किनारा कर लिया था।

पद्मश्री और ‘जोश-ए-उर्दू’ समेत कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजे गए

साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उनके बेमिसाल योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पदमश्री’ (Padma Shri) से नवाजा था। इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। साल 2018 में दुबई की नामचीन साहित्यिक संस्था ‘बज्म-ए-उर्दू’ के पदाधिकारियों ने विशेष रूप से भोपाल स्थित उनके निवास स्थान पर पहुंचकर उन्हें प्रतिष्ठित ‘जोश-ए-उर्दू-2018’ अवार्ड से सम्मानित किया था, जिसमें उन्हें चांदी की खूबसूरत हैंडमेड शील्ड और शॉल भेंट की गई थी।

भले ही बशीर बद्र आज हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके लिखे हुए जादुई शेर और गजलें आने वाली कई पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगी और मोहब्बत का पैगाम देती रहेंगी।