
देशभर के सार्वजनिक, निजी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के करीब 15 लाख कर्मचारियों और अधिकारियों की ‘हफ्ते में 5 दिन काम’ (5-Day Work Week) की बहुप्रतीक्षित मांग को केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय से बड़ा झटका लगा है। लंबे समय से सोशल मीडिया और कर्मचारी यूनियनों के बीच यह चर्चा गर्म थी कि सरकार जल्द ही सभी शनिवारों को आधिकारिक अवकाश घोषित करने वाली है। लेकिन वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों ने इस पर पूर्ण विराम लगाते हुए दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि सरकार ने इस प्रस्ताव को कभी भी सैद्धांतिक या अंतिम मंजूरी नहीं दी थी। मंत्रालय का साफ मानना है कि भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में बैंकिंग सेवाओं का सीधे आम नागरिकों, किसानों, व्यापारियों और सरकारी राजस्व से सीधा जुड़ाव है, इसलिए शनिवार की पूरी छुट्टी से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
वर्तमान व्यवस्था के तहत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत सरकार के नियमों के अनुसार बैंकों में हर महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को अवकाश रहता है, जबकि पहले, तीसरे और पांचवें शनिवार को शाखाएं सामान्य दिनों की तरह काम करती हैं।
बैंक यूनियनों के संयुक्त संगठन ‘यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस’ (UFBU) और बैंकों के प्रबंधन निकाय ‘इंडियन बैंक्स एसोसिएशन’ (IBA) के बीच हुए 12वें द्विपक्षीय वेतन समझौते (12th Bipartite Wage Settlement) के दौरान सभी शनिवारों को अवकाश घोषित करने पर सहमति बनी थी। इस समझौते के तहत कर्मचारियों ने यह प्रस्ताव रखा था कि शनिवार की भरपाई के लिए वे सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना 40 से 45 मिनट अतिरिक्त काम करेंगे। आईबीए ने इस प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी के लिए वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (DFS) के पास भेजा था। लेकिन मंत्रालय की हरी झंडी न मिलने के कारण यह फाइल लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़ी हुई थी।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, वित्त मंत्रालय ने 5-डे वर्किंग मॉडल को व्यावहारिक न मानते हुए कई गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं:
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अर्थव्यवस्था और व्यापार पर असर: देश का बड़ा कारोबारी वर्ग (एमएसएमई, थोक व्यापारी, खुदरा दुकानदार और मंडी आढ़ती) शनिवार को सबसे ज्यादा कैश डिपॉजिट, चेक क्लीयरेंस और ट्रेड फाइनेंस के काम निपटाता है। शनिवार बंद होने से व्यापारिक चक्र और लिक्विडिटी फ्लो प्रभावित होने का अंदेशा है।
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ग्रामीण और कृषि बैंकिंग पर असर: ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों में किसान व मजदूर वर्ग बैंकिंग लेन-देन, केसीसी (KCC), सरकारी सब्सिडी और आधार ऑथेंटिकेशन के लिए सप्ताहांत पर शाखाओं में पहुंचते हैं। लगातार दो दिन (शनिवार और रविवार) बैंक बंद रहने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो सकती है।
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डिजिटल सेवाओं की सीमाएं: हालांकि यूपीआई और नेट बैंकिंग 24×7 काम करते हैं, लेकिन लोन डिस्बर्सल, विदेशी मुद्रा विनिमय, लॉकर संचालन, विवाद समाधान और बड़े आरटीजीएस (RTGS)/चेक क्लीयरेंस जैसे जटिल वित्तीय कार्यों के लिए आज भी भौतिक शाखाओं की उपस्थिति अनिवार्य है।
वित्त मंत्रालय के इस कड़े रुख से बैंक यूनियनों में भारी निराशा देखी जा रही है। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC), भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), स्टॉक एक्सचेंज (BSE/NSE) और केंद्र सरकार के अधिकांश प्रशासनिक दफ्तर पहले से ही 5-डे वर्किंग व्यवस्था पर काम कर रहे हैं।
यूनियनों का कहना है कि काम के बढ़ते तनाव (Work Pressure), वर्क-लाइफ बैलेंस की कमी और सीमित छुट्टियों के कारण युवा बैंक कर्मियों में नौकरी छोड़ने (Attrition Rate) और मानसिक अवसाद के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कर्मचारियों का दावा था कि रोजाना 45 मिनट ज्यादा काम करने से कुल साप्ताहिक वर्किंग आवर्स में कोई कमी नहीं आती, बल्कि ऊर्जा और संसाधनों की बचत होती। हालांकि, सरकार का मानना है कि सेवा क्षेत्र के बाकी संस्थानों की तुलना में कमर्शियल बैंकों का काम सीधे जनसेवा और नकद प्रवाह से जुड़ा है, इसलिए इसकी तुलना एलआईसी या कॉर्पोरेट ऑफिसों से नहीं की जा सकती।
यदि सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती, तो ग्राहकों को शाखा से जुड़े कामों के लिए हफ्ते में केवल 5 दिन ही मिलते। इससे शुक्रवार और सोमवार को शाखाओं में भीड़ का भारी दबाव बन सकता था। मंत्रालय के रुख से फिलहाल आम ग्राहकों, सीनियर सिटीजन्स और व्यापारियों को यह राहत मिली है कि महीने के पहले, तीसरे और पांचवें शनिवार को बैंक शाखाएं पूर्ववत खुली रहेंगी और वे अपने जरूरी वित्तीय काम बिना किसी अड़चन के निपटा सकेंगे।
वित्तीय सेवा विभाग के इस रुख के बाद अब निकट भविष्य में सभी शनिवारों की छुट्टी लागू होने की संभावना लगभग न के बराबर रह गई है। जानकारों का कहना है कि जब तक देश में बैंकिंग प्रक्रियाओं का शत-प्रतिशत ऑटोमेशन और डिजिटलाइजेशन नहीं हो जाता, तब तक सरकार आम जनता की सुविधाओं की कीमत पर इस तरह का प्रशासनिक फैसला लेने से परहेज करेगी। यूनियनों ने संकेत दिया है कि वे अपनी मांगों को लेकर वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय से पुनः संवाद की अपील करेंगे, लेकिन मौजूदा स्थिति यह दर्शाती है कि बैंक कर्मियों को 5-डे वर्क वीक के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
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