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90% स्टार्टअप क्यों टेक देते हैं घुटने? नया बिजनेस शुरू करने से पहले जान लें ये 3 कड़वे सच, नजरअंदाज किया तो डूब जाएगी खून-पसीने की कमाई

भारत समेत पूरी दुनिया में एंटरप्रेन्योरशिप और स्टार्टअप कल्चर को लेकर युवाओं में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। हर कोई अपनी नौकरी छोड़कर खुद का बॉस बनने और यूनिकॉर्न कंपनी खड़ी करने का सपना देख रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत इस चकाचौंध से बिल्कुल अलग है। ग्लोबल स्टार्टअप रिसर्च और उद्योग रिपोर्टों के आंकड़े बताते हैं कि शुरू होने वाले 90 फीसदी स्टार्टअप पहले पांच वर्षों के भीतर ही दम तोड़ देते हैं। केवल 10 प्रतिशत बिजनेस ही बाजार में टिक पाते हैं और उनमें से भी चुनिंदा कंपनियां ही मुनाफा कमा पाती हैं। किसी भी नए वेंचर को शुरू करने से पहले केवल आइडिया पर भरोसा करना काफी नहीं होता; उसके पीछे के कड़वे व्यापारिक नियमों और जमीनी चुनौतियों को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है।

स्टार्टअप फेल होने का सबसे बड़ा और पहला कारण यह है कि फाउंडर्स उस प्रोडक्ट या सर्विस को बनाने में अपनी पूरी ऊर्जा और पूंजी लगा देते हैं, जिसकी बाजार में असल जरूरत ही नहीं होती। इसे बिजनेस की भाषा में ‘लैक ऑफ प्रोडक्ट-मार्केट फिट’ (Product-Market Fit) कहा जाता है।

अक्सर नए उद्यमी अपने आइडिया के प्यार में इस कदर पड़ जाते हैं कि वे ग्राहकों से वास्तविक फीडबैक लिए बिना ही बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन या डेवलपमेंट शुरू कर देते हैं। जब प्रोडक्ट बनकर बाजार में उतरता है, तो पता चलता है कि लोग उसकी तारीफ तो कर रहे हैं, लेकिन उसके लिए अपनी जेब से पैसे निकालने को तैयार नहीं हैं। बिजनेस सिर्फ एक खूबसूरत आइडिया से नहीं चलता, बल्कि वह किसी वास्तविक समस्या (Pain Point) को हल करने और उसके बदले ग्राहक द्वारा भुगतान करने की इच्छा पर टिकता है। अगर आपने बिना ग्राउंड सर्वे किए केवल अपनी परिकल्पना के दम पर बिजनेस खड़ा किया, तो उसका विफल होना लगभग तय है।

बिजनेस की दुनिया में कैश यानी नकदी को ऑक्सीजन माना जाता है। किसी भी कंपनी का आइडिया कितना भी क्रांतिकारी क्यों न हो, अगर बैंक खाते में पैसे खत्म हो गए तो शटर गिरना तय है। स्टार्टअप्स के बंद होने की दूसरी सबसे बड़ी वजह है ‘रनिंग आउट ऑफ कैश’ यानी नकदी का संकट।

शुरुआती दौर में कई फाउंडर्स यह मानकर चलते हैं कि उन्हें जल्द ही एंजेल इन्वेस्टर या वेंचर कैपिटलिस्ट (VC) से फंडिंग मिल जाएगी। इस उम्मीद में वे महंगे दफ्तर, भारी-भरकम मार्केटिंग कैंपेन और गैर-जरूरी हायरिंग पर अंधाधुंध पैसा खर्च (High Burn Rate) करने लगते हैं। जब बाजार के हालात बिगड़ते हैं या फंडिंग राउंड में देरी होती है, तो कंपनी के पास कर्मचारियों की सैलरी और रोजमर्रा के ऑपरेशनल खर्चे निकालने तक के पैसे नहीं बचते। जब तक आपका बिजनेस खुद का पॉजिटिव कैश फ्लो जनरेट नहीं करने लगता, तब तक हर एक रुपये को बहुत सोच-समझकर खर्च करना चाहिए। बूटस्ट्रैप्ड रहकर बिजनेस की यूनिट इकोनॉमिक्स को मजबूत करना लंबी रेस का घोड़ा बनने के लिए पहली शर्त है।

एक अकेला व्यक्ति कभी भी बड़ा बिजनेस साम्राज्य नहीं खड़ा कर सकता। किसी भी स्टार्टअप को सफल बनाने के लिए एक मजबूत, संतुलित और समर्पित टीम की जरूरत होती है। स्टार्टअप्स के नाकाम होने का तीसरा सबसे घातक कारण गलत टीम का चुनाव और को-फाउंडर्स के बीच आंतरिक कलह है।

अक्सर लोग अपने दोस्तों या रिश्तेदारों को बिना उनकी स्किल और कमिटमेंट की जांच किए को-फाउंडर बना लेते हैं। शुरुआत में जब सब कुछ अच्छा लगता है तब कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन जैसे ही बिजनेस में नुकसान, तनाव या फंड्स का दबाव बढ़ता है, को-फाउंडर्स के बीच विजन और जिम्मेदारियों को लेकर विवाद शुरू हो जाता है। इसके अलावा, तकनीकी, सेल्स, फाइनेंस और ऑपरेशन्स के सही तालमेल वाली टीम का न होना भी स्टार्टअप को डुबो देता है। अगर टीम में कठिन परिस्थितियों से लड़ने का धैर्य और आपसी विश्वास नहीं है, तो बेहतरीन से बेहतरीन बिजनेस मॉडल भी ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है।

बिजनेस शुरू करने से पहले हमेशा ‘लीन स्टार्टअप’ अप्रोच अपनाएं। सबसे पहले एक मिनिमम वायेबल प्रोडक्ट (MVP) तैयार करें और उसे सीमित ग्राहकों के बीच टेस्ट करें। जब तक ग्राहक आपके प्रोडक्ट को बार-बार न खरीदने लगें, तब तक बड़ा निवेश न करें। अपनी वित्तीय योजना में कम से कम 12 से 18 महीने का कैश रनवे (बिना नए रेवेन्यू के टिकने की क्षमता) जरूर रखें। अंत में, ऐसे को-फाउंडर्स और पार्टनर्स चुनें जो आपकी कमियों को अपनी खूबियों से पूरा कर सकें, न कि केवल आपके जैसे ही कौशल वाले हों।