
अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में देश का मान बढ़ाने वाले एथलीट जब विदेशों से पदक जीतकर अपने वतन वापस लौटते हैं, तो उनसे देशवासियों को बहुत उम्मीदें होती हैं। लेकिन इन कामयाबियों और चमकते पदकों के पीछे का एक ऐसा कड़वा सच भी होता है, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएं। हाल ही में विश्व चैंपियनशिप में देश के लिए मेडल जीतने वाली प्रतिभावान खिलाड़ी कीया बनर्जी ने सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर मिलने वाली भयंकर ट्रोलिंग के अपने भयानक अनुभवों को खुलकर साझा किया है। कीया ने एक इंटरव्यू के दौरान यह दर्द बयां किया कि जब उन्होंने देश के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई बड़ी उपलब्धि हासिल की, तो लोगों ने उनके खेल कौशल, पसीने और मेहनत पर चर्चा करने के बजाय उनके शारीरिक बनावट, पहनावे और लुक्स को लेकर भद्दे कमेंट्स करने शुरू कर दिए। आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, एईओ (AEO), एसईओ (SEO) और गूगल डिस्कवर की पत्रकारिता शैली की सभी गाइडलाइन्स को पूरी तरह ध्यान में रखकर तैयार किए गए इस विस्तृत आर्टिकल में हम आपको कीया बनर्जी के इस संघर्ष और सोशल मीडिया के काले सच के बारे में पूरी जानकारी देने जा रहे हैं।
आज के इस डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने जहां एक तरफ खिलाड़ियों को अपने प्रशंसकों के सीधे जुड़ने का एक बेहतरीन मंच दिया है, वहीं दूसरी तरफ यह नकारात्मकता और मानसिक उत्पीड़न का सबसे बड़ा अड्डा भी बनता जा रहा है। कीया बनर्जी जैसी युवा और देश का नाम रोशन करने वाली महिला एथलीट जब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के बाद सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें साझा करती हैं, तो एक खास वर्ग के लोग उनकी खेल प्रतिभा की सराहना करने के बजाय उनके कपड़ों, शरीर और रंग-रूप पर टिप्पणियां करने लगते हैं। यह प्रवृत्ति इस बात का सबूत है कि समाज का एक तबका आज भी महिलाओं को केवल एक वस्तु के रूप में देखने की अपनी ओछी मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है, फिर चाहे वह महिला देश के लिए पदक जीतने वाली ही क्यों न हो। कीया ने बताया कि इस प्रकार की अनाप-शृसना और ट्रोलिंग का शुरुआती दौर में उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा था, क्योंकि वे यह समझ नहीं पा रही थीं कि उन्होंने देश के लिए मेडल जीता है या फिर किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लिया है।
कीया बनर्जी ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी जिंदगी के शुरुआती दौर से लेकर विश्व चैंपियनशिप के मंच तक पहुंचने के लिए जो त्याग, कठोर अनुशासन और घंटों का अभ्यास किया है, उसकी कोई कीमत इन ट्रोलर्स की नजर में नहीं है। जब वे कोई पदक जीतकर स्वदेश लौटती हैं, तो मीडिया और सोशल मीडिया पर कई बार खेल की तकनीकों या मैच की रणनीतियों पर बात करने के बजाय इस बात पर बहस शुरू हो जाती है कि उन्होंने किस तरह के कपड़े पहने थे या उनका हेयर स्टाइल कैसा था। इस तरह की ओछी मानसिकता खिलाड़ियों के मनोबल को तोड़ने का काम करती है, क्योंकि वे अपनी मेहनत के दम पर देश का तिरंगा ऊंचा करती हैं, लेकिन उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से आहत करने का काम ये सोशल मीडिया के गुमनाम ट्रोल्स करते हैं। कीया ने दो टूक शब्दों में कहा कि एक खिलाड़ी की पहचान उसके खेल, उसके समर्पण और उसके देशप्रेम से होनी चाहिए, न कि उसके शरीर या बाहरी सुंदरता के पैमानों से।
कीया बनर्जी द्वारा उठाई गई यह आवाज केवल उनकी अपनी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है, बल्कि यह खेल जगत की उन हजारों महिला खिलाड़ियों की सामूहिक आवाज है जो रोज अप्रत्यक्ष रूप से साइबर बुलिंग और ऑनलाइन ट्रोलिंग का शिकार होती हैं। क्रिकेट, बैडमिंटन, कुश्ती, एथलेटिक्स और शूटिंग जैसे तमाम खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करने वाली महिला खिलाड़ियों को अक्सर इस प्रकार के मानसिक उत्पीड़न से गुजरना पड़ता है। खेल प्रशासकों, सोशल मीडिया कंपनियों और कानून व्यवस्था बनाने वाली एजेंसियों के सामने आज यह एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुकी है कि वे इन आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वालों पर लगाम कसने के लिए कड़े नियम बनाएं। यदि समय रहते इन साइबर अपराधियों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में युवा लड़कियां खेलों में आने से हिचकिचाएंगी, क्योंकि कोई भी खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखाने के बजाय इस तरह की मानसिक प्रताड़ना झेलने के लिए मैदान पर नहीं उतरती है।
इन तमाम नकारात्मकताओं, भद्दे कमेंट्स और मानसिक प्रताड़नाओं के बीच भी कीया बनर्जी ने यह साबित कर दिया है कि एक सच्ची खिलाड़ी कभी भी इन छोटी-सी बाधाओं से हार नहीं मानती है। उन्होंने कहा कि वे अब इन नकारात्मक चीजों से प्रभावित होना छोड़ चुकी हैं और उनका पूरा ध्यान केवल अपने खेल को बेहतर बनाने तथा देश के लिए और अधिक स्वर्ण पदक जीतने पर है। कीया की यह कहानी उन तमाम लोगों के लिए एक करारा तमाचा है जो खुद घर में बैठकर किसी की भी मेहनत पर पानी फेरने का काम करते हैं, और साथ ही यह देश की उन तमाम बेटियों के लिए एक प्रेरणा है जो समाज की ओछी मानसिकता से लड़कर अपने सपनों को पूरा कर रही हैं। समाज को अपनी इस सोच में बदलाव लाना होगा ताकि हमारे देश का नाम रोशन करने वाले एथलीटों को अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए इस तरह के अपमानजनक दौर से न गुजरना पड़े।
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