
डिजिटल और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के विस्तार के दौर में ‘पंचायत’ और ‘गुल्लक’ जैसी वेब सीरीज ने यह साबित कर दिखाया है कि भारत के छोटे शहरों, मोहल्लों और मध्यमवर्गीय परिवारों की जड़ों से जुड़ी कहानियों में दर्शकों को बांधने की सबसे ज्यादा ताकत होती है। सादगी से भरी ऐसी ही एक पारिवारिक कथा अब बड़े पर्दे पर दस्तक दे चुकी है। निर्देशक हरीश व्यास के निर्देशन में बनी कॉमेडी-ड्रामा फिल्म ‘ॐ का हरि’ (Om Ka Hari) 18 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। सख्त उसूलों वाले एक रिटायर पिता, उनके फैसलों से घुटते बेटे, दोनों के बीच संतुलन साधती मां और जीवन के अंतिम पड़ाव पर उपजे आत्मबोध के इर्द-गिर्द बुनी गई यह फिल्म सीधे दिलों को छूने का प्रयास करती है।
कहानी की शुरुआत मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के उस पुराने रिहायशी मकान से होती है, जहां शर्मा परिवार पीढ़ियों से बसता आ रहा है। परिवार के मुखिया हरि प्रसाद शर्मा (रघुबीर यादव) हैं, जिन्हें उनकी गायकी के चलते पूरे मोहल्ले में सम्मान से “भोपाल का अनूप जलोटा” कहा जाता है। सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद वे अपना पूरा समय भजन गायकी और प्रभु भक्ति में समर्पित करते हैं। उनकी धर्मपत्नी सरोज शर्मा (सोनी राजदान) एक ठेठ घरेलू महिला हैं, जो घर-गृहस्थी और परिवार को एक सूत्र में पिरोए रखने में जुटी रहती हैं, जबकि छोटी बेटी गुड्डी (समता सुदीक्षा) अभी अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर रही है। दूसरी ओर, हरि प्रसाद के सख्त स्वभाव, लगातार रोक-टोक और हर बात पर मिलने वाली डांट-फटकार से तंग आकर उनका बेटा ओम (अंशुमन झा) अपने पिता का साया छोड़कर अपनी पत्नी प्रिया (आयशा कपूर) के साथ अलग घर में रहने चला जाता है।
जीवन की यह सामान्य और खिंची-खिंची दिनचर्या उस वक्त एक अप्रत्याशित मोड़ ले लेती है, जब एक दिन भजन कीर्तन के दौरान हरि प्रसाद अचानक मंच पर ही अचेत होकर गिर पड़ते हैं। इस घटना के बाद उनके मन में एक अजीबोगरीब आध्यात्मिक वहम घर कर जाता है कि उनके जीवन के अब केवल सात दिन बचे हैं और उनकी अंतिम इच्छा अपने प्राण मोक्षदायिनी नगरी काशी (वाराणसी) के घाटों पर त्यागने की है। पिता की इस हठीली जिद के आगे मजबूर होकर बेटा ओम उन्हें भोपाल से वाराणसी लेकर रवाना होता है। गंगा के तट पर पिता-पुत्र के बीच सुलझते-उलझते रिश्ते, गिले-शिकवे, टकराव और जीवन के गहरे आत्ममंथन के साथ यह भावनात्मक कहानी आगे बढ़ती है।
फिल्म का निर्देशन हरीश व्यास ने संभाला है और इसकी मूल पटकथा भी उन्होंने ही तैयार की है। हालांकि एक बुजुर्ग पिता और विद्रोही बेटे के भावनात्मक जुड़ाव का यह कथानक सिनेमाई पन्नों पर बिल्कुल नया या अछूता नहीं है, लेकिन इसे बड़े पर्दे पर पेश करने के पीछे मेकर्स की नीयत और ईमानदारी पूरी तरह साफ नजर आती है। मौजूदा दौर में जहां मध्यमवर्गीय और भावुक पारिवारिक फिल्में सीधे ओटीटी रिलीज का आसान रास्ता चुनती हैं, वहीं ‘ॐ का हरि’ को सिनेमाघरों में रिलीज करने का जोखिम उठाना अपने आप में एक साहसिक और काबिले-तारीफ कदम है।
हरीश व्यास ने सह-लेखक स्वाति के साथ मिलकर फिल्म के जो संवाद और दृश्य रचे हैं, वे हर आम भारतीय घर की दीवारों के पीछे होने वाली चर्चाओं जैसे जीवंत लगते हैं। हर दूसरे-तीसरे परिवार में एक ऐसा जिद्दी पिता मौजूद होता है, जो अपने अनुभवों और फैसलों को अपने बच्चों पर यह मानकर थोपता है कि वही उनके भविष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं। पिता की इस कठोरता के पीछे छिपी भलाई को समझने के बजाय बच्चे दबाव महसूस करते हैं, और इस पूरे अंतर्द्वंद्व के बीच परिवार की मां लगातार पिसती रहती है। फिल्म में बेटे के सैलून बिजनेस को पिता द्वारा “नाई का काम” कहकर खारिज करना और खाने की मेज पर “यह नहीं, वो खाऊंगा” जैसी तानाशाही दिखाना, मध्यमवर्गीय जीवन के यथार्थ को बारीकी से उजागर करता है।
तकनीकी मोर्चे पर फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइनिंग और विजुअल एस्थेटिक्स की विशेष रूप से सराहना की जानी चाहिए। शांतनु चटर्जी का प्रोडक्शन डिजाइन और शिवानी पाटिल के कॉस्ट्यूम्स छोटे शहर के एक संकरे घर, वहां रहने वाले लोगों के साधारण परिधानों और घरेलू साजो-सामान के साथ पूरा न्याय करते हैं। राकेश रावत की सिनेमैटोग्राफी ने भोपाल की पुरानी गलियों से लेकर वाराणसी के प्राचीन घाटों की छटा को अपने कैमरे में बड़ी ही स्वाभाविकता के साथ उतारा है।
फिल्म का एक सबसे बड़ा आकर्षण शर्माजी के मकान के रूप में अभिनेता विजय राज का बैकग्राउंड वॉयसओवर है। एक निर्जीव घर की आवाज बनकर पूरे परिवार के सुख-दुख की दास्तान सुनाने का उनका अंदाज कहानी को शुरुआत से ही दिलचस्प बना देता है। इसके साथ ही संगीत के मोर्चे पर पार्श्व गायिका आशा भोसले के मधुर सुरों में सजा गीत ‘ऐ मेरी जिंदगी…’ कहानी के भावनात्मक उतार-चढ़ावों को गहराई प्रदान करता है और दर्शकों की आंखों को नम कर देता है।
अभिनय के दृष्टिकोण से देखा जाए तो रघुबीर यादव एक बार फिर अपने किरदार की रूह में पूरी तरह उतरते दिखे हैं। एक सख्त, चिड़चिड़े लेकिन भीतर से बच्चों के भविष्य के लिए बेचैन पिता के रूप में उनकी कास्टिंग बिल्कुल सटीक बैठती है। अपने सपनों की आहुति देकर बच्चों और पति की सेवा में जीवन बिताने वाली असहाय मां के रूप में सोनी राजदान ने बेहद नपा-तुला और गरिमामयी प्रदर्शन किया है।
बेटे ओम की भूमिका में अंशुमन झा ने एक ऐसे युवा की आंतरिक कुंठा, रोष और पिता के प्रति छिपे स्नेह को सहजता से पर्दे पर जिया है। वहीं वाराणसी के स्थानीय पुरोहित पंडित आत्माराम के संक्षिप्त रोल में मंझे हुए अभिनेता जगत रावत ने अपनी बेमिसाल कॉमिक और भावुक टाइमिंग से गहरी छाप छोड़ी है। सीमित दायरे के बावजूद समता सुदीक्षा और आयशा कपूर ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ ईमानदारी से न्याय किया है।
फिल्म की अवधि बहुत ज्यादा लंबी नहीं है, लेकिन स्क्रीनप्ले के स्तर पर कुछ खामियां अखरती हैं। मध्यांतर के आसपास ओम और प्रिया के बीच के प्रेम प्रसंगों और बैक-टू-बैक आने वाले गानों की वजह से फिल्म की रफ्तार कई जगह धीमी पड़ जाती है। संपादन की टेबल पर अगर इन दृश्यों को थोड़ा कसा जाता, तो कहानी का प्रवाह और अधिक प्रभावी हो सकता था। इसके बावजूद, जब-जब रघुबीर यादव और अंशुमन झा के बीच तीखे और मार्मिक संवाद आते हैं, फिल्म तुरंत पटरी पर लौट आती है।
कुल मिलाकर, ओटीटी की चर्चित सीरीज ‘पंचायत’ और ‘गुल्लक’ जैसी सहजता और मिट्टी की खुशबू समेटे ‘ॐ का हरि’ एक साफ-सुथरी, भावनात्मक और विचारणीय फिल्म है। यदि आप सप्ताहांत में बिना किसी फूहड़ता या शोर-शराबे के अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर एक सुकून भरी और दिल को छू लेने वाली पारिवारिक फिल्म देखना चाहते हैं, तो सिनेमाघरों में लगी ‘ॐ का हरि’ एक बेहतरीन विकल्प साबित होती है।
girls globe