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लखनऊ में नो-पार्किंग बोर्ड के बिना गाड़ियां उठाने का खेल: नगर निगम ठेकेदारों की मनमानी पर जनता में भारी आक्रोश, बड़े संस्थानों पर मेहरबानी के आरोप

राजधानी लखनऊ की सड़कों और रिहायशी कॉलोनियों में नगर निगम के अनुबंधित टोइंग दस्तों की कार्यशैली को लेकर आम जनता, स्थानीय व्यापारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में तीव्र आक्रोश देखा जा रहा है। शहर के विभिन्न इलाकों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि जिन जगहों पर न तो यातायात पुलिस का कोई ‘नो पार्किंग’ बोर्ड लगा है और न ही नगर निगम द्वारा कोई चेतावनी रेखा खींची गई है, वहां से भी लोगों के दोपहिया और चारपहिया वाहन जबरन क्रेन से उठाए जा रहे हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि नगर निगम और ठेकेदारों की मिलीभगत से केवल राजस्व वसूली का टारगेट पूरा करने के लिए बिना स्पष्ट नियमों के गाड़ियों को टो किया जा रहा है, जिससे रोजमर्रा के कामों से निकले आम नागरिकों को भारी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।

लखनऊ के प्रमुख बाजारों, बैंक शाखाओं और रिहायशी कॉलोनियों के मुख्य मार्गों पर बिना किसी पूर्व सूचना या सांकेतिक बोर्ड के वाहन उठाने का चलन बढ़ता जा रहा है। नियमों के मुताबिक, किसी भी मार्ग को ‘नो पार्किंग जोन’ घोषित करने से पहले वहां पर्याप्त दूरी पर स्पष्ट चेतावनी बोर्ड, जेब्रा क्रॉसिंग या पीली रेखा का अंकन अनिवार्य होता है। इसके उलट, हजरतगंज, गोमती नगर, आलमबाग और चौक जैसे व्यस्त इलाकों के संपर्क मार्गों पर खड़ी गाड़ियों को टोइंग वैन के कर्मचारी चंद सेकंडों में उठाकर ले जाते हैं। कई बार वाहन मालिक के मौके पर मौजूद होने और जुर्माना भरने की पेशकश करने के बावजूद क्रेन कर्मी बदसलूकी करते हुए सीधे गाड़ी को नगर निगम के यार्ड में ले जाते हैं, जहां मनमाना कंपाउंडिंग शुल्क वसूला जाता है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि टोइंग टीमों की पूरी प्राथमिकता शहर के मुख्य चौराहों का जाम खुलवाने के बजाय संकरी गलियों और रिहायशी पॉकेट्स में खड़ी गाड़ियों को निशाना बनाने की रहती है। आईसीआईसीआई बैंक शाखाओं और अन्य वित्तीय संस्थानों के बाहर जब ग्राहक कुछ मिनटों के लिए लेन-देन करने पहुंचते हैं, तो उनके वाहनों को तुरंत उठा लिया जाता है, जबकि बैंक प्रबंधन द्वारा ग्राहकों के लिए अधिकृत पार्किंग का कोई इंतजाम नहीं किया गया होता है। गलियों के भीतर से वाहन उठाकर ठेकेदारों के कर्मचारी सुरक्षित और आसान टारगेट ढूंढते हैं, क्योंकि वहां विरोध करने वाला कोई संगठित समूह नहीं होता। इस चुनिंदा सख्ती के कारण आम नौकरीपेशा वर्ग और छोटे खरीदार सबसे ज्यादा परेशान हैं।

एक तरफ जहां सामान्य सड़कों पर खड़े आम नागरिकों के वाहनों पर तुरंत शिकंजा कसा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ शहर के बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों और विशाल व्यावसायिक केंद्रों के आसपास लगने वाले भारी ट्रैफिक जाम पर प्रशासनिक चुप्पी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। शहीद पथ स्थित मेदांता हॉस्पिटल और गोमती नगर विस्तार के चंदन हॉस्पिटल जैसे बड़े स्वास्थ्य संस्थानों के आसपास एंबुलेंस और तीमारदारों की गाड़ियों की लंबी कतारों के चलते मुख्य कैरिजवे घंटों तक बाधित रहता है। जनता का आरोप है कि रसूखदार संस्थानों और बड़े प्रतिष्ठानों द्वारा पार्किंग नियमों का खुलेआम उल्लंघन किए जाने के बावजूद नगर निगम प्रशासन वहां सख्त कार्रवाई करने से बचता है। यह दोहरा रवैया प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

नगर निगम द्वारा अनुबंधित क्रेन सेवाओं पर अक्सर वसूली के अनैतिक तरीके अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। ठेके पर काम करने वाले कर्मियों का वेतन या कमीशन कथित तौर पर इस बात पर निर्भर करता है कि वे दिन भर में कितने वाहन खींचकर यार्ड तक पहुंचाते हैं। इसी होड़ में वे गाड़ियों को खींचते समय यह भी परवाह नहीं करते कि वाहन को कोई यांत्रिक नुकसान पहुंच रहा है या नहीं। कई मामलों में क्लच प्लेट, बंपर और हैंडब्रेक टूटने की शिकायतें भी दर्ज कराई गई हैं। बिना किसी गलती के 1,000 से 2,500 रुपये तक का जुर्माना चुकाने के बाद भी नागरिकों को अपने क्षतिग्रस्त वाहनों की मरम्मत पर अलग से खर्च करना पड़ता है।

सड़क सुरक्षा और नागरिक अधिकारों से जुड़े जानकारों का मानना है कि यातायात प्रबंधन का उद्देश्य जनता को अनुशासन सिखाना और सुगम आवागमन सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि इसे लाभ कमाने वाली व्यवसायिक योजना में तब्दील करना। जनता की मांग है कि:

  • जिन स्थानों पर नो-पार्किंग बोर्ड नहीं लगे हैं, वहां से किसी भी हाल में वाहनों को टो न किया जाए।

  • गाड़ी उठाने से पहले लाउडस्पीकर के जरिए वाहन संख्या की कम से कम दो बार घोषणा अनिवार्य की जाए।

  • प्रत्येक बड़े व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, बैंक और निजी अस्पताल को अपने परिसर में पर्याप्त बेसमेंट पार्किंग संचालित करने के लिए बाध्य किया जाए।

  • टोइंग प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए क्रेन कर्मियों के पास बॉडी-वॉर्न कैमरे और जीपीएस ट्रैकिंग अनिवार्य हो ताकि मनमानी पर रोक लग सके।

वर्तमान में स्थिति यह है कि जब कोई पीड़ित नागरिक शिकायत करने पहुंचता है, तो नगर निगम के अधिकारी इसे यातायात पुलिस का अधिकार क्षेत्र बता देते हैं, और यातायात पुलिस इसे नगर निगम के ठेकेदारों की निजी व्यवस्था करार देकर पल्ला झाड़ लेती है। प्रशासनिक समन्वय की इस कमी का सीधा फायदा ठेकेदार उठा रहे हैं। लखनऊ के जागरूक नागरिकों और व्यापारिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि नगर आयुक्त और संबंधित उच्चाधिकारियों ने इस मनमाने टोइंग सिंडिकेट पर तुरंत रोक नहीं लगाई और अवैध पार्किंग स्थलों के बजाय चुनिंदा नागरिकों को प्रताड़ित करने का खेल बंद नहीं कराया, तो वे सड़कों पर उतरकर व्यापक विरोध प्रदर्शन करेंगे।