
भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो कई ऐसे महान कलाकारों के नाम सामने आते हैं, जिनकी कला और प्रतिभा ने सिल्वर स्क्रीन को सदा के लिए अमर कर दिया। एक ऐसे ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे सुरेंद्र नाथ शर्मा, जिन्हें हिंदी फिल्म जगत में मुख्य रूप से केवल ‘सुरेंद्र’ के नाम से जाना जाता है। एक दौर में जब भारतीय संगीत और अभिनय की दुनिया पर केएल सहगल जैसे लीजेंडरी कलाकारों का एकछत्र साम्राज्य था, तब पंजाब की मिट्टी से ताल्लुक रखने वाले एक युवा ने कानून की डिग्री और वकालत का पेशा छोड़कर सपनों के शहर बॉम्बे (मुंबई) का रुख किया था। अपनी सुरीली और रूहानी आवाज के दम पर उन्होंने रातों-रात फिल्म इंडस्ट्री में जो मुकाम हासिल किया, वह आज की पीढ़ी के लिए भी एक मिसाल है। मशहूर फिल्मकार महबूब खान की नजर जब उन पर पड़ी, तो उन्होंने इस हुनरमंद कलाकार को अपनी फिल्मों में अभिनेता और गायक दोनों रूपों में लॉन्च किया। सुरेंद्र का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि जब सच्ची लगन और पैतृक कला का मेल होता है, तो इतिहास खुद-ब-खुद रच जाता है।
भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के इस दिग्गज कलाकार का जन्म 11 सितंबर 1910 को पंजाब के बटला गांव में हुआ था। उनके शुरुआती जीवन और शिक्षा-दीक्षा की बात करें तो उन्होंने अपनी अकादमिक पढ़ाई पूरी करते हुए कला में स्नातक (B.A.) और कानून की डिग्री यानी एल.एल.बी. (LL.B.) की परीक्षा पास की थी। वह अपने करियर की शुरुआत में वकालत की दुनिया में अपनी एक मजबूत पहचान बनाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन उनके भीतर बैठा संगीतकार और कलाकार उन्हें लगातार पुकार रहा था। बचपन से ही गायिकी के प्रति उनका विशेष लगाव था, और उनके एक करीबी दोस्त ने उन्हें सलाह दी थी कि उन्हें अपनी इस खुदा-दाद खूबी को ही अपना मुख्य करियर बनाना चाहिए। बस फिर क्या था, दोस्त की एक छोटी सी सलाह ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। वे अपने सपनों को हकीकत में तब्दील करने के लिए सब कुछ छोड़कर मुंबई आ गए। उस दौर में नए कलाकारों के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं था, लेकिन महबूब खान जैसी दूरदर्शी शख्सियत ने उनके भीतर छिपे उस अनमोल रत्न को पहचान लिया, जो आने वाले समय में हिंदी सिनेमा का एक चमकता हुआ सितारा बनने वाला था।
सुरेंद्र के फिल्मी करियर की औपचारिक शुरुआत वर्ष 1936 में आई फिल्म ‘डेक्कन क्वीन’ (Deccan Queen) से हुई थी, जिसमें महबूब खान ने उन्हें बतौर मुख्य अभिनेता और गायक लॉन्च किया था। उन्हें इंडस्ट्री में केएल सहगल के एक मजबूत और सशक्त विकल्प के रूप में देखा जाने लगा था। उनकी किस्मत का सितारा तब चमका जब उन्होंने केएल सहगल के बेहद लोकप्रिय गीत ‘बालम आए…’ की एक पैरोडी अपनी अनोखी और ककश आवाज में ‘बिरहा की आग लगी…’ के नाम से गाई। यह गाना दर्शकों की जुबान पर ऐसा चढ़ा कि वह रातों-रात देश भर में छा गए। इसके बाद तो उन्होंने एक से बढ़कर एक कई क्लासिक गानों की झड़ी लगा दी। उनके गाए गीत जैसे ‘तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया…’, ‘भंवर मधुबन में जा..’, ‘भिक्षा दे दे मां..’, ‘अल्लाह नाम रस पीना प्राणी..’ और ‘प्रेम बिना सब सूना..’ उस दौर के हर संगीतप्रेमी के दिल की धड़कन बन गए। उनकी आवाज की गहराई और शब्दों के उच्चारण की स्पष्टता ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, और वे अपनी पीढ़ी के सबसे चहेते गायकों में शुमार हो गए।
सुरेंद्र के गायिकी सफर का सबसे सुनहरा अध्याय तब लिखा गया जब उन्होंने अपने दौर की महान और लोकप्रिय गायिका मलिका-ए-ترन्नुम नूरजहां के साथ अपनी आवाज का जादू बिखेरा। नूरजहां के साथ गाए गए उनके लगभग सभी duet गाने आगे चलकर इतिहास में ‘कल्ट क्लासिक’ बन गए। इन दोनों की जादुई जोड़ी का सबसे लोकप्रिय और सदाबहार गीत ‘आवाज दे कहां है..’ आज भी संगीत प्रेमियों के जेरो-जेहन में जिंदा है। इसके अलावा उन्होंने ‘क्यूं याद आ रहे हैं गुजरे हुए जमाने..’ और ‘अब कौन है मेरा..’ जैसे दिल को छू लेने वाले गीतों से सिनेमा जगत को समृद्ध किया। उनका एक और बेहद प्रसिद्ध गाना ‘तेरी याद का दीपक जलता है दिन रात’ आज से सात दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी अपनी मिठास और प्रासंगिकता खोए बिना एक कल्ट बना हुआ है। न केवल नूरजहां, बल्कि उन्होंने अपने दौर की अन्य प्रतिष्ठित गायिकाओं और अभिनेत्रियों के साथ भी कई सुपरहिट गाने गाए, जो आज भी भारतीय संगीत के धरोहर का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं।
अपनी बेहतरीन गायिकी के साथ-साथ सुरेंद्र एक बेहद शानदार और मंजे हुए अभिनेता भी थे। उन्होंने अपने लंबे करियर में कई प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं, जिनमें ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘दिल देके देखो’ और ‘रानी रूपमती’ जैसी क्लासिक फिल्में शामिल हैं। उन्होंने जिन फिल्मों में भी अभिनय किया, उनमें उनके गायन का हुनर हमेशा सोने पर सुहागा साबित हुआ। बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ होंगे कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने वाली महबूब खान की आइकॉनिक फिल्म ‘मदर इंडिया’ असल में सुरेंद्र की ही एक पुरानी फिल्म की हिंदी रीमेक थी। वर्ष 1940 में महबूब खान के निर्देशन में बनी फिल्म ‘औरत’ (Aurat) में सुरेंद्र ने एक बेहद अहम और दमदार भूमिका निभाई थी। उस फिल्म की जबरदस्त सफलता और उसके कथानक के प्रभाव को देखते हुए ही बाद में महबूब खान ने उसे नए आयाम और भव्यता के साथ ‘मदर इंडिया’ के रूप में दोबारा बनाया था। वकालत की किताबों से निकलकर सिनेमा के फलक पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले सुरेंद्र का यह सफर न केवल भारतीय सिनेमा की गौरवशाली गाथा का एक अहम हिस्सा है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि कला किसी एक विशेष दायरे की मोहताज नहीं होती।
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