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संभल में 50 करोड़ की आर्य समाज मंदिर जमीन पर चलेगा बुलडोजर, 53 साल पुराना अवैध कब्जा और मजार हटाने का एसडीएम कोर्ट का बड़ा आदेश

उत्तर प्रदेश के संभल जिले से एक बेहद बड़ी और सनसनीखेज प्रशासनिक कार्रवाई की खबर सामने आ रही है, जिसने स्थानीय भू-माफियाओं और अवैध कब्जाधारियों के बीच हड़कंप मचा दिया है। संभल जिले के शेर खां सराय इलाके में स्थित आर्य समाज मंदिर की बेशकीमती जमीन, जिसकी वर्तमान बाजार कीमत लगभग 50 करोड़ रुपये आंकी गई है, पर पिछले 53 लंबे सालों से अवैध कब्जा जमाए बैठे लोगों के खिलाफ प्रशासन ने अब पूरी तरह से शिकंजा कस दिया है। एसडीएम कोर्ट द्वारा इस मामले में एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए भूमि पर बने अवैध मकानों और एक मजार को हटाने के स्पष्ट निर्देश दे दिए गए हैं। लगभग एक साल तक चली लंबी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने पुराने चकबंदी अभिलेखों को पूरी तरह से सही ठहराते हुए अवैध कब्जाधारियों के नामों को राजस्व रिकॉर्ड से खारिज कर दिया है और इस पूरी भूमि को आधिकारिक रूप से आर्य समाज मंदिर तथा ग्राम समाज के नाम पर बहाल करने का आदेश पारित किया है। प्रशासन ने सभी अवैध कब्जाधारियों को चेतावनी दे दी है कि यदि उन्होंने खुद अपने अतिक्रमण नहीं हटाए, तो बहुत जल्द बुलडोजर कार्रवाई के जरिए अवैध निर्माणों को जमींदोज कर दिया जाएगा।

शेर खां सराय इलाके में पांच बीघा से अधिक बेशकीमती भूमि पर चल रहा था अवैध कब्जा

यह पूरा मामला संभल जिले के शेर खां सराय क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, जहां आर्य समाज मंदिर के नाम दर्ज पांच बीघा से अधिक की पांच सौ करोड़ नहीं बल्कि पचास करोड़ रुपये मूल्य की अति मूल्यवान भूमि पर पिछले कई दशकों से सुनियोजित तरीके से कब्जा किया गया था। इस मामले की शुरुआत पिछले साल दिसंबर 2025 में हुई थी, जब सरायतरीन के मंगलपुरा निवासी और आर्य प्रतिनिधि सभा के जिला उपाध्यक्ष संतोष कुमार ने इस पूरे घोटाले के खिलाफ आवाज उठाते हुए एसडीएम न्यायालय में एक औपचारिक वाद (मुकदमा) दायर किया था। उनकी इस शिकायत के आधार पर जब तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह द्वारा मामले की गहराई से प्रशासनिक और राजस्व जांच कराई गई, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच में यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुआ कि लगभग वर्ष 1960 में चली चकबंदी प्रक्रिया के दौरान संबंधित भूमि आधिकारिक रूप से आर्य समाज मंदिर के नाम पर ही दर्ज थी, और मंदिर की इस संपत्ति के प्रबंधन तथा देखरेख की कानूनी जिम्मेदारी पदेन ग्राम प्रधान को सौंपी गई थी।

ग्राम प्रधान से मिलीभगत कर बेची गई मंदिर की जमीन, खड़े हुए आठ से दस मकान और मजार

राजस्व जांच रिपोर्ट में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ कि समय बीतने के साथ कुछ स्थानीय भू-माफियाओं और प्रभावशाली लोगों ने कथित तौर पर तत्कालीन ग्राम प्रधान के साथ अवैध रूप से मिलीभगत कर ली और आर्य समाज मंदिर के नाम दर्ज इस पवित्र और सार्वजनिक जमीन के बड़े-बड़े हिस्सों को अवैध रूप से आपस में बेचना शुरू कर दिया। इस अवैध खरीद-फरोख्त के बाद वर्ष 1973 के आसपास से जमीन पर अनधिकृत कब्जे का सिलसिला शुरू हुआ और धीरे-धीरे खरीदारों ने वहां बड़े-बड़े पक्के मकान खड़े करने शुरू कर दिए। तहसील प्रशासन की विस्तृत जांच में यह बात भी सामने आई कि इस पांच बीघा से अधिक क्षेत्रफल वाली बेशकीमती भूमि के एक हिस्से पर न केवल आठ से दस अवैध पक्के मकान बना लिए गए, बल्कि वहां एक मजार का निर्माण भी कर दिया गया। पिछले कई दशकों से इस प्रकार के अवैध अतिक्रमण के कारण मंदिर की इस बहुमूल्य संपत्ति का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका था, जिस पर अब प्रशासनिक हथौड़ा चलने की पूरी तैयारी हो चुकी है।

एसडीएम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पुराने चकबंदी अभिलेखों को बनाया गया आधार

संभल के एसडीएम न्यायालय में इस भूमि के स्वामित्व और अवैध कब्जों को लेकर पिछले लगभग एक साल से लगातार सुनवाई चल रही थी। दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनने और तमाम पुराने राजस्व दस्तावेजों की गहन पड़ताल करने के बाद, एसडीएम विकास चंद्र ने गत पांच सितंबर को अपना अंतिम और बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने अपने फैसले में वर्ष 1960 के पुराने चकबंदी अभिलेखों को पूरी तरह से वैध और सही आधार माना। इसके आधार पर कोर्ट ने जमीन पर कब्जा जमाए बैठे लोगों के सभी फर्जी और अवैध नामों को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आदेश पारित किया। साथ ही, यह भी निर्देश दिए गए कि राजस्व रिकॉर्ड में इस पूरी भूमि पर ‘मंदिर आर्य समाज’ और ‘एहतमाम प्रधान ग्राम समाज’ का नाम विधिवत रूप से दर्ज किया जाए। अदालत के इस स्पष्ट और कड़े आदेश ने अवैध कब्जाधारियों के सभी कानूनी दांव-पेंच को पूरी तरह से नाकाम कर दिया है और आर्य समाज संस्था को उसकी पुश्तैनी संपत्ति वापस मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

प्रशासनिक अमले ने किया मौके का निरीक्षण, अवैध कब्जाधारियों को दी गई सख्त चेतावनी

अदालत द्वारा फैसला सुनाए जाने के ठीक अगले दिन, यानी सोमवार को संभल के तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह भारी पुलिस बल और राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ सीधे शेर खां सराय स्थित उस विवादित स्थल पर पहुंचे। अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर पूरी भूमि का बारीकी से निरीक्षण किया और वहां बने मकानों तथा मजार की स्थिति का जायजा लिया। निरीक्षण के बाद मीडिया और स्थानीय लोगों से बात करते हुए तहसीलदार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह पूरी भूमि अब आधिकारिक रूप से ग्राम समाज के प्रबंधन के अंतर्गत आ चुकी है। प्रशासन ने मौके पर मौजूद सभी 10 मकान स्वामियों और कब्जाधारियों को सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि वे बिना किसी विलंब के खुद ही अपने अवैध कब्जों और निर्माणों को हटा लें। यदि तय समय सीमा के भीतर स्वेच्छा से कब्जा नहीं हटाया गया, तो प्रशासन कानूनी प्रक्रिया के तहत बेदखली के आदेश पारित कराएगा और उसके बाद भारी पुलिस बल की मौजूदगी में इन सभी अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया जाएगा।

स्थानीय लोगों और आर्य समाज के प्रतिनिधियों में खुशी की लहर, भू-माफियाओं में मचा हड़कंप

एसडीएम कोर्ट के इस कड़े और ऐतिहासिक फैसले के बाद से स्थानीय आर्य समाज के कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और क्षेत्र के संभ्रांत नागरिकों में जबरदस्त खुशी की लहर दौड़ गई है। आर्य प्रतिनिधि सभा के जिला उपाध्यक्ष संतोष कुमार, जिन्होंने इस लंबी कानूनी लड़ाई की शुरुआत की थी, उन्होंने प्रशासन के इस कदम की भूरी-भरी प्रशंसा करते हुए कहा कि आखिरकार सच्चाई की जीत हुई है और धर्म तथा समाज की संपत्ति को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराने का मार्ग साफ हो गया है। दूसरी ओर, इस प्रशासनिक कार्रवाई की सुगबुगाहट शुरू होते ही संभल क्षेत्र के उन तमाम लोगों और भू-माफियाओं में भारी हड़कंप मच गया है जिन्होंने सरकारी और धार्मिक संपत्तियों पर अवैध कब्जे कर रखे हैं। प्रशासन के इस रुख से साफ जाहिर होता है कि उत्तर प्रदेश सरकार की नीति के अनुरूप सरकारी और सार्वजनिक संपत्तियों पर अवैध अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पूरी सख्ती के साथ लागू की जा रही है, और आने वाले दिनों में इस स्थान पर बुलडोजर की बड़ी कार्रवाई देखने को मिल सकती है।