
जब भी भारतीय परिवारों में विदेश जाकर पढ़ाई करने (Study Abroad) की बात चलती है, तो अक्सर ध्यान साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स (STEM) और कॉमर्स या एमबीए जैसे विषयों पर ही केंद्रित रहता है। आम धारणा यही बन चुकी है कि अमेरिका (US), ब्रिटेन (UK) या कनाडा जैसे बड़े देश केवल कोडिंग, फाइनेंस, मेडिकल और बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री हासिल करने वालों के लिए ही उपयुक्त हैं। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि कला, साहित्य, समाजशास्त्र, इतिहास, राजनीति विज्ञान, फाइन आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज (Arts & Humanities) की पढ़ाई करने वाले छात्रों को आखिर डिग्री लेने के लिए कहां जाना चाहिए? इस पर अंतरराष्ट्रीय करियर और उच्च शिक्षा दिग्गजों (Overseas Education Experts) ने साफ कर दिया है कि यह सोच पूरी तरह से भ्रामक है। वैश्विक स्तर पर आज आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज के छात्रों के लिए कई ऐसे देश और ऐतिहासिक विश्वविद्यालय मौजूद हैं जो न केवल विश्वस्तरीय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे रहे हैं बल्कि पढ़ाई का खर्च भी बजट के भीतर रखते हैं।
करियर एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि कोई छात्र कला, साहित्य, दर्शनशास्त्र (Philosophy), ललित कला (Fine Arts) या समाजशास्त्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर की उच्च शिक्षा हासिल करना चाहता है, तो यूरोप महाद्वीप उसके लिए सबसे मुफीद जगह है। फ्रांस का सॉरबोन विश्वविद्यालय (Sorbonne University) और पेरिस की कला अकादमियां दुनिया भर में साहित्य, दर्शन और आर्ट डिजाइनिंग के लिए जानी जाती हैं। वहीं इटली के रोम, फ्लोरेंस और मिलान शहर विजुअल आर्ट्स, इतिहास, वास्तुकला (Architecture) और आर्कियोलॉजी के अध्ययन के लिए वैश्विक केंद्र हैं, जहां छात्र प्रत्यक्ष रूप से प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों के बीच पढ़ाई करते हैं। जर्मनी की बात करें तो वहां की हंबोल्ट यूनिवर्सिटी ऑफ बर्लिन (Humboldt University of Berlin) और एलएमयू म्यूनिख में सोशल साइंसेज, पॉलिटिकल साइंस और हिस्ट्री जैसे आर्ट्स के विषयों की पढ़ाई लगभग मुफ्त या बेहद मामूली ट्यूशन फीस पर उपलब्ध कराई जाती है। यह उन भारतीय छात्रों के लिए सबसे बड़ा अवसर है जो कम बजट में गुणवत्तापूर्ण अंतरराष्ट्रीय डिग्री हासिल करना चाहते हैं।
यूरोप के पारंपरिक देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया (Australian National University, University of Melbourne), नीदरलैंड्स (University of Amsterdam) और आयरलैंड (Trinity College Dublin) भी आर्ट्स और सोशल साइंस के छात्रों के लिए प्रमुख ग्लोबल हब के रूप में उभरे हैं। नीदरलैंड्स और आयरलैंड की यूनिवर्सिटियां पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा में मास्टर और रिसर्च प्रोग्राम संचालित करती हैं, जिससे भारतीय छात्रों को भाषा संबंधी कोई समस्या नहीं आती है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक, पॉलिसी रिसर्च ऑर्गनाइजेशन, यूनेस्को, एनजीओ (NGOs), डिजिटल मीडिया, कंटेंट डिजाइनिंग, इंटरनेशनल रिलेशंस और पब्लिक पॉलिसी के क्षेत्र में आर्ट्स डिग्री धारकों की मांग दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है। इसके अलावा कई देश आर्ट्स और रिसर्च स्कॉलर्स को शत-प्रतिशत फेलोशिप और फुल्ली फंडेड स्कॉलरशिप भी प्रदान करते हैं। इसलिए आर्ट्स के छात्रों को खुद को सीमित मानने के बजाय इन नए वैश्विक अवसरों का पूरा लाभ उठाना चाहिए।
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