
8वें केंद्रीय वेतन आयोग (8th Pay Commission) के गठन और पैनल की बैठकों के दौर के बीच देश के लगभग 65 लाख केंद्रीय पेंशनभोगियों (Central Government Pensioners) और पारिवारिक पेंशनर्स की उम्मीदें चरम पर हैं। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ पेंशनर्स एसोसिएशन (AIFPA), नेशनल काउंसिल-ज्वाइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM) और भारत पेंशनर्स समाज (BPS) जैसे प्रमुख संगठनों ने वेतन आयोग के समक्ष अपना आधिकारिक मांग-पत्र (Memorandum) प्रस्तुत किया है। मौजूदा आर्थिक परिदृश्य, महंगाई और मेडिकल खर्चों को देखते हुए पेंशनर्स एसोसिएशनों ने केवल मामूली संशोधन के बजाय पेंशन ढांचे में आमूलचूल बदलाव की वकालत की है।
वर्तमान व्यवस्था में किसी भी सरकारी कर्मचारी को रिटायरमेंट के समय उसके अंतिम मूल वेतन (Last Pay Drawn) का 50 प्रतिशत हिस्सा मूल पेंशन के रूप में मिलता है। पेंशनर्स संगठनों ने जोरदार मांग रखी है कि बढ़ती महंगाई और न्यूनतम 2 सदस्यों वाले सेवानिवृत्त परिवार के सम्मानजनक जीवनयापन के लिए इसे बढ़ाकर अंतिम वेतन का 67% किया जाए। इसके साथ ही पारिवारिक पेंशन (Family Pension) को मौजूदा 30% से बढ़ाकर सीधे 50% करने का प्रस्ताव दिया गया है।
यद्यपि सरकार ने राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के स्थान पर एकीकृत पेंशन योजना (UPS) की घोषणा की है, लेकिन कर्मचारी और पेंशनर यूनियनें पुरानी पेंशन योजना (OPS) की शत-प्रतिशत बहाली पर अड़ी हैं। उनकी मांग है कि कर्मचारियों को बिना किसी अंशदान कटौती के जीपीएफ (GPF) आधारित पुरानी सामाजिक सुरक्षा पेंशन का सीधा विकल्प मिलना चाहिए।
पेंशनर्स निकायों और स्टाफ साइड यूनियनों ने 8वें वेतन आयोग के लिए 3.833 का फिटमेंट फैक्टर लागू करने की मांग की है।
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7वें वेतन आयोग में न्यूनतम बेसिक वेतन ₹18,000 तय हुआ था।
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3.833 के मल्टीप्लायर के आधार पर न्यूनतम मूल वेतन कम से कम ₹69,000 होना चाहिए।
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यदि यह स्वीकार होता है, तो न्यूनतम बेसिक पेंशन भी मौजूदा ₹9,000 से बढ़कर सीधे ₹34,500 से ₹46,230 (67% के फॉर्मूले पर) के स्तर पर पहुंच सकती है।
रिटायरमेंट के समय कर्मचारी अपनी कुल पेंशन का 40% तक हिस्सा एकमुश्त (Commutation) ले सकते हैं, जिसे सरकार उनकी मासिक पेंशन से किस्तों में काटती है। वर्तमान में यह कटौती 15 वर्षों तक जारी रहती है। संगठनों की मांग है कि चूंकि कर्मचारी सरकार द्वारा दिए गए एकमुश्त अग्रिम और उस पर लगने वाले ब्याज को लगभग 10.5 से 11 वर्षों में ही चुकता कर देते हैं, इसलिए कम्यूटेशन की रिकवरी अवधि को 15 साल से घटाकर 11 साल किया जाए।
वर्तमान में पेंशनभोगियों को 80 वर्ष की उम्र पूरी करने पर मूल पेंशन में 20% की अतिरिक्त वृद्धि मिलती है। स्वास्थ्य और आयु से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए यूनियनों ने मांग की है कि 80 वर्ष का इंतजार बहुत लंबा है। अतिरिक्त पेंशन का लाभ 65 वर्ष की उम्र से ही 5% की दर से मिलना शुरू होना चाहिए और हर 5 वर्ष में इसमें क्रमिक वृद्धि (जैसे 70 पर 10%, 75 पर 15%, 80 पर 20%) की जानी चाहिए।
सशस्त्र बलों की तर्ज पर केंद्रीय सिविलियन पेंशनर्स (रेलवे, डाक, रक्षा असैन्य और अन्य मंत्रालयों) के लिए भी ‘वन रैंक, वन पेंशन’ व्यवस्था लागू करने की मांग उठाई गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समान पद और समान सेवा अवधि के बाद रिटायर होने वाले दो कर्मचारियों की बेसिक पेंशन में सिर्फ रिटायरमेंट वर्ष के अंतर के कारण असमानता न रहे।
पेंशनर्स का तर्क है कि पेंशन कोई लाभ या व्यवसाय से अर्जित आय नहीं है, बल्कि यह जीवनभर की राष्ट्र सेवा के एवज में मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा है। लिहाजा, वरिष्ठ नागरिकों और विधवाओं को राहत देने के लिए पेंशन तथा फैमिली पेंशन पर लगने वाले आयकर (Income Tax) को पूरी तरह समाप्त करने या इसके लिए उच्च सीमा की विशेष टैक्स छूट देने की पुरजोर मांग की गई है।
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