चंडीगढ़: नौकरीपेशा पेशा लोगों के लिए उनके भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी कर्मचारी भविष्य निधि (EPFO) में जमा पैसा होता है। गाढ़ी कमाई के इस पैसे को लेकर अगर सरकारी विभाग लापरवाही बरते, तो यह किसी बड़े धोखे से कम नहीं है। हाल ही में चंडीगढ़ डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कोर्ट ने एक ऐसा ही ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो देशभर के उन लाखों कर्मचारियों के लिए एक बड़ी नजीर साबित होगा जो पीएफ ट्रांसफर या निकासी में हो रही देरी से परेशान रहते हैं। अदालत ने 10 साल तक आवेदन पर कुंडली मारकर बैठे ईपीएफओ को सेवा में कमी का दोषी पाते हुए पीड़ित कर्मचारी को 50 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
2010 में किया था आवेदन, 2020 में जागे अधिकारी
मामले की जड़ें साल 2009 से जुड़ी हैं। पीड़ित कर्मचारी गर्ग उस समय पुणे की टेक महिंद्रा कंपनी में कार्यरत थे। फरवरी 2009 में उन्होंने वहां से इस्तीफा दिया और जुलाई 2010 में इंफोसिस कंपनी जॉइन की। नई कंपनी में उनका नया पीएफ अकाउंट खुला, जिसके बाद उन्होंने सितंबर 2010 में अपने पुराने और नए अकाउंट को मर्ज (Transfer) करने के लिए आवेदन दिया। लेकिन विभाग की सुस्ती का आलम यह था कि सालों तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। गर्ग ने कई बार फॉलो-अप लिया और थक-हारकर साल 2011 में आरटीआई (RTI) तक दाखिल की, लेकिन फिर भी समाधान नहीं निकला।
ब्याज के पैसे पर चली कैंची तो कोर्ट पहुंचा मामला
लगभग एक दशक के लंबे इंतजार के बाद अप्रैल 2020 में ईपीएफओ ने उनके पुराने खाते से 6.21 लाख रुपये नए खाते में ट्रांसफर किए। हालांकि, गर्ग का दावा था कि 10 साल के ब्याज के साथ यह राशि 11.07 लाख रुपये होनी चाहिए थी। जब उन्होंने कम पैसे मिलने पर सवाल उठाया, तो ईपीएफओ ने यह तर्क दिया कि उनका अकाउंट ‘इनऑपरेटिव’ (Inoperative) हो गया था, इसलिए उन्हें कुछ सालों के ब्याज का लाभ नहीं दिया जा सकता। विभाग के इस अड़ियल रवैये से परेशान होकर गर्ग ने जुलाई 2021 में चंडीगढ़ डिस्प्यूट रिड्रेसल कमीशन का दरवाजा खटखटाया।
सॉफ्टवेयर की खराबी का बहाना नहीं आया काम
कंज्यूमर कोर्ट में सुनवाई के दौरान ईपीएफओ के वकीलों ने दलील दी कि सॉफ्टवेयर में तकनीकी खराबी के कारण पैसा ट्रांसफर करने में देरी हुई। हालांकि, अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कमीशन ने 16 मार्च 2026 को सुनाए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सॉफ्टवेयर की समस्या का बहाना बनाकर कर्मचारी को उसके हक से वंचित नहीं रखा जा सकता। विभाग कोर्ट में ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका जो इस 10 साल की भारी देरी को सही ठहरा सके।
मुआवजे के साथ देना होगा 9 फीसदी ब्याज
अदालत ने इसे सीधे तौर पर ‘सर्विस में कमी’ करार दिया और ईपीएफओ को आदेश दिया कि वह पीड़ित को मानसिक उत्पीड़न और कानूनी खर्च के बदले 50 हजार रुपये का मुआवजा दे। कोर्ट ने यह भी कड़ा रुख अपनाया कि यदि मुआवजे की राशि देने में देरी की जाती है, तो विभाग को इस पर 9 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज भी चुकाना होगा। यह फैसला उन सभी पीएफ खाताधारकों के लिए उम्मीद की किरण है जो सिस्टम की सुस्ती का शिकार होते हैं।
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