
केंद्र सरकार के लाखों सेवारत कर्मचारी और पेंशनभोगी इस समय 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) के आधिकारिक गठन और उसकी सिफारिशों का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इस बीच, कर्मचारी यूनियनों और गलियारों में न्यूनतम (Minimum) और अधिकतम (Maximum) बेसिक वेतन के बीच के अंतर को लेकर बहस और चर्चाएं काफी तेज हो गई हैं।
सरकारी वेतन आयोगों की तकनीकी भाषा में इस अंतर को कंप्रेशन रेशियो (Compression Ratio) कहा जाता है। यह रेशियो सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि सरकार के सबसे निचले पायदान पर काम करने वाले कर्मचारी और सबसे शीर्ष अधिकारी (जैसे कैबिनेट सचिव) के मूल वेतन (Basic Salary) में कितना गुना अंतर है।
वर्तमान में लागू 7वें वेतन आयोग के ढांचे के तहत, एक केंद्रीय कर्मचारी का न्यूनतम बेसिक वेतन ₹18,000 प्रति माह है, जबकि शीर्ष स्तर पर अधिकतम बेसिक वेतन ₹2,50,000 (ढाई लाख रुपये) प्रति माह तय है। इस प्रकार, मौजूदा समय में यह वेतन अनुपात 1:13.9 का है। कर्मचारी संगठनों का साफ तर्क है कि यह अंतर सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी ज्यादा है, जिसे आगामी वेतन आयोग में हर हाल में कम किया जाना चाहिए।
दूसरे वेतन आयोग में था इतिहास का सबसे खौफनाक अंतर
भारत में आजादी के समय साल 1947 में पहला वेतन आयोग लागू किया गया था। लेकिन भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा वेतन असमानता और विसंगति दूसरे वेतन आयोग (1957) के दौर में दर्ज की गई थी। उस समय निचले स्तर पर न्यूनतम बेसिक वेतन मात्र ₹80 था, जबकि शीर्ष अधिकारियों का अधिकतम बेसिक वेतन ₹3,000 प्रति माह तय किया गया था। इसके चलते दोनों के बीच का कंप्रेशन रेशियो 1:37.5 के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था, जो भारतीय प्रशासनिक इतिहास में आज तक का सबसे बड़ा अंतर माना जाता है।
इस भारी असमानता के बाद चौतरफा विरोध को देखते हुए सरकार ने वेतन के इस अंतर को पाटने की दिशा में कदम उठाए। नतीजा यह हुआ कि तीसरे वेतन आयोग (1973) में न्यूनतम वेतन ₹196 और अधिकतम वेतन ₹3,500 तय होने से यह अनुपात घटकर 1:17.9 रह गया था।
चौथे और पांचवें वेतन आयोग में आया सबसे संतुलित दौर
साल 1986 में जब चौथा वेतन आयोग देश में लागू हुआ, तो वेतन विसंगतियों में भारी सुधार देखा गया। इसमें न्यूनतम बेसिक वेतन ₹750 और अधिकतम वेतन ₹8,000 तय किया गया, जिससे यह अनुपात पहली बार घटकर मात्र 1:10.7 रह गया।
इसके बाद, साल 1996 में आए पांचवें वेतन आयोग में इस असमानता को और ज्यादा कम किया गया। उस समय न्यूनतम बेसिक वेतन ₹2,550 और अधिकतम वेतन ₹26,000 प्रति माह तय किया गया, जिससे कंप्रेशन रेशियो घटकर अपने इतिहास के सबसे न्यूनतम स्तर यानी 1:10.2 पर आ गया था। इसे भारतीय वेतन संरचना के लिहाज से अब तक का सबसे संतुलित और समाजवाद के करीब का दौर माना जाता है।
छठे और सातवें वेतन आयोग में फिर से बढ़ने लगी असमानता
पांचवें वेतन आयोग के संतुलित दौर के बाद, छठे और सातवें वेतन आयोग में यह खाई एक बार फिर से चौड़ी होने लगी:
-
छठा वेतन आयोग (2006): इस आयोग में न्यूनतम बेसिक वेतन को बढ़ाकर ₹7,000 और अधिकतम वेतन को ₹80,000 किया गया। इसके कारण वेतन का अनुपात 1:10.2 से दोबारा बढ़कर 1:11.4 पर पहुंच गया।
-
सातवां वेतन आयोग (2016): इसमें कर्मचारियों का न्यूनतम बेसिक वेतन ₹18,000 और अधिकतम ₹2.50 लाख रुपये तय हुआ, जिससे यह कंप्रेशन रेशियो और ज्यादा बढ़कर सीधे 1:13.9 के स्तर पर पहुंच गया, जो वर्तमान में भी लागू है।
पहले से 7वें वेतन आयोग तक ‘कंप्रेशन रेशियो’ का पूरा चार्ट:
| वेतन आयोग (Pay Commission) | न्यूनतम वेतन (₹) | अधिकतम वेतन (₹) | कंप्रेशन रेशियो (अनुपात) |
| दूसरा वेतन आयोग (1957) | ₹80 | ₹3,000 | 1 : 37.5 (सबसे ज्यादा) |
| तीसरा वेतन आयोग (1973) | ₹196 | ₹3,500 | 1 : 17.9 |
| चौथा वेतन आयोग (1986) | ₹750 | ₹8,000 | 1 : 10.7 |
| पांचवां वेतन आयोग (1996) | ₹2,550 | ₹26,000 | 1 : 10.2 (सबसे संतुलित) |
| छठा वेतन आयोग (2006) | ₹7,000 | ₹80,000 | 1 : 11.4 |
| सातवां वेतन आयोग (2016) | ₹18,000 | ₹2,50,000 | 1 : 13.9 |
8वें वेतन आयोग से कर्मचारियों को क्या है उम्मीद? ‘1:8’ का फॉर्मूला
आगामी 8वें वेतन आयोग को लेकर विभिन्न केंद्रीय कर्मचारी संगठनों और फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशंस (FNPO) ने सरकार के सामने एक बेहद मजबूत और ठोस मांग रखी है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इस बार न्यूनतम और अधिकतम वेतन का अनुपात घटाकर सीधे 1:8 के दायरे में लाया जाना चाहिए।
उनका तर्क है कि बढ़ती महंगाई और जीवन यापन के खर्च को देखते हुए निचले स्तर के कर्मचारियों (ग्रुप-सी और डी) को वित्तीय रूप से अधिक मजबूत करने की जरूरत है। यदि अनुपात 1:8 किया जाता है, तो न्यूनतम बेसिक सैलरी में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक उछाल देखने को मिलेगा।
आर्थिक और प्रशासनिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि सरकार कर्मचारियों की इस मांग पर सकारात्मक विचार करती है, तो आगामी 8वां वेतन आयोग केवल एक रूटीन वेतन बढ़ोतरी (Salary Hike) तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश में सरकारी कर्मचारियों के बीच आय की असमानता को कम करने की दिशा में एक बेहद क्रांतिकारी और बड़ा कदम साबित हो सकता है। यही कारण है कि आने वाले समय में आयोग के गठन और उसकी हर एक सिफारिश पर देश के 1 करोड़ से अधिक कर्मचारियों व पेंशनभोगियों की नजरें टिकी रहेंगी।
girls globe