
सदी के शुरुआती दौर यानी साल 2000 के आसपास का हिंदी सिनेमा पारंपरिक खांचों में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। उस दौर में किसी भी मुख्यधारा की शीर्ष अभिनेत्री से यह उम्मीद की जाती थी कि वह बड़े पर्दे पर केवल ‘सती-सावित्री’, संस्कारी या फिर मासूम और बबली प्रेमिका के रूप में ही नजर आए। लेकिन साल 2001 में ‘अजनबी’ से बतौर ग्रे-शेड किरदार धमाकेदार डेब्यू करने और 2002 में हॉरर ब्लॉकबस्टर ‘राज’ (Raaz) से रातों-रात सुपरस्टार बनने वाली बिपाशा बसु ने उस बने-बनाए ढर्रे को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। ठीक उसी समय जब उनका करियर शीर्ष की ओर बढ़ रहा था, बिपाशा के पास निर्देशक अमित सक्सेना और निर्माता महेश भट्ट व पूजा भट्ट की इरोटिक थ्रिलर फिल्म ‘जिस्म’ (Jism) का ऑफर आया। फिल्म की स्क्रिप्ट बेहद बोल्ड, असंकोची और अपने दौर से कहीं आगे की थी। बिपाशा ने जब इस फिल्म को साइन करने का मन बनाया, तो बॉलीवुड गलियारों में जैसे भूचाल आ गया। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान बिपाशा बसु ने उस दौर की कड़वी सच्चाइयों को याद करते हुए साझा किया कि कैसे इस फिल्म को स्वीकार करना उनके पूरे करियर का सबसे बड़ा और जोखिम भरा जुआ बन गया था।
बिपाशा बसु ने खुलासा किया कि जब उन्होंने फिल्म ‘जिस्म’ करने का फैसला अपने करीबियों, कुछ निर्देशकों और इंडस्ट्री के जानकारों से साझा किया, तो लगभग हर किसी ने उन्हें इसे तुरंत छोड़ने की सलाह दी थी। बिपाशा ने बताया कि लोग उनसे कह रहे थे कि वह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जा रही हैं। उस दौर में इंडस्ट्री की आम धारणा थी कि यदि कोई मुख्य अभिनेत्री पर्दे पर अपनी कामुकता (Sexuality) को खुलकर प्रदर्शित करती है या किसी नकारात्मक व स्वार्थी किरदार को निभाती है, तो उसे हमेशा के लिए ‘वैंप’ या बी-ग्रेड फिल्मों का ठप्पा दे दिया जाता है। लोग कह रहे थे कि इस रोल के बाद कोई भी बड़ा निर्माता उन्हें पारिवारिक या पारंपरिक फिल्मों में मुख्य नायिका के रूप में कास्ट नहीं करेगा और उनका उभरता हुआ करियर चंद दिनों में तबाह हो जाएगा। लेकिन बिपाशा बसु ने अपनी सहज अंतरात्मा (Gut Feeling) पर भरोसा किया। उन्हें फिल्म की कहानी, पटकथा की गहराई और ‘सोनिया खन्ना’ के किरदार की जटिलता में एक ऐसा खिंचाव नजर आया जिसे वह एक कलाकार के तौर पर ठुकरा नहीं सकती थीं। उन्होंने समाज और इंडस्ट्री के दकियानूसी डर को दरकिनार करते हुए इस चुनौती को दोनों हाथों से स्वीकार कर लिया।
फिल्म ‘जिस्म’ में बिपाशा बसु द्वारा निभाया गया ‘सोनिया खन्ना’ का किरदार केवल ग्लैमर और अंग-प्रदर्शन तक सीमित नहीं था, बल्कि वह हॉलीवुड की क्लासिक ‘फेम फताल’ (Femme Fatale) परंपरा पर आधारित एक बेहद महत्वाकांक्षी, चालाक और मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूत महिला का चरित्र था। फिल्म में सोनिया खन्ना अपने अमीर पति की हत्या कराने के लिए एक शराबी और सीधे-साधे वकील कबीर लाल (जॉन अब्राहम) को अपनी खूबसूरती और सम्मोहन के जाल में फंसाती है। बिपाशा ने इस किरदार में जिस ठहराव, रहस्य और आत्मविश्वास के साथ काम किया, उसने दर्शकों और समीक्षकों दोनों को सन्न कर दिया। वह पर्दे पर किसी लाचार या पुरुषों की दया पर निर्भर रहने वाली नायिका नहीं थीं, बल्कि अपने जीवन और अपनी प्राथमिकताओं के फैसले खुद करने वाली एक जटिल महिला थीं। एम. एम. कीरावनी के मधुर संगीत और श्रेया घोषाल की मखमली आवाज में फिल्माया गया गीत ‘जादू है नशा है’ और ‘चलो तुमको लेकर चलें’ आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में कामुकता और सौंदर्य के सबसे कलात्मक और गरिमामय चित्रणों में गिना जाता है।
फिल्म ‘जिस्म’ ने रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस के तमाम पुराने समीकरणों और भविष्यवाणियों को ध्वस्त कर दिया। जिस फिल्म को ट्रेड पंडित ‘करियर किलर’ बता रहे थे, उसने टिकट खिड़की पर जबर्दस्त मुनाफा कमाया और साल 2003 की सबसे बड़ी स्लीपर हिट फिल्मों में शुमार हो गई। इस फिल्म ने सुपरमॉडल जॉन अब्राहम को बॉलीवुड में बतौर मुख्य अभिनेता स्थापित किया। फिल्म में बिपाशा और जॉन की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री इतनी तीव्र, स्वाभाविक और दमदार थी कि उसने बड़े पर्दे पर आग लगा दी। दर्शक सिनेमाघरों में खिंचे चले आए और फिल्म को युवाओं व परिपक्व दर्शकों दोनों का भरपूर समर्थन मिला। समीक्षकों ने बिपाशा बसु के अभिनय की जमकर सराहना की और उन्हें उस साल फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ नकारात्मक भूमिका (Best Villain) श्रेणी में नामांकित भी किया गया। इस ऐतिहासिक सफलता ने साबित कर दिया कि दर्शक केवल घिसी-पिटी कहानियां नहीं देखना चाहते, बल्कि यदि कोई महिला कलाकार बोल्ड और ग्रे किरदार को पूरी शिद्दत और प्रामाणिकता के साथ निभाए, तो उसे पूरे सम्मान के साथ सिर-आंखों पर बिठाया जाता है।
आज दो दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद जब पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो बिपाशा बसु का वह फैसला बॉलीवुड में महिला सशक्तिकरण और किरदारों की विविधता के लिहाज से एक ऐतिहासिक मील का पत्थर नजर आता है। बिपाशा के इस साहसिक कदम ने उन रूढ़ियों को हमेशा के लिए तोड़ दिया जो यह मानती थीं कि बोल्डनेस केवल वैंप्स के लिए आरक्षित होती है। उनके द्वारा खोले गए इस रास्ते पर चलकर ही आगे चलकर प्रियंका चोपड़ा ने ‘ऐतराज’ में सोनिया रॉय का साहसी नकारात्मक किरदार निभाया, करीना कपूर ने ‘फिदा’ में काम किया, और विद्या बालन ने ‘इश्किया’ व ‘द डर्टी पिक्चर’ जैसी फिल्मों में अपनी कामुकता और स्वतंत्र सोच को बेबाकी से पेश किया। बिपाशा बसु का यह मानना है कि एक कलाकार को कभी भी स्टीरियोटाइप्स या लोगों की दी गई सीमाओं में कैद नहीं होना चाहिए। जोखिम उठाना और लीक से हटकर कहानियों को चुनना ही एक साधारण अभिनेता को एक यादगार और क्रांतिकारी कलाकार बनाता है, और ‘जिस्म’ उनके उस निडर सफर का सबसे चमकदार सितारा बनी रहेगी।
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